
आर.बी.एल निगम, वरिष्ठ पत्रकार
कई सालो बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने भगवान् चित्रगुप्त जयंती की छुट्टी घोषित की है I प्रदेश सरकार द्वारा जारी २०१८ के कलेंडर में इस 9 नवम्बर को भगवान् चित्रगुप्त जयंती की छुट्टी दर्शाई गयी है I आज शाम को जब इसकी जानकारी सोशल मीडिया पर आई तो लोगो ने इसके लिए प्रदेश सरकार , मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्वास्थ मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह को इसके लिए बधाई दी I
वैसे प्राप्त सूचना के अनुसार, छुट्टी का प्रावधान 2014 से था। परन्तु किसी स्तर पर कोई चर्चा होने के कारण अनदेखा किया जाता रहा। दूसरे आज इस छुट्टी पर इतनी चर्चा होने का यह भी अर्थ निकाला जाता सकता है कि छुट्टी मात्र रिकॉर्ड होने के कारण महत्व न दिया जा रहा हो। कई कारण हो सकते हैं ,अन्यथा इतने वर्षों से छुट्टी हो और अब घोषित होने पर कायस्थ द्वारा ख़ुशी व्यक्त करने का कारण हो।
गौरतलब है की कई दशको बाद कायस्थ समाज को कद्दावर नेता होने का फायदा मिल रहा है I उत्तर प्रदेश में कायस्थ समाज को पिछले काफी समय से बीजेपी के नेताओं ने फिर से महत्व देना शुरू किया है, पिछले दिनों लखनऊ में उपस्थित हुए एक कार्यक्रम में भी गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी एक बड़े कायस्थ समारोह में कायस्थ समाज की तारीफ करते हुए उसे समाज को दिशा देने वाला बताया था I
परेवा काल शुरू हो चुका है और आज के दिन कायस्थ समाज कलम का प्रयोग नहीं करता है यानी किसी भी तरह का का हिसाब कितना नहीं करता है I कई लोगो के इस पर फ़ोन आये की आखिर ऐसा क्यूँ है की पश्चिमी उत्तरप्रदेश में कायस्थ दीपावली के पूजन के कलम रख देते है और फिर कलम दवात पूजन के दिन ही उसे उठाते है I
इसको लेकर सर्व समाज के भी कई सवाल अक्सर लोग कायस्थों से करते है, ऐसे में अपने ही इतिहास से अनभिग्य कायस्थ युवा पीड़ी इसका कोई समुचित उत्तर नहीं दे पाती है I कायस्थ खबर ने जब इसकी खोज की तो इससे सम्बंधित एक बहुत रोचक घटना का संदर्भ हमें किवदंतियों में मिला I
कहते है जब भगवान् राम दशानन रावण को मार कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके खडाऊं को राजसिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत ने गुरु वशिष्ठ को भगवान् राम के राज्यतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की वयवस्था करने को कहा I गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने शिष्यों को सौंप कर राज्यतिलक की तैयारी शुरू कर दीं I
ऐसे में जब राज्यतिलक में सभी देवीदेवता आ गए तब भगवान् राम ने अपने अनुज भरत से पूछा चित्रगुप्त नहीं दिखाई दे रहे है इस पर जब खोज बीन हुई तो पता चला की गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त को निमत्रण पहुंचाया ही नहीं था जिसके चलते भगवान् चित्रगुप्त नहीं आये I इधर भगवान् चित्रगुप्त सब जान तो चुके थे और इसे भी नारायण के अवतार प्रभु राम की महिमा समझ रहे थे फलस्वरूप उन्होंने गुरु वशिष्ठ की इस भूल को अक्षम्य मानते हुए यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा जोखा लिखने वाली कलम को उठा कर किनारे रख दिया I
सभी देवी देवता जैसे ही राजतिलक से लौटे तो पाया की स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे , प्राणियों का का लेखा जोखा ना लिखे जाने के चलते ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था की किसको कहाँ भेजे I तब गुरु वशिष्ठ की इस गलती को समझते हुएभगवान राम ने अयोध्या में भगवान् विष्णु द्वारा स्थापित भगवान चित्रगुप्त के मंदिर ( श्री अयोध्या महात्मय में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता।) में गुरु वशिष्ठ के साथ जाकर भगवान चित्रगुप्त की स्तुति की और गुरु वशिष्ठ की गलती के लिए क्षमायाचना की, जिसके बाद नारायण रूपी भगवान राम के आदेश मानकर भगवान चित्रगुप्त ने लगभग ४ पहर (२४ घंटे बाद ) पुन: कलम की पूजा करने के पश्चात उसको उठाया और प्राणियों का लेखा जोखा लिखने का कार्य आरम्भ किया I कहते तभी से कायस्थ दीपावली की पूजा के पश्चात कलम को रख देते हैं और यम द्वीत्या के दिन भगवान चित्रगुप्त का विधिवत कलम दवात पूजन करके ही कलम को धारण करते है
कहते है तभी से कायस्थ ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय हुए और इस घटना के पश्चात मिले वरदान के फलस्वरूप सबसे दान लेने वाले ब्राह्मणों से दान लेने का हक़ भी कायस्थों को ही है I
अवलोकन करिए:--
कायस्थ वृन्द के धीरेन्द्र श्रीवास्तव ने इस पर ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा की हम योगी सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते है I वही भगवान चित्रगुप्त के प्रसार प्रसार में लगी कायस्थ वृन्द की मुख्य समंवयिकता डा ज्योति श्रीवास्तव ने कायस्थ समाज को इसके लिए बधाई दी है
इलाहबाद से एडवोकेट दिलीप श्रीवास्तव ने बधाई देते हुए कहा उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 नवम्बर को चित्रगुप्त जयन्ती अवकाश घोषित किया है। इस दिन भैया दूज भी है।
पौराणिक कथा के अनुसार, अयोध्या लौटने पर पुरुषोत्तम श्रीराम के राजतिलक में भगवान श्री चित्रगुप्तजी महाराज को निमन्त्रित न किए जाने पर क्रोध में जनमानस के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा लिखना छोड़ दिया, तो दूसरी तरफ अपने राजतिलक में श्री चित्रगुप्त जी महाराज को अनुपस्थित देख श्रीराम इतने विचलित हुए थे कि तुरन्त इसका कारण जानने के लिए सब पर अप्रसन्नता व्यक्त की। समारोह संपन्न होने उपरान्त भगवान श्री विष्णु, जो स्वयं राम थे, ने भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज से क्षमा माँगी। ततउपरान्त तीन दिनों के ढप कार्य को चौबीस घंटे कार्य कर पूर्ण किया और उस दिन से उस दिन से यह दिवस कायस्थ "यमदुतिया" और अन्य जनमानस "भाईदूज" के रूप में मनाते हैं। इस दिन कायस्थ समाज कलम-दवात की पूजा करता है।
उज्जैन नगरी के यमुना तलाई के किनारे एक मंदिर में चित्रगुप्त एवं धर्मराज एक साथ विराजे हैं। यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है। मान्यता है कि इस मंदिर में कलम, दवात व डायरी चढ़ाने मात्र से मनोकामना पूरी हो जाती है। यही कारण है कि इस मंदिर में दर्शन करने आने वाले श्रद्घालुओं के हाथों में फल-फूल न होकर कलम, स्याही और डायरी नजर आती है।
भारत में जितने प्रतिष्ठित स्थानों पर कायस्थ समाज ने अपनी सेवायें दी, वहाँ वर्षों तक उनके महत्व को याद किया जाता रहा है। अनेकों ने तो इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करवा दिया है। भारतीय इतिहास से उनका नाम अनदेखा नहीं किया जा सकता।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद(श्रीवास्तव), जिन्होंने इस उच्चतम पद को गरिमा दी, उसे कुछ सीमा तक दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने तो गरिमा प्रदान की, परन्तु आज तक कोई महामहिम उस गरिमा को बनाए रखने में उतने सफल नहीं रहे। राजन बाबू ने देश और जनहित में निर्णय लेने में प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू की हर चाल को दरकिनार किया। शायद यही कारण है राजन बाबू के स्वर्गवास होने उपरान्त एक से बढ़कर एक सरकार आयी, लेकिन किसी ने न उन्हें जन्मदिवस या पुन्यतिथि पर याद करने का साहस किया। सोमनाथ मन्दिर के जीणोंद्वार होने उपरान्त नेहरू ने उद्घाटन करने से रोकने का अपनी एड़ी से चोटी तक का जोर लगा दिया, परन्तु नेहरू के विरोधों को ठोकर मार गुजरात जाकर सोमनाथ मन्दिर का उद्घाटन किया।
फिर लाल बहादुर शास्त्री(श्रीवास्तव) ने केवल अपने 18 माह के कार्यों से नेहरू के 18 वर्षों को भुलवा दिया था। इंदिरा गाँधी जिसे "लौहमहिला" के नाम से अलंकृत किया था, तत्कालीन नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी संसद में "दुर्गा" की उपाधि से अलंकृत करने से नहीं चुके। लेकिन किसी ने उनकी रहस्यमयी मृत्यु से पर्दा उठाने का साहस नहीं किया। क्योकि 1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान दुश्मन की सहायता करने के वालों के विरुद्ध युद्ध के चलते सख्त कार्यवाही करने से नहीं चुके। किसी नेता में शास्त्रीजी द्वारा तुष्टिकरण को त्याग देश में धर्म-निरपेक्षता की जो मिसाल पेश की थी, का गुणगान करने का साहस नहीं। आज तो आतंकवादी के समर्थन में नेता तक सड़क पर उतर आते हैं, और सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाही करने से डरती है। वर्तमान सरकार में भी शास्त्री की धर्म-निरपेक्षता की प्रशंसा करने का साहस नहीं।
भारत के संविधान में लिथोग्राफी में पृष्ठों का हस्त-लेखन करने वाला भी सक्सेना कायस्थ ही था। सूची बहुत लम्बी है।
संक्षेप में इतना ही कहना है, कायस्थ जब-जब किसी भी उच्च पद पर विराजमान हुआ है, तुष्टिकरण को ठोकर मार धर्म-निरपेक्षता पर कार्य करता है। अन्यथा मृत्यु उपरान्त हमारे कर्मों के अनुसार स्वर्ग अथवा नर्क प्रदान करने का निष्पक्ष कार्य भगवान श्री चित्रगुप्तजी महाराज करने में सक्षम नहीं होते।
पौराणिक कथा के अनुसार, अयोध्या लौटने पर पुरुषोत्तम श्रीराम के राजतिलक में भगवान श्री चित्रगुप्तजी महाराज को निमन्त्रित न किए जाने पर क्रोध में जनमानस के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा लिखना छोड़ दिया, तो दूसरी तरफ अपने राजतिलक में श्री चित्रगुप्त जी महाराज को अनुपस्थित देख श्रीराम इतने विचलित हुए थे कि तुरन्त इसका कारण जानने के लिए सब पर अप्रसन्नता व्यक्त की। समारोह संपन्न होने उपरान्त भगवान श्री विष्णु, जो स्वयं राम थे, ने भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज से क्षमा माँगी। ततउपरान्त तीन दिनों के ढप कार्य को चौबीस घंटे कार्य कर पूर्ण किया और उस दिन से उस दिन से यह दिवस कायस्थ "यमदुतिया" और अन्य जनमानस "भाईदूज" के रूप में मनाते हैं। इस दिन कायस्थ समाज कलम-दवात की पूजा करता है।
कहा जाता है कि भाग्य तो जन्म के साथ ही लिखा जाता है, मगर एक स्थान ऐसा है जहां कागज, कलम और दवात चढ़ाने से भाग्य बदलकर नए सिरे से भाग्य का उदय हो जाता है। यह स्थान मध्य प्रदेश में महाकाल की नगरी उज्जैन में है, जहां भगवान चित्रगुप्त और धर्मराज एक साथ मिलकर आशीर्वाद देते हैं।
उज्जैन नगरी के यमुना तलाई के किनारे एक मंदिर में चित्रगुप्त एवं धर्मराज एक साथ विराजे हैं। यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है। मान्यता है कि इस मंदिर में कलम, दवात व डायरी चढ़ाने मात्र से मनोकामना पूरी हो जाती है। यही कारण है कि इस मंदिर में दर्शन करने आने वाले श्रद्घालुओं के हाथों में फल-फूल न होकर कलम, स्याही और डायरी नजर आती है।
चित्रगुप्त और धर्मराज की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग कथाएं है। भगवान चित्रगुप्त के बारे में कहा जाता है कि इनकी उत्पत्ति स्वयं ब्रह्मा जी के हजारों साल के तप से हुई है। बात उस समय की है जब महाप्रलय के बाद सृष्टि की उत्पत्ति होने पर धर्मराज ने ब्रह्मा से कहा कि इतनी बड़ी सृष्टि का भार मैं संभाल नहीं सकता।
ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए कई हजार वर्षो तक तपस्या की और उसके फलस्वरूप ब्रह्मा जी के सामने एक हाथ में पुस्तक तथा दूसरे हाथ में कलम लिए दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। जिनका नाम ब्रह्मा जी ने चित्रगुप्त रखा।
ब्रह्मा जी ने चित्रगुप्त से कहा कि आपकी उत्पत्ति मनुष्य कल्याण और मनुष्य के कर्मो का लेखा जोखा रखने के लिए हुई है अत: मृत्युलोक के प्राणियों के कर्मो का लेखा जोखा रखने और पाप-पुण्य का निर्णय करने के लिए आपको बहुत शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी, इसलिए आप महाकाल की नगरी उज्जैन में जाकर तपस्या करें और मानव कल्याण के लिए शक्तियां अर्जित करे।
कहा जाता है कि ब्रह्मा जी के आदेश पर चित्रगुप्त महाराज ने उज्जैन में हजारों साल तक तपस्या कर मानव कल्याण के लिए सिद्घियां एव शक्तियां प्राप्त की। भगवान चित्रगुप्त की उपासना से सुख-शांति और समृद्घि प्राप्त होती है और मनुष्य का भाग्य उज्जवल हो जाता है। इनकी विशेष पूजा कार्तिक शुक्ल तथा चैत्र कृष्ण पक्ष की द्वितीया को की जाती है।
भगवान चित्रगुप्त के पूजन में कलम और दवात का बहुत महत्व है। उज्जैन को भगवान चित्रगुप्त की तप स्थली के रूप में जाना जाता है। धर्मराज के बारे में पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि वह दीपावली के बाद आने वाली भाई दूज पर यहां अपनी बहन यमुना से राखी बंधाने आए थे तभी से वह इस स्थान पर विराजित हैं। कहा जाता है कि धर्मराज द्वारा यहां पर अपनी बहन से दूज के दिन राखी बंधवाने के बाद से भाई दूज मनाया जा रहा है। आज भी यहां पर धर्मराज और चित्रगुप्त मंदिर के सामने यमुना सागर स्थित है। श्रद्घालुओं को इनके दर्शन व पूजन करने से मोक्ष मिलता है।
चित्रगुप्त जी के ठीक सामने चारभुजाधारी धर्मराज जी एक हाथ में अमृत कलश दो हाथों में शस्त्र एवं एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा के साथ विराजित है। धर्मराज की मूर्ति के दोनों ओर मनुष्यों को अपने कर्मों की सजा देते यमराज के दूत हैं। इतना ही नहीं ब्रम्हा, विष्णु महेश की भी प्रतिमाएं हैं।
" चित्रगुप्त नमस्तुभ्याम वेदाक्सरदत्रे
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद(श्रीवास्तव), जिन्होंने इस उच्चतम पद को गरिमा दी, उसे कुछ सीमा तक दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने तो गरिमा प्रदान की, परन्तु आज तक कोई महामहिम उस गरिमा को बनाए रखने में उतने सफल नहीं रहे। राजन बाबू ने देश और जनहित में निर्णय लेने में प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू की हर चाल को दरकिनार किया। शायद यही कारण है राजन बाबू के स्वर्गवास होने उपरान्त एक से बढ़कर एक सरकार आयी, लेकिन किसी ने न उन्हें जन्मदिवस या पुन्यतिथि पर याद करने का साहस किया। सोमनाथ मन्दिर के जीणोंद्वार होने उपरान्त नेहरू ने उद्घाटन करने से रोकने का अपनी एड़ी से चोटी तक का जोर लगा दिया, परन्तु नेहरू के विरोधों को ठोकर मार गुजरात जाकर सोमनाथ मन्दिर का उद्घाटन किया।
फिर लाल बहादुर शास्त्री(श्रीवास्तव) ने केवल अपने 18 माह के कार्यों से नेहरू के 18 वर्षों को भुलवा दिया था। इंदिरा गाँधी जिसे "लौहमहिला" के नाम से अलंकृत किया था, तत्कालीन नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी संसद में "दुर्गा" की उपाधि से अलंकृत करने से नहीं चुके। लेकिन किसी ने उनकी रहस्यमयी मृत्यु से पर्दा उठाने का साहस नहीं किया। क्योकि 1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान दुश्मन की सहायता करने के वालों के विरुद्ध युद्ध के चलते सख्त कार्यवाही करने से नहीं चुके। किसी नेता में शास्त्रीजी द्वारा तुष्टिकरण को त्याग देश में धर्म-निरपेक्षता की जो मिसाल पेश की थी, का गुणगान करने का साहस नहीं। आज तो आतंकवादी के समर्थन में नेता तक सड़क पर उतर आते हैं, और सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाही करने से डरती है। वर्तमान सरकार में भी शास्त्री की धर्म-निरपेक्षता की प्रशंसा करने का साहस नहीं।
भारत के संविधान में लिथोग्राफी में पृष्ठों का हस्त-लेखन करने वाला भी सक्सेना कायस्थ ही था। सूची बहुत लम्बी है।
संक्षेप में इतना ही कहना है, कायस्थ जब-जब किसी भी उच्च पद पर विराजमान हुआ है, तुष्टिकरण को ठोकर मार धर्म-निरपेक्षता पर कार्य करता है। अन्यथा मृत्यु उपरान्त हमारे कर्मों के अनुसार स्वर्ग अथवा नर्क प्रदान करने का निष्पक्ष कार्य भगवान श्री चित्रगुप्तजी महाराज करने में सक्षम नहीं होते।

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