आर..बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
राजनीति तेरी भी लीला अपरम्पार हैं, कोई नहीं कह सकता कि कब कौन अपना सिक्का जमा ले। कहते हैं, इतिहास लिखा नहीं जाता, दोहराया जाता है।
राजनीति तेरी भी लीला अपरम्पार हैं, कोई नहीं कह सकता कि कब कौन अपना सिक्का जमा ले। कहते हैं, इतिहास लिखा नहीं जाता, दोहराया जाता है।
देश का बँटवारा होते समय कायदे आज़म जिन्ना ने महात्मा गाँधी को कहा था "हिन्दुस्तान में मुस्लिम लीग को हमेशा के लिए बैन कर दो। देखो मुसलमानों की आवाज़ है 'हँसते-हँसते लिया पाकिस्तान, लड़कर लेंगे हिन्दुस्तान' " लेकिन तुष्टिकरण को अपना माई बाप मानने वालों ने नहीं सुना। नेहरू ने उसे केरल राज्य तक सीमित रखा, लेकिन लौह-महिला नेहरू से भी दस कदम आगे निकल गयीं, वह मुस्लिम लीग को केरल से बाहर ले आयीं। कई चुनावों में कांग्रेस का सिर दर्द बनी।बरहाल, कौन लेकर आयी, कांग्रेस। और अब डूबती कम्युनिस्ट पार्टी में नई जान कांग्रेस ने फूंक दी।
वास्तव में राहुल गाँधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाना, मात्र एक खानापूर्ति है। इस सच्चाई से कांग्रेस का हर वरिष्ठ नेता वाकिफ है कि "कांग्रेस के बुरे दिन शुरू हो चुके हैं और कोई अब कांग्रेस की खोई साख को वापस नहीं ला सकता। फूटने दो हर बदनामी का ठीकरा इस परिवार के सर पर।" अंदरखाने चल रही गुटबाज़ी भी कांग्रेस की नैया डुबो रही है। गुजरात भी देखा जाए तो गुटबाज़ी के ही कारण कांग्रेस के हाथ से निकला है। चाहते तो नरेन्द्र मोदी के गुजरात में न होने का फायदा उठा सकते थे, लेकिन लेशमात्र भी प्रयास नहीं किया गया। सच्चाई यह है कि हार्दिक और जिग्नेश आदि के चक्कर में राहुल को फंसा सब मालपुए खाते रहे। खैर, उसी गुटबाज़ी ने हिमाचल प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी को विधानसभा दिखा कांग्रेस ने अपने मार्ग को काँटों से भर लिया।
किस्मत का खेल है साहब, पहले आम आदमी पार्टी को संरक्षण देकर अपनी फजीयत करवाई, जिसने कांग्रेस में गुटबाज़ी को हवा देने का काम किया। और अब हिमाचल में भी गुटबाज़ी ने मार दिया, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गोवा, तमिलनाडु, आंध्रा, बिहार, केरल, असम आदि सूची बहुत लम्बी है, साहब। भाजपा को टक्कर देने वाली केवल कांग्रेस ही थी, शेष तो मात्र बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाने समान रहते।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की फजीहत का लाभ मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) को मिला है. शिमला की ठियोग सीट से माकपा नेता राकेश सिंघा ने चुनाव जीत कर इतिहास रच दिया है।माकपा ने 24 साल बाद विधानसभा में अपना सूनापन समाप्त किया है। माकपा ने कांग्रेस की इस परंपरागत सीट पर न केवल कब्जा जमाया, बल्कि उसके प्रत्याशी को तीसरे नंबर पर लुढ़का दिया. उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी राकेश वर्मा को हराया. राकेश सिंघा और उनकी पार्टी ने 1993 में अंतिम बार विधानसभा चुनाव में कोई सीट जीती थी। उस दौरान सिंघा ने शिमला शहर सीट से चुनाव जीता था।
नाटकीय घटनाक्रम से पहुंचा माकपा को लाभ
इस सीट पर सबसे पहले वीरभद्र सिंह ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। उनके लिए कद्दावर नेता विद्या स्टोक्स ने वहां से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। बाद में वीरभद्र सिंह अर्की चले गए तो विद्या ने फिर ठियोग से लड़ने का फैसला किया। इस बार फिर एक अनहोनी हो गयी। विद्या की तबीयत बिगड़ गई और कांग्रेस ने फिर उम्मीदवार बदल दिया। विजय बिहारी लाल खाची को टिकट देने की बात चली।लेकिन बाजी मार ले गये दीपक राठौर। राठौर के नाम की घोषणा के बाद विद्या स्टोक्स ने फिर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया और नामांकन दाखिले के अंतिम दिन पर्चा दाखिल किया। दीपक राठौर ने भी पार्टी का आधिकारिक पत्र देकर पर्चा भरा।विद्या स्टोक्स का नामांकन खारिज हो गया और दीपक राठौर कांग्रेस प्रत्याशी बने। विद्या स्टोक्स एक वरिष्ठ नेता रही है। वह आठ बार की विधायक भी रही हैं, फिर तो पासा पलटना ही था।
शिमला की ठियोग सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। कांग्रेस की आपसी लड़ाई ने उसके प्रत्याशी को तीसरे नंबर पर लुढ़का दिया। भाजपा के प्रत्याशी राकेश वर्मा दूसरे नंबर पर रहे, राकेश सिंघा और उनकी पार्टी ने 1993 में अंतिम बार विधानसभा चुनाव में कोई सीट जीती थी। उस दौरान सिंघा ने शिमला शहर सीट से चुनाव जीता था।
जनता के हितों के लिए लड़ रही थी माकपा
माकपा की जीत में जनता के लिए उनका संघर्ष अहम रहा। हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद शिमला और आसपास के इलाकों में सेब के पेड़ों पर कुल्हाड़ी चली तो माकपा सबसे पहले कड़क पर उतरी। ठियोग समेत अन्य जगहों पर सिंघा ने आंदोलन किया। वहीं, कोटखाई गैंगरेप एवं मर्डर केस में आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए चलाए गए आंदोलन का केंद्र भी ठियोग ही रहा। धरने-प्रदर्शन में माकपा कैटरों और समर्थकों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया।
माकपा को 15 सीटों पर मिली हार
इस चुनाव में सीपीआईएम ने 16 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से पंद्रह सीटों पर उसे हार मिली. रामपुर, आनी, जोगेंद्रनगर, शिमला शहरी समेत अन्य हलकों पर हार का सामना करना पड़ा. सिंघा को छोड़ कोई प्रत्याशी जीत नहीं सका।
बीजेपी के खिलाफ गुस्से को विपक्ष भुना नहीं पाया
माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा की सीटों की संख्या में आई कमी उसकी नीतियों के खिलाफ लोगों के गुस्से और विरोध को दर्शाती है। हालांकि, विपक्ष इस गुस्से और विरोध का फायदा नहीं उठा पाया। भाजपा भले ही जीत गयी, लेकिन 2014 और 2012 की तुलना में उनकी सीटें और वोट प्रतिशत दोनों कम हुए है। गुजरात के लोगों ने विकास के गुजरात मॉडल को वोट नहीं दिया, बल्कि इसके खिलाफ दिया. बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कार्ड खेला. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति की. हमें इन चुनावी नतीजों से सीखने की जरूरत है।


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