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| एक कार्यक्रम में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ सम्मानित करते कोठारी बंधुओं के वीर माता सुमित्रा देवी कोठारी को |
बाबरी मस्जिद गिराने की घटना को 25 साल बीत गये हैं. जब भी रामजन्म भूमि आन्दोलन की बात उठती है तो कोलकाता के कोठारी परिवार का नाम जरूर लिया जाता है. यह जानकर विस्मय होता है कि कारसेवा में अपने दो बेटे गंवाने के बाद उनके माता-पिता भी बाबरी मस्जिद ढाहने वाले कारसेवकों की सेवा कर रहे थे. आज ही के दिन इन बलिदानी कोठोरी बंधुओं की माता सुमित्रा देवी और पिता हीरालाल अपने बेटों के बलिदान को आगे बढ़ाते हुए 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या पहुंच गये थे. जब अयोध्या की पवित्र श्री राम जन्मभूमि में कारसेवा हो रही थी तो कोठारी बन्धुओं के माता पिता भी वहां सक्रिय थे.
आदि काल से हमारा भारत विदेशी ताकतों से लड़ता रहा है. मुगल हो या फिर ब्रिटिश शासन भारत और हमारे वीर हिंदुओं ने बहादुरी के साथ रहते हुये भारत मां और हिंदू धर्म की रक्षा की है. इसके लिये कितनों ने अपना बलिदान तक दे दिया है. कोलकाता से भी भारत मां के दो राम भक्त कार सेवक संतानों ने राममंदिर आंदोलन में अपनी शहादत दी है. उनके बलिदान को आज भी कोलकाता वासी आदर से स्मरण करते हैं. बड़ाबाजार के दो साहसी भाई राम और शरद कोठारी अमर हो गये हैं. कोलकाता के इन दोनों कोठारी बन्धुओं के बलिदान की अमर गाथा रोंगटे खड़ी कर देने वाली है. दो नवम्बर को इसी कारण बजरंग दल बलिदान दिवस मनाता है. जिसमें असंख्य हिन्दू बलिदानी कारसेवकों के बलिदान की स्मृति में रक्त दान करते है.
कोलकाता के बलिदानी कोठारी बंधुओं की कहानी
अयोध्या में जब राम मंदिर को लेकर आंदोलन शुरू हुआ तो देश भर से कारसेवक लाखों लाखों की संख्या में अयोध्या पहुंचने लगे थे. कोलकाता से भी दो भाई इस आंदोलन में शामिल होने के लिये रवाना हुये. केवल 23 साल के राम कोठारी और 21 साल के शरद कोठारी 22 अक्टूबर 1990 को श्री राम जन्मभूमि कारसेवा हेतु कोलकाता से अयोध्या के लिये चले गये. बहन पूर्णिमा, जिसका विवाह आठ दिसम्बर को होना था और वीर माता सुमित्रा तथा पिता हरीलाल को यह कह दोनों बजरंगी घर से निकले के दो नवम्बर को कार सेवा समाप्त कर घर लौट आयेंगे.
मंदिर बनवा कर ही आना, अपितु नहीं आना
वीर माता सुमित्रा देवी ने अपने दोनों लाल को विजय तिलक लगा यह कह कर भेजा कि बेटों घर आना तो मन्दिर बनवा कर ही आना. इसके बाद कोठारी बंधु कोलकाता से अयोध्या के लिये रवाना हो गये. 27 अक्टूबर को राम कोठारी द्वारा लिखित पत्र परिवार को मिला जिसमें लिखा था, अधिकांश कार सेवकों को मुग़लसराय रेलवे स्टेशन पर ही मुलायम सिंह की समाजवादी सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है.
जब फहरा दिया भगवा झंडा
मुलायम सरकार की पुलिस उस दिन दोनों कोठारी बंधुओं को नहीं रोक पायी. भाग्यवश दोनों कोठारी बंधु पुलिस को चकमा दे पैदल ही अयोध्या की ओर बढ़ने लगे. दूसरी ओर अयोध्या में कारसेवकों का आंदोलन जारी था. अयोध्या में उग्र आंदोलन को शांत करने के लिये मुलायम सरकार ने पुलिस को कठोर कदम उठाने और गोली चलाने तक के आदेश दे दिये थे. 2 नवम्बर को अयोध्या में तत्कालीन मुलायम सिंह की सरकार ने पुलिस को निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाने की अनुमति दे दी. इसके बाद यूपी की पुलिस ने कारसेवकों पर लाठीचार्ज किया. फायरिंग भी की. कोठारी बंधु भी इस आंदोलन में अदम्य साहस और वीरता के साथ अपना योगदान दे रहे थे. कोठारी बंधू ही पहले थे जिन्होंने पहली बार बाबरी मस्जिद पर भगवा लहराया था. 30 अक्टूबर को मंदिर परिसर में दोनों ने प्रवेश किया एवं शिखर पर भगवा ध्वज फहराया और भारत माता की जय के तुमुल उद्घोष के साथ ही सम्पूर्ण हिन्दू समाज को गौरवान्वित किया. 2 नवम्बर 1990 को कार्तिक पूर्णिमा के दिन कारसेवकों पर निर्ममता से गोलियां बरसायीं गयीं, जिसमें दोनों भाइयों रामकुमार कोठारी एवं शरद कोठारी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी.
मंदिर निर्माण के कार्य में हाथ बंटाना चाहती हैं वीर माता
कोठारी परिवार को उत्तर प्रदेश पुलिस ने सूचना दी कि दोनों कोठारी बन्धुओं राम और शरद को गोली लग गयी है और दोनों की लाशों को कोलकाता भेजा जा रहा है. उसके बाद अपने धर्म और अपने प्रभु श्रीराम के लिये बलिदान होने वाले इन दोनों भाइयों की मृत देह जब कोलकाता पहुंची तो बड़ाबाजार के रवींद्र सरणी, गणेश टाकीज कोठारी निवास के पास मानो पूरा बंगाल उमड़ पड़ा हो. दोनों बलिदानी भाइयों को आंसुओं के बीच विदाई दी गयी. जिस दिन कोठारी बंधुओं का अंतिम संस्कार होना था उस दिन पूरा बड़ाबाजार आंसुओं में डूब गया था. बलिदानी कोठारी बंधुओं के वीर माता-पिता ने कहा है कि अब मेरे पुत्रों का बलिदान सार्थक हुआ. वीरमाता सुमित्रा देवी कोठारी का कहना है कि एक बार अयोध्या जाकर मन्दिर के कार्य में हाथ बंटाना चाहते है. इसलिए मन्दिर निर्माण कार्य तुरन्त शुरू हो.
कोलकाता में आज भी इन पंतिक्तयों को बार-बार दोहराया जाता है कि
6 दिसंबर को कोठारी बजरंगियों के चित्र सजाता हूँ, पटाखे फोड़ हिन्दू शौर्य दिखाता हूँ, पर हर सांस घुट-घुट मरता जाता हूँ, ना राम ना कृष्ण की याद रही, सत्ता के गलियारों में कोई हिन्दू फ़रियाद ना रही, जूझ रहा हूँ खुद को इस भ्रम से बचा निकलूँ, वर्ना लाशों की इस मंडी में मेरी भी औकात नही होगी.
बलिदानी राम कोठारी एवं शरद कोठारी को माहेश्वरी रत्न
मालूम हो कि जागतिक माहेश्वरी महासभा द्वारा दिया जानेवाला माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च पुरस्कार “माहेश्वरी रत्न” वर्ष (सन 2015) अयोध्या राम मंदिर आंदोलन के प्रथम शहीद, अमर बलिदानी राम कोठारी एवं शरद कोठारी को संयुक्त रूप से दिया गया. उन्हें यह पुरस्कार मरणोपरांत मिला है. माहेश्वरी रत्न पुरस्कार पानेवाले कोठारी बंधु चौथे और पांचवे व्यक्ति है. इससे पूर्व में सन 2013 में यह पुरस्कार सेठ दामोदरजी राठी (मरणोपरांत) और माननीय न्यायमूर्ति जस्टिस रमेश चन्द्र लाहोटी, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (HON’BLE MR. JUSTICE R C LAHOTI, FORMER CHIEF JUSTICE OF INDIA.) को दिया गया था. जबकि साल 2014 में यह पुरस्कार नामांकित बिरला समूह के संस्थापक, स्वतंत्रता सेनानी घनश्याम दास बिरला मरणोपरांत दिया गया था.
किशोरावस्था से ही जुड़े हुये थे आरएसएस से
अमर हुतात्मा रामकुमार कोठारी का जन्म 27 जुलाई 1968 एवं शरद कोठारी का जन्म 14 अक्टूबर 1970 को कोलकाता में हुआ था. संत ह्रदय पिता हीरालाल कोठारी के संस्कारों से कोठारी बंधुओं ने अपनी शिक्षा पूरी की. शांत स्वभाव एवं मृदुभाषी होने के कारण दोनों सबके प्रिय बन गये. कोलकाता में बचपन से ही इन दोनों की लोकप्रियता थी. अल्पायु से ही कोठारी बंधुओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में संस्कारों की दीक्षा ली. साथ ही विभिन्न दायित्वों का पालन किया और इसी क्रम में 1989 से ही अयोध्या आन्दोलन में दोनों ने अपनी अग्रणी भूमिका निभाई.

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