केंद्रीय चुनाव आय़ोग ने चार राज्यों उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, अरूणाचल प्रदेश और तमिलनाडु विधानसभा की 5 सीटों के उपचुनाव की घोषणा कर दी है. इन चारों राज्यों की पांच विधानसभा सीटों पर 21 दिसंबर को मतदान और 24 दिसंबर को मतगणना होगी. ये सीटें हैं, उत्तर प्रदेश की सिकंदरा, अरूणाचल प्रदेश की पाक्के-कसांग (एसटी) औऱ लिकाबाली (एसटी), तमिलनाडु की डॉ राधाकृष्णन नगर और पश्चिम बंगाल की सबंग. जबकि पश्चिम बंगाल की ही नोआपाड़ा विधानसभा सीट के उप चुनाव की घोषणा नही हुई है. गौरतलब है कि इस सीट से कांग्रेस विधायक मधुसूदन घोष के निधन के बाद से यह सीट भी रिक्त है. दूसरी तरफ लोकसभा की भी 7 सीटें विभिन्न कारणों से रिक्त हैं लेकिन उप चुनाव की घोषणा नही हुई है. आखिर चुनाव आयोग द्वारा विधानसभा सीटों के उप चुनाव के इस आधा अधूरे घोषणा के मायने क्या है.
लोकसभा की खाली 7 सीटें
लोकसभा की सात सीटें सांसदों के निधन और इस्तीफे के कारण खाली हैं. चार सांसदों के निधन और तीन सांसदों के इस्तीफे के कारण लोकसभा की यह सीटें खाली हुई हैं. गौरतलब है कि राजस्थान के अजमेर से बीजेपी सांसद सांवरलाल जाट, पश्चिम बंगाल के उलुबेड़िया से तृणमूल कांग्रेस सांसद सुल्तान अहमद, राजस्थान के अलवर से बीजेपी सांसद एवं अस्थल बोहर मठ के महंत चांदनाथ और बिहार के अररिया से राजद सांसद तस्लीमुद्दीन का निधन हो गया है. वहीं जम्मू कश्मीर के अनंतनाग से पीडीपी सांसद मेहबूबा मुफ़्ती, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ और फूलपुर से बीजेपी से सांसद केशव प्रसाद मौर्य ने इस्तीफा दे दिया है. मेहबूबा और योगी मुख्यमंत्री और मौर्य अब उप मुख्यमंत्री अपने अपने राज्यों में हैं.
संभावना इस बात की जतायी जा रही है
पंजाब के गुरदासपुर लोकसभा सीट और मध्यप्रदेश के चित्रकूट विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मिली पराजय के बाद बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व खाली हुई लोकसभा सीटों पर उप चुनाव नही कराना चाह रहा है. इसके पीछे वजह यह है कि बीजेपी लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों को उप चुनाव में एकजुट होकर शक्ति प्रदर्शन व शक्ति वर्द्धन का मौका नहीं देना चाहती. खासकर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले की फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट पर. इस रणनीति को बल इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि दोनों सीटों पर कोई कद्दावर प्रत्याशी बीजेपी की जीत को सुनिश्चित नहीं कर रहा है और विपक्ष कमर कसे हुए है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बीजेपी की रणनीति है कि लोकसभा का चुनाव समय से पहले यदि करा दिया जाए तो उप चुनाव टालना संभव है. यानी 2019 में तय चुनाव कुछ महीने पहले 2018 या 2019 की शुरुआत में हो तो उपचुनाव नहीं होगा. लोकसभा का पिछला चुनाव अप्रैल-मई 2014 में हुआ था और नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 26 मई 2014 को शपथ ली थी. वैसे नियम कानून भी इसकी इजाजत देता है. केंद्र सरकार चाहे तो समय से पहले लोकसभा चुनाव करवा सकती है. अगर उप चुनाव और आम चुनाव में एक साल का ही अंतराल हो तो चुनाव आयोग उप चुनाव स्थगित कर सकता है.
उप चुनाव नही कराने की क्या हो सकती है वजह व रणनीति
भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खाली हुई लोकसभा सीटों पर उप चुनाव नही कराना चाह रहा है. इसके पीछे वजह यह है कि बीजेपी लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों को उप चुनाव में एकजुट होकर शक्ति प्रदर्शन व शक्ति वर्द्धन का मौका नहीं देना चाहती. खासकर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले की फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट पर. इस रणनीति को बल इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि दोनों सीटों पर कोई कद्दावर प्रत्याशी बीजेपी की जीत को सुनिश्चित नहीं कर रहा है और विपक्ष कमर कसे हुए है.
रणनीति :
लोकसभा का चुनाव समय से पहले करा दिया जाए तो उप चुनाव टालना संभव है. यानी 2019 में तय चुनाव कुछ महीने पहले 2018 या 2019 की शुरुआत में हो तो उपचुनाव नहीं होगा. लोकसभा का उप चुनाव रोकने की कवायद तो पहले से ही चल रही है. लोकसभा का पिछला चुनाव अप्रैल-मई 2014 में हुआ था और नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 26 मई 2014 को शपथ ली थी.
क्या कहता है नियम कानून
- एमएलसी पद की शपथ लेने के बाद 14 दिन का समय मिलता है सांसद पद से इस्तीफा देने के लिए.
- लोकसभा अध्यक्ष इस्तीफा स्वीकार करने के लिए कम से कम 15 दिन का समय ले सकता है.
- सांसद के पद से इस्तीफे के बाद 6 महीने का समय मिलता है चुनाव कराने के लिए.
- केंद्र सरकार चाहे तो समय से पहले लोकसभा चुनाव करवा सकती है.
- अगर उप चुनाव और आम चुनाव में एक साल का ही अंतराल हो तो चुनाव आयोग उप चुनाव स्थगित कर सकता है.
बात गोरखपुर और फूलपुर की
सांसद रहे योगी आदित्यनाथ और केशव मौर्य को एकदम डेड लाइन पर एमएलसी बनाया गया. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने सोमवार 18 सितंबर 2017 को एमएलसी के रूप में शपथ ली है. अब जब 18 को शपथ ग्रहण हो गया है, तब फिर से सीएम योगी और केशव को 15 दिन का वक्त इस्तीफा देना के लिए मिल जाएगा. यानी एक अक्टूबर तक सांसद पद से इस्तीफा दे सकते हैं. इस्तीफा जब लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के पास पहुंचेगा, उस वक्त भी स्वीकार नहीं होगा, बल्कि बतौर अध्यक्ष वह भी 15 दिन का समय इस्तीफा स्वीकार करने में लेंगी. यानी कि 16 अक्तूबर से फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा खाली हो जाएगी. यहां तब कोई सांसद नहीं रह जाएगा. इसके बाद उप चुनाव करवाने के लिए 6 महीने का वक्त चुनाव आयोग को मिलेगा. यानी 16 अप्रैल 2018 तक का समय सरकार के पास होगा. गुणा गणित यही खत्म नहीं होती. अब महीनों पर नजर डालें. यदि लोकसभा चुनाव को 16 अप्रैल 2019 से पहले करा दिया जाए तो उप चुनाव की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. क्योंकि आम चुनाव औऱ उप चुनाव में एक साल से कम का अंतर होने पर चुनाव आयोग उपचुनाव टाल सकता है.

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