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मनुष्य के अंदर की बुराई कॊ ख़त्म करने के लिये शिक्षा के साथ अध्यात्म भी ज़रूरी : अमृता भारती

मनुष्य के अंदर की सम्पूर्ण बुराई कॊ ख़त्म करने के लिये शिक्षा के साथ साथ अध्यात्म भी ज़रूरी है। अध्यात्म के बिना मानव आज़ पूर्ण मानव नही बन सकता। उक्त बाते वजीरगंज बाजार के माली गली स्थित एसबीआई के उत्तर साइड मैदान के प्रांगण में शुक्रवार को दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, दिल्ली के तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय श्री रामचरितमानस ज्ञान यज्ञ के समापन के अंतिम दिन के प्रवचन के दौरान आशुतोष जी महाराज के परम शिष्या साध्वी सुश्री अमृता भारती ने कही। 
उन्होंने कहा कि हम ऊँची शिक्षा प्राप्त करके उच्च पद के शिखर पर ज़रूर पहुँच सकते हैं, लेकिन प्रभु की सच्ची भक्ति के बिना उच्च पद पर आसीन होने के बाद भी सच्चा सुख नही मिल सकता। जीवन में सच्चा एवं सुखद जीवन के लिये प्रभु की सच्ची भक्ति ज़रूरी है, जो सच्चे सद्गुरु के द्वारा ही सम्भव है। उन्होंने कहा की अपने समाज के अंदर की बुराईयों कॊ जड़ से ख़त्म करने के लिये सत्संग से जुड़ना ज़रूरी है। सत्संग से मनुष्य अपने अंतरात्मा का विकास करता है, जबकि शिक्षा के बाद उच्च पद प्राप्त करने के बाद मनुष्य नैसर्गिक वस्तुओं या बाहरी विकास करता है। जो सिर्फ क्षणिक मात्र है। सच्ची सुख की अनुभूति प्रभू की भक्ति करते हुए जनकल्याण से ही मिल सकती है। 
परम शिष्य स्वामी धननंजयानंद ने अपने प्रवचन के दौरान सत्संग की महिमा का बखान करते हुए उपस्थित महिला पुरुष श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि सच्ची सच्ची भक्ति का अर्थ है, आंतरिक मन से इश्वर की भक्ति करना। अपने घर के अन्दर भगवान की मूर्ति स्थापित करने एवं धुप, दीप, आरती करने कॊ प्रभु की सच्ची भक्ति नही कही जा सकती, जब तक की अपने अन्दर की भक्ति कॊ नही जगाया जाए। उन्होंने कहा कि अपने समाज के अन्दर तमाम बुराई कॊ दूर कर एक सभ्य समाज का निर्माण कराना चाहते हैं तो इसके लिये सच्चे सद्गुरु की तलाश की आवश्यकता है। अपने गुरु चाणक्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त मौर्य ने अखंड भारत के सपने कॊ साकार किया। रामकृष्ण परमहंस के द्वारा नरेंद्र नाथ दत्त कॊ ब्रह्म ज्ञान के द्वारा भारत कॊ जगतगुरु का श्रेय दिलाया। गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी कॊ मराठा बनाकर मुगल शासन कॊ ख़त्म कर दिया। इसलिये आज़ हर मानव के भीतर दिव्य सकती कॊ जागृत करने के सच्चे सद्गुरु के संगत करना ज़रूरी है। ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन प्रखंड के सैकडों महिला पुरुष श्रद्धालुओं ने आशुतोष जी महाराज के दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की सदस्यता ग्रहण किये हैं। इस दौरान भक्ति गीत ,संगीत एवं भजन से सैकडों श्रोता झूमते रहे। इस आध्यात्मिक कार्यक्रम कॊ सफल संचालन में संस्थान के पवन जी, ममता भारती जी, खुशबू भारती जी, श्याम जी, राजकुमार जी ,पुरुषोत्तम जी, शंकर जी, दिनेश जी, ओमप्रकाश जी की भूमिका सराहनीय रही।
आज महाराज जी इतने वर्षों से समाधि में लीन हैं, लेकिन उनके शिष्य उनकी गैरहाज़िरी में दिव्या संस्थान को चार चाँद लगाने में प्रयत्नशील हैं। इनकी समाधि को ग्रहण लगाने का पिछली सरकार द्वारा भरसक प्रयत्न किया, लेकिन ईश्वर की तपस्या में लीन को हिन्दू विरोधी कैसे बर्दाश्त करते। कोर्ट में समाधि में लीन को मृतक बताने में लेशमात्र भी संकोच नहीं किया। हैरानी की बात यह है कि सरकार और पार्टी में बैठे हिन्दू एक गुलाम की भांति बर्ताव करते रहे। ऐसे ही जयचन्दों के कारण पहले देश मुगलों के अधीन गया, फिर ब्रिटिश सरकार से हाथ मिलाकर आज़ादी की राह में काँटें बिछाये गए। जो रामसेतू और पुरुषोत्तम श्रीराम को काल्पनिक बताने का साहस करते हों, उन्हें महाराजजी की समाधि का ज्ञान होना असम्भव है।   

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