समिति की दो नवंबर की अंतिम बैठक के विवरण के अनुसार उसने अपने देश की सरकार को संसद में एक कानून संशोधन प्रस्ताव रखने को कहा है, जो व्यक्तिगत कानूनी संरक्षण को मजबूत करने वाला हो। इसके साथ ही समिति ने यह सुनिश्चति करने को कहा है कि ऐसे किसी मामले में जहां व्यक्तिगत दावे के आवश्यक कानूनी अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो उनमें सूचनाओं का आदान प्रदान नहीं होना चाहिए। इस प्रस्ताव को अब मंजूरी के लिए संसद के 27 नवंबर से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र में संसद के उच्च सदन के समक्ष रखा जाएगा. इस करार से अभी तक कालेधन के सुरक्षित पनाहगाह रहे स्विट्जरलैंड से काला धन रखने वालों के बीच लगातार ब्योरा मिल सकेगा।
करार के तहत जिन सूचनाओं का आदान प्रदान किया जा सकता है उनमें खाता संख्या, नाम, पता, जन्म की तारीख, कर पहचान संख्या, ब्याज, लाभांश, बीमा पालिसियों से प्राप्ति, खाते में शेष और वित्तीय परिसंपत्तियों की बिक्री से प्राप्ति शामिल है। यह व्यवस्था इस तरीके से काम करेगी, मसलन यदि किसी भारतीय का स्विट्जरलैंड में बैंक खाता है, तो संबंधित बैंक वहां के अधिकारियों को खाते का वित्तीय ब्योरा सौंपेगा. उसके बाद स्विस अधिकारी स्वत: तरीके से इन सूचनाओं को भारत में अपने समकक्षों को स्थानांतरित करेंगे, जो उसकी जांच कर सकेंगे।
सीमा पार कर अपवंचना रोकने के लिए भारत और स्विट्जरलैंड सहित करीब 100 देशों ने सूचनाओं के स्वत: आदान प्रदान के वैश्विक मानदंडों (एईओआई) को अपनाने की प्रतिबद्धता जताई है। हालांकि, स्विट्जरलैंड के घरेलू बैंक ग्राहकों की गोपनीयता एईओआई से प्रभावित नहीं होगी। यह करार अगले साल से लागू होगा और भारत के साथ सूचनाओं का आदान प्रदान 2019 से शुरू हो जाएगा. भारत के साथ सूचनाओं की स्वचालित व्यवस्था के प्रस्ताव को स्विट्जरलैंड की संसद के निचले सदन नेशनल कौंसिल ने सितंबर में अनुमोदित किया था।
इस करार के गम्भीरता से लागू होने की स्थिति में यह मोदी सरकार की काले धन की लड़ाई में अहम् भूमिका होगी। फिर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जिस मोदी का भारत में उनके विरोधी जोर-शोर से विरोध कर रहे हैं, उसके विपरीत विदेशों में मोदी की नीतियों की सहराना हो रही है। विरोधी भ्रष्टाचार और काले धन का केवल चुनाव में ही शोर करते दिखते हैं, लेकिन धरातल पर कुछ करने में उतने ही पीछे रह जाते हैं। क्योकि देश का धन विदेशों में जमा कर भारत को कमजोर कर विदेशों को आर्थिक रूप से उतना ही मजबूत कर रहे थे। जबकि वर्तमान सरकार की कार्यशैली पिछली सरकारों की कार्यशैली से एकदम विपरीत। जिस कारण विदेशों में जमा उनका अथवा उनके समर्थकों के जमा धन पर गिद्ध की नज़र रखी जा रही है। जो किसी से बर्दाश्त नहीं हो रहा। कभी भगवा का, कभी गौ का, कभी साम्प्रदायिकता का, तो कभी किसी न किसी बहाने जनता को वास्तविकता से भ्रमित किया जा रहा है। 2014 चुनाव पूर्व से सोशल मीडिया के साथ-साथ अन्य मीडिया पर विदेशों में जमा धन की चर्चा होती थी, और जब उसी दिशा में काम किया जा रहा है, गुमराह करने का प्रयत्न करने पर विरोधी शोर मचा रहे हैं।
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