चारा घोटाला मामले में सीबीआई की विशेष अदालत राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को गुरूवार को सजा सुनायेगी. देवघर कोषागार से 89 लाख की अवैध निकासी से जुड़े मामले आरसी 64ए/96 में फैसले के बाद सजा की अवधि का आज ऐलान होना था. केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा लालू प्रसाद सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र समर्पित किया गया था. सीबीआई ने 22 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र समर्पित किया था. बीते 23 दिसंबर को हुई सुनवाई में लालू प्रसाद और 15 अन्य आरोपियों को दोषी करार दिया गया. उसी दिन इस मामले में जगन्नाथ मिश्रा सहित छह आरोपी दोषमुक्त करार दिए गए. सीबीआई कोर्ट के जज शिवपाल सिंह की अदालत ने फैसला सुनाया.
लालू पर कई धाराओं में चला था केस
अदालत ने 950 करोड़ रुपये के चारा घोटाले से जुड़े देवघर कोषागार से 89 लाख़, 27 हजार रुपये की अवैध निकासी के मामले में फैसला सुनाया है. अवैध ढंग से धन निकालने के इस मामले में लालू प्रसाद यादव एवं अन्य के खिलाफ सीबीआई ने आपराधिक षड्यन्त्र, गबन, फर्जीवाड़ा, साक्ष्य छिपाने, पद के दुरुपयोग आदि से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120बी, 409, 418, 420, 467, 468, 471, 477 ए, 201, 511 के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) एवं 13(2) के तहत मुकदमा दर्ज किया था.
पहले भी हो चुकी है सजा
इससे पहले चाईबासा कोषागार से 37 करोड़, सत्तर लाख रुपये अवैध ढंग से निकासी करने के चारा घोटाले के एक अन्य मामले में इन सभी को सजा हो चुकी है. करीब 21 साल तक चले इस मामले में इससे पहले कई पूर्व अधिकारियों को सजा सुनाई जा चुकी है. चारा घोटाला एक ऐसा मामला था जिसकी वजह से लालू के राजनीतिक करियर में ग्रहण लग गया है. हालांकि इस मामले में वह करीब 21 सालों तक कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करते रहे और कई बार उनको हिरासत में लिया गया
देवघर कोषागार से हुई थी अवैध निकासी
सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने जिस मामले में फैसला सुनाया है वह मामला देवघर कोषागार से जुड़ा हुआ है. चारा घोटाले की जांच के दौरान यह बात सामने आई थी कि देवघर कोषागार से 95 लाख 8 हजार 140 रूपए 10 पैसे की अवैध निकासी हुई थी. इस मामले में 1996 में मामला दर्ज किया गया था. सीबीआई ने एक साल के बाद 1997 में 38 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था. सीबीआई ने 38 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था जिसमें ग्यारह आरोपियों की मौत हो चुकी थी और 1997 में सीबीआई ने जब आरोप पत्र दाखिल किया तो उस दौरान तीन आरोपी सरकारी गवाह बन गए थे. दो आरोपियों ने निर्णय से पहले ही अपना दोष स्वीकार कर लिया था. जिन 22 आरोपियों ने आरोप स्वीकार नहीं किया था उन्हीं 22 आरोपियों के खिलाफ आज फैसला आया है.
चारा घोटाले से जुड़े 33वां फैसला
झारखंड देवघर कोषागार से अवैध निकासी के मामले में आरसी 64ए/96 में फैसला आया है. चारा घोटाले के अब तक 33 मामले में फैसला हो चुका है. लालू प्रसाद से जुड़ा यह दूसरा मामला था. एक मामले में लालू प्रसाद को 6 साल की सजा हो चुकी थी. लालू के खिलाफ घोटाले से जुड़े 5 मामले की सुनवाई अदालत में लंबित हैं.
लालू पर पद के दुरुपयोग का आरोप
चारा घोटाला जब जानकारी में आया था उस वक्त मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री लालू प्रसाद थे. CBI की जांच टीम ने आरोप लगाया था कि पद का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने जांच के आदेश नहीं दिए. लालू प्रसाद यादव पर आरोप था कि शुरुआत में ही सक्रिय होते तो राशि की अवैध निकासी थम सकती थी लेकिन जानबूझकर उन्होंने शिकायत मिलने के बाद भी जांच के आदेश नहीं दिए.
900 करोड़ का चारा घोटाला, लालू पर दर्ज हैं 6 मामले
बिहार के पूर्व सीएम लालू यादव को चारा घोटाले मामले में बड़ा झटका लगा है। उन्हें कोर्ट ने दोषी करार दिया है और इस मामले में अब सजा 3 जनवरी को सुनाई जाएगी। आज हम आपको चारा घोटाले से जुड़े घटनाक्रम को सिलसिलेवार बताने जा रहे हैं।
सबसे पहले जानिए, किस मामले में आया फैसला?
सबसे पहले जानिए, किस मामले में आया फैसला?
- यह मामला देवघर कोषागार से 1992 से 1994 के दौरान फर्जी अलॉटमेंट लेटर और चालान पर 89 लाख की सरकारी राशि की गैर कानूनी निकासी से संबंधित है।
- चारा घोटाले से संबंधित लालू प्रसाद पर कुल छह मामले दर्ज हैं। एक केस की पटना और 5 की रांची में सुनवाई चल रही है।
- देवघर का यह मामला आरसी 68 (ए)-96 के तहत 1996 में दर्ज हुआ था।
- चारा घोटाले से संबंधित लालू प्रसाद पर कुल छह मामले दर्ज हैं। एक केस की पटना और 5 की रांची में सुनवाई चल रही है।
- देवघर का यह मामला आरसी 68 (ए)-96 के तहत 1996 में दर्ज हुआ था।
ट्रक की जगह लिखा स्कूटर का नंबर
- ट्रेजरी से निकलने वाले पैसे में सभी का हिस्सा पहले से तय होता था। घोटालेबाजों ने चारा के अलावा पशुओं को ढोने से लेकर दवा खरीद तक हर काम के फर्जी बिल बनाए और उससे पैसे निकाल लिए।
- जांच में खुलासा हुआ कि पशुपालन विभाग के अफसरों ने कागजों में 100-120 क्विंटल चारा और 10-12 बैल को स्कूटर पर लादकर एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाना दिखाया। हकीकत में ये चीजें कागजों पर तो ट्रक से ढोना बताया गया था, लेकिन उसमें ट्रक की जगह स्कूटर के नंबर लिखे गए थे।
न चारा खरीदा, न उसे फार्म हाउस पहुंचाया
- सीबीआई की जांच में पता चला कि न तो चारे की खरीदी हुई थी और न ही उसे फॉर्म हाउस तक पहुंचाया गया था। सब काम कागज पर कर लिया गया था।
सबका हिस्सा पहले से तय रहता था
- इस मामले में आरोप था कि घोटालेबाजों के रैकेट से पशुपालन विभाग के अधिकारी व ट्रेजरी ऑफिसर से लेकर सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री तक जुड़े थे।
- इस मामले में आरोप था कि घोटालेबाजों के रैकेट से पशुपालन विभाग के अधिकारी व ट्रेजरी ऑफिसर से लेकर सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री तक जुड़े थे।
- ट्रेजरी से निकलने वाले पैसे में सभी का हिस्सा पहले से तय होता था। घोटालेबाजों ने चारा के अलावा पशुओं को ढोने से लेकर दवा खरीद तक हर काम के फर्जी बिल बनाए और उससे पैसे निकाल लिए।
900 करोड़ रुपए तक पहुंचा था घोटाला
- चारा घोटाले का मामला एक-दो करोड़ रुपए से शुरू होकर 900 करोड़ रुपए तक जा पहुंचा। हालांकि, कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि घोटाला कितने का है, क्योंकि इन सालों में हिसाब रखने में भी भारी गड़बड़ियां हुई थीं। इस घोटाले का खुलासा 1994 में हुआ था तब झारखंड बिहार से अलग नहीं हुआ था।
- बिहार पुलिस ने 1994 में गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जैसे कई ट्रेजरी से फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपए गैर कानूनी तरीके से निकालने के मामले दर्ज किए थे। सरकारी ट्रेजरी और पशुपालन विभाग के कई कर्मचारी गिरफ्तार किए गए थे। कई ठेकेदारों और सप्लायर्स को हिरासत में लिया गया और 10-12 केस दर्ज किए गए थे।
अपोजिशन की मांग पर जांच CBI को सौंपी
- अपोजिशन की मांग पर इस घोटाले की जांच सीबीआई से कराई गई। सीबीआई ने कहा था कि चारा घोटाले में शामिल सभी बड़े आरोपियों के संबंध राष्ट्रीय जनता दल और अन्य पार्टियों के टॉप लीडर्स से हैं और काली कमाई का हिस्सा नेताओं की झोली में भी गया।
- पशुपालन विभाग के अफसरों ने चारे और पशुओं की दवा की सप्लाई के लिए करोड़ों रुपए के फर्जी बिल ट्रेजरी से कई सालों तक नियमित रूप से भुनाए।
लालू ने भी दी थी पैसे निकालने की मंजूरी
- सीबीआई के मुताबिक, तत्कालीन मुख्यमंत्री (लालू यादव) को न सिर्फ इस मामले की जानकारी थी, बल्कि उन्होंने कई मौकों पर वित्त मंत्रालय के प्रभारी के रूप में इन पैसों को निकालने की अनुमति दी थी। लालू के खिलाफ सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल किया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और वे कई महीनों तक जेल में रहे।
चारा घोटाले में लालू गए थे जेल, CM बनी थीं राबड़ी
- चारा घोटाले के एक मामले में जब मुख्यमंत्री रहते लालू प्रसाद को जेल की सजा हुई थी, उसके बाद ही लालू ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का सीएम बनाया था।
- सीएम बनने के बाद राबड़ी देवी ने साइन करना सीखा था। उस समय बिहार में जंगल राज की बात भी खूब चर्चा में थी। राबड़ी के सीएम रहते कहा जाता था कि सत्ता उनके दो भाई साधु यादव और सुभाष यादव चलाया करते थे।
10 बड़े नेता और 8 ऑफिसर्स के खिलाफ मुकदमा
- 31 मई 2007 को सीबीआई के स्पेशल जज यूएसपी सिन्हा ने आरसी 66 (ए)-96 के तहत 82 लोगों को सजा सुनाई थी, जिनमें लालू प्रसाद के दो भतीजे वीरेंद्र यादव और नागेंद्र राय भी थे।
- चारा घोटला में 10 बड़े राजनेता और आठ अफसरों के खिलाफ मुकदमा किया गया। सुनवाई के दौरान बिहार के पूर्व पशुपालन मंत्री भोलाराम तूफानी, पूर्व केंद्रीय मंत्री चंद्रदेव प्रसाद वर्मा, पूर्व सांसद राजो सिंह की मौत हो गई।
- बाकी आरोपियों में लालू प्रसाद, डॉ. जगन्नाथ मिश्र, पीएसी के पूर्व चेयरमैन ध्रुव भगत, जगदीश शर्मा, आरके राणा, विद्यासागर निषाद, पीएसी की पूर्व मेंबर ज्योति कुमारी थीं।
- अफसरों में पूर्व पशुपालन सचिव आईएएस बेक जूलियस, श्रम सचिव के अरुमुगम, महेश प्रसाद, एमसी सुवर्णो, फूलचंद सिंह, एसएन दुबे, एसी चौधरी।
- अफसरों में पूर्व पशुपालन सचिव आईएएस बेक जूलियस, श्रम सचिव के अरुमुगम, महेश प्रसाद, एमसी सुवर्णो, फूलचंद सिंह, एसएन दुबे, एसी चौधरी।
चारा घोटाला की खास तारीखें
- 27 जनवरी 1996 को पहला मामला चाईबासा थाने में 04/96 दर्ज किया गया।
- 11 मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए।
- 19 मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने राज्य पुलिस द्वारा दर्ज 41 मामलों को अपने अंडर में लेकर जांच शुरू की।
- 11 मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए।
- 19 मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने राज्य पुलिस द्वारा दर्ज 41 मामलों को अपने अंडर में लेकर जांच शुरू की।
कमीशन के झगडे में उजागर हुआ चारा घोटाला
बिहार का चारा घोटाला दो अफसरों के बीच किसी फंड के 30% हिस्से पर कब्जा जमाने में हुई अनबन के बाद सामने आया था। यह अनबन चाईबासा में तैनात डीएचओ (जिला पशुपालन अधिकारी) और रांची के डोरंडा में तैनात पशुपालन निदेशालय के एक अफसर के बीच हुई थी। 1984 में ही छोटे स्तर पर चारा घोटाले की शुरुआत हो चुकी थी। वेटरनरी इलाके से जुड़े नेताओं को भी इसकी भनक मिल गई थी और अपनी जरूरत के हिसाब से वो बड़े अफसर सिन्हा जी (श्याम बिहारी सिन्हा नहीं) से महीना दर महीना पैसा वसूलने लगे थे।
घोटाले के पैसे के लिए शुरू हुआ था विवाद
- चारा घोटाला में दवा सप्लाई करने वाले एक दूसरे दर्जे के सप्लायर के मुताबिक, श्याम बिहारी सिन्हा के बीमार पड़ जाने और उनकी ताकत कम होता देख चाईबासा में तैनात डीएचओ (जिला पशुपालन अधिकारी) और रांची के डोरंडा में तैनात पशुपालन निदेशालय के एक अफसर में चारा घोटाला के पैसे को लेकर अनबन शुरू हो गई।
- कोलकाता, रांची, दिल्ली और पटना में बैठे पहले दर्जे के चार बड़े सप्लायरों ने विवाद सुलझाने की कोशिश भी की। लेकिन, ऐसा हो नहीं सका। आखिरकार, तब करीब 12 साल से चल रहा चारा घोटाला सामने आ ही गया।
- कोलकाता, रांची, दिल्ली और पटना में बैठे पहले दर्जे के चार बड़े सप्लायरों ने विवाद सुलझाने की कोशिश भी की। लेकिन, ऐसा हो नहीं सका। आखिरकार, तब करीब 12 साल से चल रहा चारा घोटाला सामने आ ही गया।
नेताओं को मिलता था 30 फीसदी हिस्सा
- इसी बीच, पटना के एक बड़े सप्लायर के पोते के अपहरण और उसको खोजने के लिए हाईलेवल पर हुई पहल के कारण मामला काफी हद तक सार्वजनिक हो गया।
- दरअसल, एक मशहूर वेटरनरी डाॅक्टर ने अफसर और नेताओं के समीकरण का इतना घालमेल कर दिया था कि उजागर होने से पहले ही चारा घोटाला से राजनीतिक महकमे में लोग काफी हद तक परिचित हो चुके थे।
- यह चर्चा आम हो गई थी कि घोटाले के अधिकांश हिस्से को वह अपने पास रखता था और 30 फीसदी पैसा ही नेताओं को पहुंचाता था।
- पटना के बड़े सप्लायर द्वारा राजनीतिक आका को गिफ्ट देने के लिए पटना म्यूजियम के सामने खास महाल की जमीन पर बनवाया व्हाइट हाउस भी चर्चा में था।
- इसी बीच, पटना के एक बड़े सप्लायर के पोते के अपहरण और उसको खोजने के लिए हाईलेवल पर हुई पहल के कारण मामला काफी हद तक सार्वजनिक हो गया।
- दरअसल, एक मशहूर वेटरनरी डाॅक्टर ने अफसर और नेताओं के समीकरण का इतना घालमेल कर दिया था कि उजागर होने से पहले ही चारा घोटाला से राजनीतिक महकमे में लोग काफी हद तक परिचित हो चुके थे।
- यह चर्चा आम हो गई थी कि घोटाले के अधिकांश हिस्से को वह अपने पास रखता था और 30 फीसदी पैसा ही नेताओं को पहुंचाता था।
- पटना के बड़े सप्लायर द्वारा राजनीतिक आका को गिफ्ट देने के लिए पटना म्यूजियम के सामने खास महाल की जमीन पर बनवाया व्हाइट हाउस भी चर्चा में था।
‘पैसा ले के चुप हो जाओ वरना जान से हाथ धोना पड़ेगा’
- विधानसभा में चारा घोटाला उठाने पर निर्दलीय विधायक दिलीप वर्मा को धमकी मिली थी।
- जनवरी 1996 में चारा घोटाला उजागर हुआ था, पर उससे तीन साल पहले 1993 में ही दिलीप वर्मा ने विधानसभा में इस मामले को उठाने की कोशिश की थी। इसके बाद उन्हें कई स्तरों पर धमकी मिलने लगी थी।
- तब बाहुबली विधायक पप्पू यादव ने दिलीप वर्मा से कहा था- भईया इस मामले को छोड़ दीजिए।
- यह वाकया दिलीप वर्मा ने भास्कर को बताया। कहा-हमने पप्पू की मांग को अनसुना कर विधानसभा में दोबारा एक साल बाद ध्यानाकर्षण सूचना उठाई तो 16 मार्च 1994 को उसे स्वीकृत करना पड़ा। पर बजट सत्र में सदन में बहस नहीं कराने पर मानसून सत्र में मजबूर होकर विधानसभा में गेट पर धरना देना पड़ा।
- धरने पर बैठते ही सीएम लालू प्रसाद और विपक्ष के नेता जगन्नाथ मिश्रा ने आकर कहा कि दिलीप जी ये क्या कर रहे हैं? इसके पहले ध्यानाकर्षण सूचना स्वीकार करते ही फोन पर धमकियां मिलने लगी थीं। कहा जाने लगा- पैसा ले के चुप हो जाओ, वरना जान से हाथ धोना पड़ेगा।
- विधानसभा में चारा घोटाला उठाने पर निर्दलीय विधायक दिलीप वर्मा को धमकी मिली थी।
- जनवरी 1996 में चारा घोटाला उजागर हुआ था, पर उससे तीन साल पहले 1993 में ही दिलीप वर्मा ने विधानसभा में इस मामले को उठाने की कोशिश की थी। इसके बाद उन्हें कई स्तरों पर धमकी मिलने लगी थी।
- तब बाहुबली विधायक पप्पू यादव ने दिलीप वर्मा से कहा था- भईया इस मामले को छोड़ दीजिए।
- यह वाकया दिलीप वर्मा ने भास्कर को बताया। कहा-हमने पप्पू की मांग को अनसुना कर विधानसभा में दोबारा एक साल बाद ध्यानाकर्षण सूचना उठाई तो 16 मार्च 1994 को उसे स्वीकृत करना पड़ा। पर बजट सत्र में सदन में बहस नहीं कराने पर मानसून सत्र में मजबूर होकर विधानसभा में गेट पर धरना देना पड़ा।
- धरने पर बैठते ही सीएम लालू प्रसाद और विपक्ष के नेता जगन्नाथ मिश्रा ने आकर कहा कि दिलीप जी ये क्या कर रहे हैं? इसके पहले ध्यानाकर्षण सूचना स्वीकार करते ही फोन पर धमकियां मिलने लगी थीं। कहा जाने लगा- पैसा ले के चुप हो जाओ, वरना जान से हाथ धोना पड़ेगा।
वकील भी समझाने लगे थे- वो लोग खतरनाक हैं, फेरे में पड़ जाइएगा
- विधानसभा में मामला दबाने की कोशिश को देखते हुए चारा घोटाला को उजागर करने पर अड़े दिलीप वर्मा घोटाला से जुड़ी फाइलों को लेकर वकील के पास पहुंचे।
- वर्मा ने बताया कि एक बड़े वकील ने समझाया था कि क्यों ऐसे मामलों में पड़ रहे हैं। वो खतरनाक लोग हैं। नाहक फेरे में पड़ जाइएगा। लेकिन चारा घोटाला से जुड़े मामलों की उच्चस्तरीय जांच की अनुशंसा वाले तब के मंत्री रामजीवन सिंह के कागजातों को लेकर दिलीप वर्मा लगातार दौड़ते रहे।
- अंतत: उन्होंने तब के एक जाने-माने वकील के पुत्र और अपने साढ़ू भाई से संपर्क साधा। इससे पहले कि वो मामले को अदालत में ले जाते, उनका निधन हो गया। मामला कोर्ट में जाने से रह गया।
- विधानसभा में मामला दबाने की कोशिश को देखते हुए चारा घोटाला को उजागर करने पर अड़े दिलीप वर्मा घोटाला से जुड़ी फाइलों को लेकर वकील के पास पहुंचे।
- वर्मा ने बताया कि एक बड़े वकील ने समझाया था कि क्यों ऐसे मामलों में पड़ रहे हैं। वो खतरनाक लोग हैं। नाहक फेरे में पड़ जाइएगा। लेकिन चारा घोटाला से जुड़े मामलों की उच्चस्तरीय जांच की अनुशंसा वाले तब के मंत्री रामजीवन सिंह के कागजातों को लेकर दिलीप वर्मा लगातार दौड़ते रहे।
- अंतत: उन्होंने तब के एक जाने-माने वकील के पुत्र और अपने साढ़ू भाई से संपर्क साधा। इससे पहले कि वो मामले को अदालत में ले जाते, उनका निधन हो गया। मामला कोर्ट में जाने से रह गया।
1996 में दर्ज चारा घोटाले के खास पड़ाव
- 27 जनवरी 1996 को पहला मामला चाईबासा थाने में 04/96 दर्ज किया गया।
- 11मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए।
- 19 मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने राज्य पुलिस द्वारा दर्ज 41 मामलों को अपने अधीन लेकर जांच शुरू की।
- कांड संख्या आरसी 20(ए)/96 स्पेशल जज एके लाल की अदालत में सीबीआई ने लालू प्रसाद सहित 56 आरोपियों के खिलाफ 23 जून 1997 को भादवि की धारा 120 बी, 409, 420, 467, 468, 477ए और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13(2) 13(1)(डी) के तहत चार्जशीट दायर।
- 23 जुलाई 1997 को कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ संज्ञान पारित किया।
- 24 जुलाई 1997 और 31 अक्टूबर 1997 को सभी आरोपी कोर्ट के समक्ष हाजिर हुए।
- कोर्ट ने पांच अप्रैल 2000 को आरोपियों के खिलाफ चार्ज फ्रेम किया।
- राज्य गठन के बाद यह मामला रांची स्थानांतरित कर दिया गया।
- पूर्व सीएम लालू प्रसाद का बयान 14 फरवरी 2012 को कोर्ट में दर्ज किया गया।
- लालू प्रसाद की ओर से बिहार के पूर्व डीजीपी डीपी ओझा सहित 20 गवाहों ने गवाही दी थी।
- 11मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए।
- 19 मार्च 1996 को पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने राज्य पुलिस द्वारा दर्ज 41 मामलों को अपने अधीन लेकर जांच शुरू की।
- कांड संख्या आरसी 20(ए)/96 स्पेशल जज एके लाल की अदालत में सीबीआई ने लालू प्रसाद सहित 56 आरोपियों के खिलाफ 23 जून 1997 को भादवि की धारा 120 बी, 409, 420, 467, 468, 477ए और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13(2) 13(1)(डी) के तहत चार्जशीट दायर।
- 23 जुलाई 1997 को कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ संज्ञान पारित किया।
- 24 जुलाई 1997 और 31 अक्टूबर 1997 को सभी आरोपी कोर्ट के समक्ष हाजिर हुए।
- कोर्ट ने पांच अप्रैल 2000 को आरोपियों के खिलाफ चार्ज फ्रेम किया।
- राज्य गठन के बाद यह मामला रांची स्थानांतरित कर दिया गया।
- पूर्व सीएम लालू प्रसाद का बयान 14 फरवरी 2012 को कोर्ट में दर्ज किया गया।
- लालू प्रसाद की ओर से बिहार के पूर्व डीजीपी डीपी ओझा सहित 20 गवाहों ने गवाही दी थी।
(इनपुट समाचार एजेंसी)
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