पृथ्वी अवलोकन के लिए 710 किलोग्राम का कार्टोसेट-2 सीरीज मिशन का प्राथमिक उपग्रह है. इसके साथ सह यात्री उपग्रह भी है जिसमें 100 किलोग्राम का माइक्रो और 10 किलोग्राम का नैनो उपग्रह भी शामिल हैं. कुल 28 अंतरराष्ट्रीय सह-यात्री उपग्रहों में से 19 अमेरिका, पांच दक्षिण कोरिया और एक-एक कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन और फिनलैंड के हैं.
भारत की इस उपलब्धि पर पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि भारत जिन उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है, उससे वह दोहरी नीति अपना रहा है. इन उपग्रहों का इस्तेमाल नागरिक और सैन्य उद्देश्य में किया जा सकता है. इसलिए यह जरूरी है कि इनका इस्तेमाल सैन्य क्षमताओं के लिए ना किया जाए, अगर ऐसा होता है कि इसका क्षेत्र पर गलत प्रभाव पड़ेगा.
आपको बता दें कि इसरो ने अपनी वेबसाइट पर गुरुवार को लिखा, “पीएसएलवी-सी 440 के चौथे चरण के प्रणोदक को भरने का काम चल रहा है.” चौथे चरण के पीएसएलवी-सी-40 की ऊंचाई 44.4 मीटर और वजन 320 टन होगा. पीएसएलवी के साथ 1332 किलो वजनी 31 उपग्रह एकीकृत किए गए हैं ताकि उन्हें प्रेक्षपण के बाद पृथ्वी की ऊपरी कक्षा में तैनात किया जा सके.
बता दें कि अभी बुधवार को ही केंद्र सरकार ने मशहूर वैज्ञानिक के. शिवन को इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) का नया चेयरमैन नियुक्त किया है. उन्होंने किरन कुमार की जगह ली. कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने बुधवार को शिवन के नाम को मंजूरी दे दी. किरन का कार्यकाल 14 जनवरी को पूरा होने जा रहा है. हालांकि, शुक्रवार को लॉन्च के दौरान किरन कुमार भी मौजूद रहे थे.
साल की पहली अंतरिक्ष परियोजना
चार महीने पहले 31 अगस्त 2017 इसी तरह का एक प्रक्षेपास्त्र पृथ्वी की निम्न कक्षा में देश के आठवें नेविगेशन उपग्रह को वितरित करने में असफल रहा था. पीएसएलवी-सी40 वर्ष 2018 की पहली अंतरिक्ष परियोजना है. अन्नादुरई ने कहा, “पीएसएलवी अपने 39वें परियोजना (पीएसएलवी-सी 39) तक बहुत सफल रहा था, पीएसएलवी-सी 39 हमारे लिए एक बहुत बड़ा झटका था क्योंकि हीट शील्ड अलग नहीं हो पाए थे.”
31 सैटेलाइट 1323 किलो के, आधा वजन कार्टोसेट का
- इस मिशन में पीएसएलवी-सी40 से भेजे गए सभी सैटेलाइट्स का वजन 1323 किलोग्राम है।
- इनमें कार्टोसेट-2 का वजन 710 किलो और बाकी 30 सैटेलाइट का वजन 613 किलोग्राम है।
6 देशों के हैं 28 सैटेलाइट
- भारत के अलावा इनमें कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, साउथ कोरिया, यूके और यूएसए के सैटेलाइट्स हैं।
- भारत के अलावा इनमें कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, साउथ कोरिया, यूके और यूएसए के सैटेलाइट्स हैं।
अपने व्हीकल से लॉन्च कर चुका 278 सैटेलाइट्स
- इसरो जून 2017 तक खुद के बनाए व्हीकल से 278 सैटेलाइट्स लॉन्च कर चुका है।
- पिछले साल स्पेस में 104 सैटेलाइट भेजने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी इसरो ने अपने ही व्हीकल पीएसएलवी-सी37 के जरिए बनाया था।
- पिछले साल स्पेस में 104 सैटेलाइट भेजने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी इसरो ने अपने ही व्हीकल पीएसएलवी-सी37 के जरिए बनाया था।
देश के लिए नए साल का तोहफा
- सभी सैटेलाइट्स की कामयाब लॉन्चिंग के बाद इसरो के चेयरमैन एएस किरण राव ने कहा, "पीएसएलवी की पिछली लॉन्चिंग में दिक्कतें आई थीं, आज यह साबित हो गया कि हमने उन्हें ठीक तरह से समझा और दूर किया। देश को नए साल का यह तोहफा देकर खुशी हुई।"
ISRO का पिछला मिशन हुआ था फेल
- बता दें कि 31 अगस्त को इसरो का लॉन्चिंग मिशन फेल हो गया था। तब उसने पीएसएलवी-सी39 के जरिए बैकअप नेवीगेशन सैटेलाइट आईआरएनएसएस-1एच सैटेलाइट लॉन्च किया था। यह तकनीकी खामी की वजह से आखिरी स्टेज में नाकाम हो गया था।
स्पेस के मामले में दूसरे देशों से भारत कितना अलग?
- जापान, जर्मनी, इटली, चीन के बजट भारत से ज्यादा हैं। इसरो के पास 16 हजार साइंटिस्ट हैं। नासा के पास 17500 और रूस के पास 23800 हैं।
- भारत ने पहली कोशिश में ही मंगल मिशन कामयाब कर लिया था। जबकि अमेरिका 5 बार और रूस 8 बार में सफल हो पाए थे। काउंटडाउन 52 की जगह 28 घंटे का कर लिया है।
- इसरो ने 47 साल में 25 देशों के 278 सैटेलाइट्स लॉन्च किए हैं। जबकि अमेरिका ने 72 साल में 1369 और रूस ने 80 साल में 1492 सैटेलाइट्स। 10 साल में दुनिया में हुई लॉन्चिंग की 38% भारत की ओर से हुई है।
- भारत के पीएसएलवी रॉकेट की एक लॉन्चिंग करीब 100 करोड़ रु. की होती है। रूस के रॉकेट की 455 करोड़। वहीं अमेरिका, चीन व यूरोप के रॉकेट की एक उड़ान की लागत 6 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है।
फर्स्ट क्वार्टर में लॉन्च किया जाएगा चंद्रयान-2
- इसरो के डायरेक्टर एम अन्नादुरै के मुताबिक, चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग इस साल के पहले क्वार्टर में करने का प्लान है। इस मिशन के साथ ऑर्बिटर और लैंडर भी भेजे जाएंगे। इसका इंटीग्रेशन और टेस्टिंग फाइनल स्टेज में है।
- इसरो के डायरेक्टर एम अन्नादुरै के मुताबिक, चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग इस साल के पहले क्वार्टर में करने का प्लान है। इस मिशन के साथ ऑर्बिटर और लैंडर भी भेजे जाएंगे। इसका इंटीग्रेशन और टेस्टिंग फाइनल स्टेज में है।
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