
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
कांग्रेस में अध्यक्ष पद पर चुनाव प्रक्रिया के बीच पार्टी में वंशवाद का मामला उठाकर राहुल गांधी का विरोध शुरू हो गया है. कांग्रेस पार्टी के युवा नेता और महाराष्ट्र कांग्रेस के सचिव शहजाद पूनावाला ने कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए हो रहा यह चुनाव महज एक दिखावा है. यह चुनाव नहीं बल्कि चयन हो रहा है. शहजाद की इच्छा खुद चुनाव लड़ने की है. पूनावाला ने ट्वीट कर कहा, ‘पार्टी में एक मुद्दा कोई नहीं उठा रहा है- कांग्रेस में आवाज उठाने की हिम्मत होगी- वंशवाद और चापलुसी पर मेरा जमीर मुझे और चुप बैठने नहीं देगा।’ उन्होंने भाई तहसीन पूनावाला को टैग करते हुए कहा कि मुझे रोकने के अलावा उन्हें इस मुद्दे के बारे में कुछ नहीं पता है।’ कांग्रेस में यह पहला मौका नहीं है जब कांग्रेस अध्यक्ष को चुनौती मिली है. इसके पहले भी यह हो चुका है. इसके पहले सोनिया गांधी, सीताराम केसरी और सीतारमैया को भी अध्यक्ष के रूप में प्रतिद्वंदिता झेलनी पड़ी थी.
शहजाद पूनावाला ने ट्वीटर पर एक के बाद एक ट्वीट कर पार्टी पर जमकर भड़ास निकाली है। उन्होंने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी का चुनाव इसलिए हुआ है क्योंकि वे ‘गांधी परिवार’ से ताल्लुक रखते हैं।पूनावाला ने ट्वीट कर कहा, ‘पार्टी में एक मुद्दा कोई नहीं उठा रहा है- कांग्रेस में आवाज उठाने की हिम्मत होगी- वंशवाद और चापलुसी पर मेरा जमीर मुझे और चुप बैठने नहीं देगा।’ उन्होंने भाई तहसीन पूनावाला को टैग करते हुए कहा कि मुझे रोकने के अलावा उन्हें इस मुद्दे के बारे में कुछ नहीं पता है।’
गौरतलब है कि वर्ष 1996-98 में सीताराम केसरी जब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के लिए उतरे तो उस चुनाव में राजेश पायलट ने उन्हें कड़ी टक्कर दी. हालांकि चुनाव में जीत सीताराम केसरी की हुई. सीताराम केसरी के बाद सोनिया गांधी ने (1998 में) कांग्रेस की कमान संभाली. हालांकि साल 2000 में सोनिया गांधी के खिलाफ पूर्व कांग्रेसी नेता जितेंद्र प्रसाद ने चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही बनीं.
अब तक केवल चार ही नेहरू गांधी परिवार से हुए कांग्रेस के अध्यक्ष
शहजाद का आरोप है कि केवल गांधी ही कांग्रेस के अध्यक्ष बनते हैं जबकि राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह आरोप गलत है. कांग्रेस में आजादी के बाद जेबी कृपलानी, पट्टाभी सीतारमैया, जवाहर लाल नेहरू, यूएन देहबर, इंदिरा गांधी, नीलिमा संजीव रेड्डी, के कामराज, एस निजलिंगप्पा, बाबू जगजीवन राम, शंकर दयाल शर्मा, देवकांत बरुआ, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी और सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने. इनमें से केवल चार ही नेहरू गांधी परिवार से हैं.
कौन हैं शहजाद पूनावाला
शहजाद पूनावाला (30) जब 15 साल के थे तब उन्होंने ठान लिया था कि वो राजनीति में अपना करियर बनायेंगे. पुणे के एमआईटी स्कूल ऑफ गर्वनमेंट और इंडियन लॉ स्कूल से पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने एनएसयूआई ज्वाइन किया और पुणे कांग्रेस यूथ विंग के वाइस प्रेसिडेंट बनाए गए. शहजाद एक राजनीतिज्ञ के साथ ही वकील और सिविल राइट एक्टिविस्ट भी हैं. फिलहाल वो दिल्ली में वकालत कर रहे हैं.
राहुल ने ही दिया था मौका
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ही 2008 में एक भर्ती अभियान चलाया था. जिसमें उन्होंने शहजाद पूनावाला का भी चयन किया था. राहुल गांधी ने उनकी काबिलियत को देखा और राजनीति में पहला मौका संसदीय कार्य मंत्रालय में अतिरिक्त निजी सचिव के रूप में दिया था. शहजाद जब 23 साल के हुए तो ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी में मीडिया सेल की रिसर्च टीम के सदस्य बना दिए गए. एनएसयूआई पुणे विंग के उपाध्यक्ष भी रहे. कई मौकों पर उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में कांग्रेस का पक्ष भी रखा था.
पूनावाला ने लगाया ये आरोप
पूनावाला ने कहा है कि प्रेसिडेंट की पोस्ट के लिए होने वाले चुनाव में राहुल को फायदा पहुंचाने के लिए हेराफेरी की जा रही है. इसमें जो मेंबर वोट डालेंगे उनके नाम तय हैं, इसमें धांधली की जा रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल ही प्रेसिडेंट बनेंगे, क्योंकि वे गांधी परिवार से हैं. पूनावाला ने आगे कहा है कि वह ऐसा मुद्दा उठा रहे हैं जिसे उठाने की कोई और हिम्मत नहीं रखता. उन्होंने अपने भाई तहसीन पूनावाला को भी टैग करते हुए लिखा है उसे इस बात का कोई अंदाजा नहीं है, नहीं तो वो मुझे भी इस मुद्दे पर बोलने से रोक देता. तहसीन पूनावाला रॉबर्ट वाड्रा के जीजा हैं. तहसीन ने ट्वीट के जरिए इसका जवाब दिया है. उन्होंने इसमें लिखा, “मैं यह जानकर हैरान हूं कि शहजाद ने यह सब तब किया जब कांग्रेस गुजरात में जीतने जा रही है. मैं उनसे राजनीतिक रूप से सारे रिश्ते खत्म करने का एलान करता हूं. कांग्रेस, राहुल गांधी को प्रेसिडेंट बनाना चाहती है. यही नहीं, तहसीन ने अपनी ट्वीट में कांग्रेस के लीडर्स से अपील की है कि वे चाहें तो राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं.
पूनावाला ने लिखा राहुल को पत्र
शहजाद पूनावाला ने राहुल गांधी को चुनौती दी है कि वे पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दें इसके बाद चुनाव लड़ें. शहजाद ने राहुल गांधी को एक पत्र लिखकर पूछा है कि क्या कांग्रेस में अध्यक्ष सिर्फ गांधी नाम वालों के लिए ही रिजर्व है? मेरे जैसा एक कार्यकर्ता राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की सोच भी सकता था अगर उन्होंने उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया हुआ होता और एक सामान्य कांग्रेस कार्यकर्ता की तरह चुनाव लड़ते. हालांकि इस बार शहजाद शायद ही चुनाव लड़ पायें क्योंकि इस पोस्ट के लिए वोट करने वाले प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षों की ओर से उनका नाम प्रस्तावित नहीं किया गया है.
जेबी कृपलानी से सोनिया तक ज्यादातर अध्यक्ष चुने गए निर्विरोध, देखिये सूची
कांग्रेस पार्टी के गठन (1885) से अब तक करीब 59 लोग पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं. आज़ादी के बाद पार्टी के पहले अध्यक्ष थे जेबी कृपलानी. उनके बाद अब तक कांग्रेस पार्टी की कमान बतौर अध्यक्ष 16 लोगों के हाथों में रही है. सोनिया गांधी पार्टी की सोलहवीं कांग्रेस अध्यक्ष हैं और सबसे लंबे समय तक इस पद पर बनी रहने वाली पहली नेता हैं.
जेबी कृपलानी
आज़ादी के समय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर निर्विरोध रुप से चुने गए थे. हालांकि बाद में पार्टी अध्यक्ष के तीसरे चुनाव में नेहरु के समर्थन के बावजूद वो पटेलों के उम्मीदवार पुरुषोत्तम दास टंडन से हार गए थे.
पट्टाभी सीतारमैया
गांधी जी के करीबी नेता माने जाते थे. वो 1948-49 तक कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहे थे, हालांकि वो आज़ादी से पूर्व (1938 में) भी पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके थे और इस चुनाव में उन्हें सुभाष चंद्र बोस से हार का सामना करना पड़ा था. इस हार को गांधी जी ने व्यक्तिगत हार के तौर पर लिया था और कहा था कि सीतारमैया की हार यानि मेरी हार।
जवाहर लाल नेहरु
प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ निर्विरोध रुप से कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष (1951-54 तक) रहे.
यूएन देहबर
नेहरु के बाद यू एन देहबर (1955-59) में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने.
इंदिरा गांधी
यूएन देहबर के बाद 1959 में अपने पिता जवाहर लाल नेहरु के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बनी थी.
नीलिमा संजीव रेड्डी
इंदिरा गांधी के बाद 1960 से 1963 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे.
इंदिरा गांधी के बाद 1960 से 1963 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे.
कामराज
1964 में कांग्रेस अध्यक्ष बने और इस दौरान खुद प्रधानमंत्री पद को न स्वीकार कर इन्होंने संगठन को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी उठाई. उन्होंने देश को दो कद्दावर प्रधानमंत्री दिए, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी.
1964 में कांग्रेस अध्यक्ष बने और इस दौरान खुद प्रधानमंत्री पद को न स्वीकार कर इन्होंने संगठन को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी उठाई. उन्होंने देश को दो कद्दावर प्रधानमंत्री दिए, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी.
एस निजलिंगप्पा
के कामराज के बाद 1968-69 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और वो कांग्रेस पार्टी के विभाजन से पहले संयुक्त कांग्रेस के आखिरी राष्ट्रीय अध्यक्ष थे.
बाबू जगजीवन राम
पार्टी विभाजन के बाद इंदिरा गांधी के गुट वाली कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने और इस दौरान उन्होंने रक्षा मंत्रालय समेत कई विभागों को संभाला.
शंकर दयाल शर्मा
जगजीवन राम के बाद 1972-74 तक कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान ने संभाली.
देवकांत बरुआ
इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस पार्टी पद की अध्यक्षता ने संभाली. उन्होंने ही ‘इंडिया इज़ इंदिरा, इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा दिया था.
इंदिरा गांधी
देवकांत बरुआ के बाद खुद प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पद की अध्यक्षता की और वो साल 1978-84 तक इस पद पर बनी रहीं.
राजीव गांधी
इंदिरा गांधी की मौत के बादने प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी भी संभाली और 1991 तक इस पद पर बने रहे.
नरसिम्हा राव.
राजीव गांधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष (1992-96) और अगले प्रधानमंत्री बने थे
राजीव गांधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष (1992-96) और अगले प्रधानमंत्री बने थे
सीताराम केसरी
1996-98 तक पार्टी अध्यक्ष बने. इस चुनाव में राजेश पायलट ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी. हालांकि चुनाव में जीत सीताराम केसरी की हुई, लेकिन उनका चुनाव दूसरे गुट के कांग्रेसियों को रास नहीं आया और अंदरखाने उन्हें गतिरोध का सामना करना पड़ा था.
सोनिया गांधी
पार्टी की कमान सीताराम केसरी के बाद (1998 में) संभाली. हालांकि साल 2000 में सोनिया गांधी के खिलाफ पूर्व कांग्रेसी नेता जितेंद्र प्रसाद ने चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही बनीं.

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