आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
हिमाचल और गुजरात चुनाव के नतीजे आ चुके है। दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकार बनाने की कवायत शुरू हो चुकी है। केंद्र में जब से नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली है तभी देश के अधिकतर राज्यों में बीजेपी अपनी जीत का परचम लहरा चुकी है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से कांग्रेस का हर राज्य से पत्ता साफ़ होता जा रहा है। अब महज ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार बची है। गुजरात चुनाव में बीजेपी ने लगातर 6वीं बार जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया है।
गुजरात में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अपनी सत्ता बरकरार रखने में सफल रही है। कांग्रेस ने हालांकि यहां पांच वर्ष पूर्व हुए विधानसभा चुनाव के मुकाबले अपने आंकड़ों में सुधार किया है। निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी ने कुल 99 सीटों पर जीत दर्ज की है और कांग्रेस को यहां 77 सीटों पर जीत मिली। निर्दलीयों ने तीन, भारतीय ट्रायबल पार्टी को दो व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को एक सीट मिली है। भाजपा ने पूरे गुजरात व दिल्ली में जीत की खुशी मनाई, हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताबड़तोड़ चुनावी अभियान के बावजूद पार्टी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा गुजरात में 150 सीटें जीतने के दावे से बहुत दूर रह गई और पार्टी यहां 2012 के विधानसभा चुनाव से 16 सीटें कम जीत पाई है।
कांग्रेस अपने नवनियुक्त पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी की अगुवाई में पूरे गुजरात में चुनाव प्रचार करने के बाद यहां 77 सीट जीतने में सफल हो पाई है, जोकि पिछले विधानसभा चुनाव से ज्यादा है।
संसद के बाहर मोदी ने जीत का निशान (वी साइन) दिखाया। मोदी ने बाद में ट्वीट किया कि नतीजे बताते हैं कि लोगों ने गुजरात विकास मॉडल को अपनाया है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा के वोट प्रतिशत में भी यहां कमी दर्ज की गई है। भाजपा को यहां 2014 लोकसभा चुनाव में 60.11 प्रतिशत मत मिले थे, वहीं इस चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत घटकर 49.1 प्रतिशत रह गया है।
स्मरण होते हैं, पंडित दीन दयाल उपाध्याय के शब्द कि "पार्टी (तत्कालीन जनसंघ) नेताओं को विजयी सीटों की बजाए, इस बात का ध्यान देना चाहिए कि कितना वोट प्रतिशत वृद्धि हुई है।" .
पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवानी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर से हाथ मिला कर कांग्रेस के मत प्रतिशत में इजाफा हुआ है। पार्टी ने 2014 लोकसभा चुनाव में यहां 33.45 प्रतिशत मत पाए थे, जबकि इस चुनाव में पार्टी को 41.4 प्रतिशत मत मिले हैं।
केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने गुजरात जीत पर कहा, ‘जो जीता वही सिकन्दर।’
भाजपा हालांकि राज्य की 182 सदस्यीय विधानसभा में 99 सीटों के साथ सरकार आसानी से बना लेगी।सदन में बहुमत के लिए 92 सीटों की जरूरत है।
मुख्यमंत्री विजय रूपानी(राजकोट पश्चिम) और उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल (मेहसाणा) एक वक्त कांग्रेस उम्मीदवारों से पिछड़ते दिखाई दे रहे थे, लेकिन बाद में दोनों ने बढ़त बनाई. मुख्यमंत्री रूपानी ने 53,755 मतों के अंतर से तथा पटेल ने 7,137 मतों से जीत दर्ज की.
भाजपा अध्यक्ष बार-बार दावा करते रहे हैं कि पार्टी 150 सीटें जीतेगी।
एक समय ऐसा भी आया, जब कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त बना ली थी और इससे उत्साहित और खुश कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अहमदाबाद और गांधीनगर में जश्न मनाना शुरू कर दिया था। लेकिन कांग्रेस का जश्न थोड़ी देर ही टिक सका।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में कहा, ‘हम गुजरात और हिमाचल प्रदेश दोनों राज्यों में सरकार बनाएंगे।.’
इससे पहले कांग्रेस प्रवक्ता शोभा ओझा ने पार्टी के जीतने की उम्मीद जताई थी। उन्होंने कहा, ‘लोग गुजरात में भाजपा के 22 साल के कुशासन से थक गए है। भाजपा जिस गुजरात मॉडल की छाती ठोककर बात करती है, उसने गुजरात में काम नहीं किया. हमें विश्वास है कि हम गुजरात में सरकार बनाएंगे।’
भाजपा ने दक्षिण गुजरात, मध्य गुजरात और उत्तर गुजरात में बेहतर प्रदर्शन किया है। कांग्रेस ने सौराष्ट्र में अच्छा प्रदर्शन किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में पहली बार विधानसभा चुनाव हुआ है।
कौन होगा मुख्यमंत्री विजय रुपाणी, पुरुषोत्तम रुपाला, स्मृति ईरानी या अमित शाह ?
गुजरात में बीजेपी अपनी विजय में विजय रुपाणी का कोई योगदान नही ढूंढ़ पा रही है। बीजेपी शतक लगाने से भी चूक गई हालांकि विजय रुपाणी अपनी सीट बचाने में जरूर कामयाब रहे। सीट बचाने के चक्कर में गुजरात चुनाव प्रचार में मोदी शाह की तरह छाप छोड़ने में भी विफल रहे। संख्या कम होने के बाद नई सरकार के सामने चुनौतियां भी अधिक होंगी। हार्दिक पटेल आंदोलन की धमकी दे ही चुके है। अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी भी विधानसभा में पहुंच चुके है। विपक्ष भी संख्याबल में अब कम नही है, ऐसे में नए सियासी समीकरण को देखते हुए मौजूदा सीएम विजय रुपाणी के नाम पर एकराय नहीं है। ऐसे में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला या स्मृति ईरानी की भी लॉटरी लग सकती है।
बीजेपी को चाहिए एक सख्त प्रशासक
बीजेपी आलाकमान को ऐसे में एक सख्त प्रशासक की जरूरत महसूस होने लगी है। दरअसल, बीजेपी नेतृत्व को गुजरात की कमान किसी मंझे नेता के हाथ में देने की जरूरत महसूस हो रही है। जैन बिरादरी के विजय रुपाणी अपने कार्यकाल के दौरान दलित, ओबीसी और पाटीदार आंदोलन को संभालने में नाकाम साबित हुए है। फिर जैन बिरादरी की आबादी राज्य में बेहद कम है। ऐसे में राज्य बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और पाटीदार समुदाय के पुरुषोत्तम रुपाला को कमान दिए जाने की चर्चा ज्यादा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में गुजरात से मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का तुरुप का इक्का माना जाता है। पाटीदार आंदोलन में पुरुषोत्तम रूपाला सरकार की तरफ से सीधी टक्कर दे रहे थे। रुपाला कडवा पाटीदार समुदाय से आते हैं तथा गुजरात के कददावर नेता माने जाते है। हालांकि पार्टी सूत्रों का कहना है कि हो सकता है कि यह फैसला बाद में लिया जाए, क्योंकि इसके लिए अब नेतृत्व के पास बहुत समय है। मगर यह निश्चित है कि अगर विजय रुपाणी की दोबारा ताजपोशी हुई भी तो कार्यकाल बेहद छोटा होगा।
लेकिन सत्ता के गलियारों में अब सबसे बड़ा मुद्दा यह उठ रहा है कि गुजरात में सीएम कौन बनेगा ? सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार हिमाचल में भी सीएम का चेहरा कोई और हो सकता है। अब गुजरात में सीएम पद को लेकर अटकलें तेज हो गयी है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भले ही गुजरात में बीजेपी की सरकार बन गयी है लेकिन गुजरात के सीएम विजय रुपानी का विरोध लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है।
विरोध को देखकर अनुमान लगाया जा रहा है कि विजय रुपानी को सीएम पद का कार्यभार नहीं दिया जाएगा। अब यह देखने वाली यह बात है कि बीजेपी किस चेहरे को गुजरात में लेकर आएगी। गुजरात में इस पद का कार्यभार कौन संभाल सकते है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जो नाम बताया जा रहा है उसे सुनकर आपके होश उड़ना तय है। गुजरात में इस पद की जिम्मेदारी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को दी जा सकती है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अमित शाह का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय बताया जा रहा है। अमित शाह के नाम होने से सियासी हलचलें तेज हो गयी हैं और राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गयी है।
राजनीतिक गलियारों में खलबली मचने का मुख्य कारण है, अमित शाह की नरेन्द्र मोदी से कहीं अधिक सख्त कार्यशैली। 2002 में हुए गोधरा दंगों पर अगर मोदी ने सख्ती अपनायी थी, तो गृह मंत्री के रूप में अमित मोदी से कहीं अधिक सख्त दिखाई दे रहे थे। शायद यही मुख्य कारण था कि दंगे के आरोपियों को पकड़ने में राज्य सरकार सफल हुई और तब से किसी में दंगा करने का साहस नहीं हुआ और दंगा पीड़ित राज्य के नाम से चर्चित गुजरात आज तक दंगा मुक्त है। और इस समय मोदी की अनुपस्थिति का वही तत्व पुनः लाभ उठा कर अपनी पैठ मजबूत करने में व्यस्त हैं। उसमे सेंध मारने में जितनी अमित में महारथ है, उतनी शायद स्मृति ईरानी या पुरुषोत्तम रुपाला में नहीं।
वैसे ईरानी अथवा पुरुषोत्तम के सख्ती को कम आंकना गलत भी हो सकता है, परन्तु इन तीन वर्षों में गुजरात में इन तत्वों ने जिस तरह आरक्षण के नाम पर अपनी पैठ बनाई है, उसे कुचलने में अमित ही सफल हो सकते हैं। वरना वर्तमान परिस्थिति को देखते अगले चुनाव में गुजरात के हाथ से निकलने की पूरी सम्भावना है। क्योकि इस समय गुजरात बचा मोदी और अमित की मेहनत से, तत्कालीन मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री की खातिर नहीं। क्योकि ये बस अपनी कुर्सी बचाने में लगे हुए थे।

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