आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता, लेकिन बिहार से सांसद शत्रुघन सिन्हा पार्टी के ही विरुद्ध बयान देते नज़र आते हैं, तो नेहरू-गाँधी के वरुण गाँधी की भी चर्चा है कि वह अपने परिवार के साथ जाने की तत्पर हैं। इतना ही नहीं, दिल्ली विधान सभा में भी भाजपा की बुरी हार का कारण भी भीतरघात ही था, जिसे कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं। अगर भीतरघात नहीं होता, आप को किसी भी कीमत पर 67 सीटें नहीं मिलतीं। कुछ ही माह पूर्व दिल्ली में संपन्न हुए निगम चुनावों में क्या हुआ, किसी ने गंभीरता से आज तक मंथन नहीं किया, क्यों? कुछ मण्डलों ने न वोटर लिस्ट जाँच करवाई और न ही पर्चियां बाँटी, जबकि सभी पार्टियों ने पर्चियाँ बाँटी, मतदान वाले दिन मेज-कुर्सी तक नहीं दी गयी, किसी ने उम्मीदवार या मण्डल को इतनी गम्भीर लापरवाही के लिए तलब किया, पोलिंग बूथ इंचार्ज को सूचित किए बिना उसके पोलिंग पर जाना, क्या दर्शाता है?
भारतीय जनता पार्टी को दो सांसद और सात विधायक देने वाले उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले ने नगर निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ दल को करारा झटका दिया है। जिले की तीन नगर पालिका और चार नगर पंचायतों में से भाजपा को केवल दो सीटों पर ही सफलता मिल सकी है। बाकी पांचों सीटों पर बीजेपी की हार हुई है। कैसरगंज से बीजेपी सांसद और भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने नवाबगंज नगरपालिका सीट पर बगावती रुख अपनाते हुए पार्टी प्रत्याशी अंजू सिंह को हरवा दिया और अपने समर्थक सत्येन्द्र कुमार सिंह को बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जितवा दिया। इस सीट को लेकर योगी सरकार के समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री और सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बीच काफी तनातनी थी।
इस महीने के शुरुआत में ही सांसद ने कहा था कि नवाबगंज में पार्टी ने जिसे प्रत्याशी घोषित किया है, वह बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के नेताओं की करीबी रही हैं और उनके समय में भी अध्यक्ष रह चुकी हैं। उनकी सगी देवरानी को समाजवादी पार्टी ने प्रत्याशी घोषित किया है। लिहाजा, उन्हें हराने की कसम खाई थी। उन्होंने कहा था कि नवाबगंज में पार्टी इतनी कमजोर नहीं है कि उसे अपना प्रत्याशी न मिले।
सांसद ने कहा था कि अंजू सिंह और उनका परिवार न तो कभी पार्टी का प्राथमिक सदस्य रहा और न ही पार्टी से टिकट मांगा। ऐसे व्यक्ति को पार्टी उम्मीदवार बनाए जाने का कोई औचित्य नहीं था। सांसद ने कहा था कि इसलिए उन्होंने नवाबगंज में पार्टी के वफादार कार्यकर्ता का नामांकन करवाकर उसे प्रत्याशी बना दिया है। उन्होंने एलान किया था कि पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशी का विरोध करूंगा। चाहे इसका खामियाजा लोकसभा की सदस्यता गंवाकर ही क्यों न चुकाना पड़े।
महापौर की 16 में से 14 सीट पर भाजपा जीत चुकी है जबकि बसपा के प्रत्याशी 2 सीट पर जीते हैं। महापौर पद के चुनाव में बीते वर्ष सत्ता में रही समाजवादी पार्टी के साथ ही कांग्रेस भी मुकाबले से बाहर हो गई। गौरतलब है कि राज्य के 16 नगर निगम, 198 नगर पालिका परिषद और 439 नगर पंचायतों में चुनाव तीन चरणों में कराया गया था। कुल मिलाकर तीन चरणों के मतदान का प्रतिशत औसतन 52.5 प्रतिशत रहा। यह 2012 के चुनाव के 46.2 से करीब छह प्रतिशत ज्यादा है। मतदान को लेकर सबसे ज्यादा उदासीनता शहरों में देखने को मिली। सबसे कम मतदान नगर निगमों में हुआ, वहीं नगर पंचायतों में अच्छा उत्साह देखने को मिला। नगर निगमों में जहां करीब 41.26 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ, वहीं पालिका परिषद में 58 प्रतिशत और नगर पंचायतों में 68.30 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था।
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के गढ़ में BJP की करारी हार
उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में जहां बीजेपी की बल्ले-बल्ले है और ताजा रुझानों के मुताबिक 16 नगर निगमों में से 14 पर बीजेपी के उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं, वहीं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के गृह जिले कौशाम्बी में बीजेपी चारो खाने चित्त हो गई है। कौशाम्बी के सभी छह नगर पंचायतों में बीजेपी की हार हुई है। वहां बीजेपी का एक भी चेयरमैन नहीं जीत सका है। सिराथू नगर पंचायत क्षेत्र केशव प्रसाद मौर्य का गृह नगर है। यहां के नगर पंचायत चेयरमैन पद पर निर्दलीय उम्मीदवार राजेन्द्र यादव उर्फ भोला यादव ने जीत दर्ज की है। यादव ने बीजेपी प्रत्याशी प्रशांत केसरी को 1680 मतों से शिकस्त दिया है।
कौशाम्बी जिले के नगर पंचायत चायल से निर्दलीय शिवमणि केसरवानी की जीत हुई है, जबकि नगर पंचायत अझुवा से निर्दलीय अनिल कुमार जीत दर्कोज करने में कामयाब रहे हैं। नगर पंचायत मंझनपुर में बहुजन समाज पार्सटी के महताब आलम चेयरमैन चुने गए हैं। केशव प्रसाद मौर्य का राजनीतिक सफर कौशाम्बी से शुरू हुआ है। माना जाता है कि बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद में रहने के दौरान मौर्य की जिले में अच्छी पकड़ है। बावजूद इसके छह नगर पंचायत चेयरमैन के पद में से किसी भी एक पर उनकी पार्टी का उम्मीदवार नहीं जीत सका।
घर में ही बैकफुट पर भाजपा
सीएम सिटी गोरखपुर में भाजपा ने महापौर पद जीत कर परचम तो फहराया लेकिन पुराने वार्ड 68 का नतीजा पार्टी के लिए फीका रहा। उधर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के जिले कौशाम्बी में भाजपा नगर पंचायत की एक सीट ही जीत पायी, छह स्थानों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। है। भाजपा के दिग्गज नेता और अब राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के जिले अलीगढ़ में भी पार्टी को झटका लगा है।
यहां की मेयर की कुर्सी पर बसपा काबिज हो गयी है। अटल बिहारी बाजपेयी की कर्मभूमि व केन्द्रीय गृहमंत्री के संसदीय क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की मेयर पद पर यह लगातार पांचवीं जीत है, लेकिन पिछले चुनाव में डा. दिनेश शर्मा तकरीबन पौने दो लाख वोट से जीते थे, इस लिहाज से संयुक्ता भाटिया की जीत का अंतर कम रह जाना भी पार्टी के लिए चुनौती है, जबकि पार्षदों की संख्या पिछले के मुकाबले बढ़ी है। योगी सरकार में कद्दावर मंत्री आशुतोष टण्डन गोपालजी के विस क्षेत्र में पार्टी की पकड़ और ज्यादा मजबूत हुई है।
आठ महीने के बाद पहली परीक्षा माने जा रहे इस चुनाव में भाजपा ने 14 सीटों पर जीत हासिल की है। लखनऊ उत्तर में भाजपा को 13 सीटों के साथ जबरदस्त समर्थन मिला है।मेरठ में पार्टी की हार भी कमोवेश चौकाने वाली है। यहां लोकसभा चुनाव में पार्टी ने जीत दर्ज की थी, लेकिन स्थानीय समीकरणों के चलते पहले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मी कांत बाजपेयी को विस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। अब मेयर चुनाव में प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कर्दम हार गयीं। बात कौशाम्बी की करे तो यहां नगर पंचायत अध्यक्ष की सात सीटें हैं, इनमें भाजपा के हिस्से सिर्फ एक सीट ही आ पायी, छह अन्य सीटों पर पार्टी पूरी तरह चित्त हो गयी। यहां कांग्रेस, सपा व बसपा को एक-एक तथा निर्दलीय तीन उम्मीदवार जीते हैं।
सिराथू तक में भाजपा को निर्दल प्रत्याशी राजेन्द्र कुमार के सामने हार का सामना करना पड़ा, सिर्फ सराय आकिल में ही शिवदानी कमल खिलाने में कामयाब रहे, जबकि भरवारी का नतीजा देर शाम तक घोषित नही हो पाया। गोरखपुर में भी पुराना वार्ड 68 का नतीजा सुर्खियों में रहा। यहां से निर्दल मुस्लिम मंिहला नादिरा ने भाजपा की माया पर जीत दर्ज की।
घर में ही बैकफुट पर भाजपा
सीएम सिटी गोरखपुर में भाजपा ने महापौर पद जीत कर परचम तो फहराया लेकिन पुराने वार्ड 68 का नतीजा पार्टी के लिए फीका रहा। उधर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के जिले कौशाम्बी में भाजपा नगर पंचायत की एक सीट ही जीत पायी, छह स्थानों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। है। भाजपा के दिग्गज नेता और अब राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के जिले अलीगढ़ में भी पार्टी को झटका लगा है।
यहां की मेयर की कुर्सी पर बसपा काबिज हो गयी है। अटल बिहारी बाजपेयी की कर्मभूमि व केन्द्रीय गृहमंत्री के संसदीय क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की मेयर पद पर यह लगातार पांचवीं जीत है, लेकिन पिछले चुनाव में डा. दिनेश शर्मा तकरीबन पौने दो लाख वोट से जीते थे, इस लिहाज से संयुक्ता भाटिया की जीत का अंतर कम रह जाना भी पार्टी के लिए चुनौती है, जबकि पार्षदों की संख्या पिछले के मुकाबले बढ़ी है। योगी सरकार में कद्दावर मंत्री आशुतोष टण्डन गोपालजी के विस क्षेत्र में पार्टी की पकड़ और ज्यादा मजबूत हुई है।
आठ महीने के बाद पहली परीक्षा माने जा रहे इस चुनाव में भाजपा ने 14 सीटों पर जीत हासिल की है। लखनऊ उत्तर में भाजपा को 13 सीटों के साथ जबरदस्त समर्थन मिला है।मेरठ में पार्टी की हार भी कमोवेश चौकाने वाली है। यहां लोकसभा चुनाव में पार्टी ने जीत दर्ज की थी, लेकिन स्थानीय समीकरणों के चलते पहले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मी कांत बाजपेयी को विस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। अब मेयर चुनाव में प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कर्दम हार गयीं। बात कौशाम्बी की करे तो यहां नगर पंचायत अध्यक्ष की सात सीटें हैं, इनमें भाजपा के हिस्से सिर्फ एक सीट ही आ पायी, छह अन्य सीटों पर पार्टी पूरी तरह चित्त हो गयी। यहां कांग्रेस, सपा व बसपा को एक-एक तथा निर्दलीय तीन उम्मीदवार जीते हैं।
सिराथू तक में भाजपा को निर्दल प्रत्याशी राजेन्द्र कुमार के सामने हार का सामना करना पड़ा, सिर्फ सराय आकिल में ही शिवदानी कमल खिलाने में कामयाब रहे, जबकि भरवारी का नतीजा देर शाम तक घोषित नही हो पाया। गोरखपुर में भी पुराना वार्ड 68 का नतीजा सुर्खियों में रहा। यहां से निर्दल मुस्लिम मंिहला नादिरा ने भाजपा की माया पर जीत दर्ज की।

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