आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
उच्चतम न्यायालय द्वारा एक बार में तीन तलाक को गैरकानूनी बताने के बावजूद जारी इस परंपरा पर लगाम कसने के मकसद से प्रस्तावित एक कानून के मसौदे में कहा गया है कि एक बार में तीन तलाक गैरकानूनी और शून्य होगा। यह गैरजमानती अपराध होगा। साथ ही ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है।
एक बार में तीन तलाक को खत्म करने के लिए सरकार ने नए कानून का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है. इसका नाम ‘द मुस्लिम वूमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज बिल’ रखा गया है. इसके अनुसार अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी को एक बार में तीन तलाक देता है तो यह गैरकानूनी होगा. उसे तीन साल की सजा होगी. ड्राफ्ट को मंजूरी के लिए शुक्रवार को राज्य सरकारों को भेजा गया है. उन्हें एक हफ्ते का समय दिया गया है. सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में इस विधेयक को पेश कर सकती है. पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा. हालांकि सरकार के पास अधिकार है कि वह इसे पहले भी लागू कर सकती है. ई-मेल, व्हाट्स एप, एसएमएस आदि से दिए तलाक पर भी यह लागू होगा.
शीत सत्र में आ सकता है विधेयक
संविधान पीठ ने इस साल 22 अगस्त को तीन तलाक को अवैध करार देते हुए सरकार से कानून बनाने को कहा था. लेकिन फैसले के बाद 101 दिन में ही इसके 66 मामले सामने चुके हैं. फैसले से पहले 177 केस आए. यानी इस साल 334 में कुल 243 मामले. सबसे ज्यादा मामले उप्र में हुए हैं.
मोदी ने बनायी 6 मंत्रियों की टीम
पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद इस मामले में पहल की. ड्राफ्ट बनाने के लिए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री अरुण जेटली, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, गृह राज्य मंत्री पीपी चौधरी और जितेंद्र सिंह का समूह बनाया. सूत्रों के अनुसार 1986 के शाहबानों केस के बाद बनाया गया कानून तलाक के बाद लागू होता था, जबकि नया कानून तीन तलाक को रोकेगा और पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलेगा.
पीड़िता को मिलेगा गुजारा भत्ता
यह एक बार में तीन तलाक पर ही लागू होगा. गैरजमानती और संज्ञेय अपराध होगा. तलाक देने वाले के खिलाफ मुकदमा होगा. सजा के साथ जुर्माने का भी प्रावधान है. पीड़ित महिला अपने और नाबालिग बच्चों के लिए भरण-पोषण और गुजारा भत्ता की मांग कर सकती हैं. भत्ता और जुर्माने की राशि तय करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को होगा. महिला बच्चों की कस्टडी की गुहार भी लगा सकेंगी. कानून लागू होने से पहले भी पीड़ित महिलाएं कस्टडी और भत्ते का दावा कर सकेंगी.
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि मसौदा मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक आज राज्य सरकारों के पास उनका नजरिया जानने के लिए भेजा गया। राज्य सरकारों से मसौदे पर तुरंत प्रतिक्रि या देने को कहा गया है। यह मसौदा गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाले एक अंतरमंत्रालयीय समूह ने तैयार किया है। इसमें अन्य सदस्य विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, वित्त मंत्री अरुण जेटली, विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद और विधि राज्यमंत्री पीपी चौधरी थे।प्रस्तावित कानून केवल एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए- बिद्दत) पर ही लागू होगा और यह पीड़िता को अपने तथा नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से गुहार लगाने की शक्ति देगा। इसके तहत, महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है और मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे। मसौदा कानून के तहत, किसी भी तरह का तीन तलाक बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रानिक माध्यम से गैरकानूनी और शून्य होगा।
अधिकारी ने कहा, जीवनयापन हेतु गुजारा भत्ता और संरक्षण का प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि अगर पति पत्नी से घर छोड़कर जाने को कहता है तो उसके पास कानूनी कवच होना चाहिए।
दरअसल, मुस्लिम महिलाएं कई वर्षों से अपने अधिकार एवं सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रही थीं, लेकिन तुष्टिकरण के चलते उनको उन सब से वंचित रखा गया। मुस्लिम महिलाओं को शाहबानो प्रकरण से राहत मिलने की उम्मीद जगी ही थी, कि कट्टरपंथियों के आगे तत्कालीन प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी ने घुटने टेक, संसद के माध्यम से कोर्ट निर्णय को निरस्त कर, वापिस कट्टरपंथी मुल्लावाद के रहमोकरम पर छोड़, उनकी जागृत हुई आशा की किरण को धूमिल कर दिया। मुस्लिम महिला को एक गुलाम की भाँति रहने को मजबूर करने में भारत के छद्दम नेताओं का बहुत बड़ा योगदान रहा। अपनी कुर्सी बनाए रखने के लिए कट्टरपंथियों के आगे नतमस्तक होते रहे। मुसलमान सिर्फ भारत में ही यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि "मुसलमान का सिर अल्लाह के आगे झुकता है।" चीन ने मुसलमानो को रोज़ा और अब तो नमाज़ पर भी पाबन्दी लगा दी है, किसी में हिम्मत नहीं बगावत करने की। पाबंदी सिर्फ चीन में ही नहीं, कई देशों में लग चुकी है। किसी मॉब लिंचिंग, अवार्ड वापसी गैंग और मानवाधिकार में प्रदर्शन करना तो दूर एक लब्ज़ तक बोलने का साहस नहीं, जानते हैं कि सरकार के किसी फैंसले के खिलाफ मुँह खोलने का मतलब है, जेल। ये गैंग तो भारत में कुर्सी के भूखे नेताओं के दम पर बोल सकते हैं।
लेकिन प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने किसी संघर्ष की परवाह न करते हुए, मुस्लिम महिलाओं की एक लंबित माँग को कानूनी जामा पहनाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं किया। क्योकि विश्व में भारत ही ऐसा देश है, जहाँ नेताओं के मुल्लावाद के आगे नतमस्तक होने के कारण मुस्लिम महिला अपने अधिकारों से महरूम थी। किसी नेता में भारत के मुल्लाओं से यह पूछने का साहस नहीं कि "क्या तुम्हारे और भारत से बाहर इस्लाम में फर्क है?" इन छद्दम नेताओं को डर था, अपने वोट बैंक का।
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