आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 08 नवंबर, 2016 को विमुद्रीकरण यानि नोटबंदी की घोषणा की थी। नोटबंदी के बाद जीडीपी की गिरावट और विनिर्माण क्षेत्रों में मंदी के सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन वास्तविक तथ्य यह है कि नोटबंदी के निर्णय ने भारत को बड़ी मुसीबत से बचा लिया है। नोटबंदी का जो उद्देश्य था उसमें वह सफल साबित हो रहा है। इन सब सवालों के बीच सच्चाई यह है कि जीडीपी गिरावट और औद्योगिक उत्पादन को लेकर जितनी भी नकारात्मक बातें की जा रही हैं वह भी अस्थायी हैं।
‘कैश बब्बल’ से बच गया इंडिया
देश के जाने माने अर्थशास्त्री अनिल बोकिल ने कहा कि देश में ‘कैश बब्बल’ था और अगर नोटबंदी न होती तो भारत भी अमेरिका की तरह 2008 जैसी मंदी का शिकार हो सकता था। बोकिल के अनुसार नोटबंदी से पहले कम टैक्स कलेक्शन होता था जिस कारण सरकार को ज्यादा नोट छापने पड़ते थे और उसकी वजह से देश में कैश का ढेर हो गया था। हर ट्रांजैक्शंस के लिए कैश चल रहा था। जिसका अंजाम बुरा हो सकता था।
नोटबंदी ने ‘महामंदी’ से बचाया
दरअसल 2007-09 के बीच विश्व की अर्थव्यवस्था में व्यापक मंदी थी। विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका में चलनिधि यानि Liquidity की कमी से उत्पन्न हुई थी। यह बड़ी वित्तीय संस्थाओं के पतन, राष्ट्रीय सरकारों द्वारा बैंकों की “जमानत” और दुनिया भर में शेयर बाज़ार की गिरावट का कारण बनी। आवास बाजार को नुकसान उठाना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप कई निष्कासन, प्रतिबंध और दीर्घकालिक रिक्तियां सामने आईं। दरअसल बीते दशक में भारत भी ऐसी ही समस्याओं का सामना कर रहा था और भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ जा रही थी।
2008 में अमेरिका में छाई थी मंदी
2008 में अमेरिका में आई महामंदी के कारण प्रमुख व्यवसायों की विफलता, ट्रिलियन अमेरिकी डॉलरों में अनुमानित उपभोक्ता संपत्ति में कमी, सरकारों द्वारा पर्याप्त वित्तीय प्रतिबद्धताएं और आर्थिक गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण गिरावट देखी गई थी। वर्ष 2008 की शुरुआत में जीडीपी के नकारात्मक आंकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। अमेरिका में होम लोन और मॉर्गेज लोन न चुका पानेवाले ग्राहकों की संख्या बढ़ती चली गई थी, जिससे लेहमैन ब्रदर्स, मेरीलिंच, बैंक ऑफ अमेरिका जैसी वित्तीय संस्थाएं तरलता (Liquidity)के अभाव में आ गईं थी। अमेरिकी सरकार के बैलआउट पैकेज भी इस अभाव को कम नहीं कर पाए और देखते ही देखते अमेरिका में 63 बैंकों में ताले लग गए थे।
इंडियन इकोनॉमी पर पड़ा था असर
अमेरिकी मंदी का असर भारत सहित पूरे विश्व पर हुआ, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह असर शेयर बाजार, इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट, आउसोर्सिंग बिजनेस पर ही ज्यादा दिखाई दिया था। एक समय 21000 के स्तर पर चल रहा सेंसेक्स मार्च 2009 तक 8000 के स्तर पर आ गया था, यानि डाउजोंस के गिरने से सेंसेक्स में भी 60 प्रतिशत तक की गिरावट हुई। डॉलर के रुपये के मुकाबले कमजोर होने से आउटसोर्सिंग और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बिजनेस में भारत को बहुत फर्क पड़ा था। भारत की इकोनॉमी गर्त में जा रही थी। कमोबेश यही स्थिति नोटबंदी से पहले उत्पन्न हो रही थी जिसे मोदी सरकार ने भांप लिया और समय समय रहते कदम उठा लिया।
1929-39 में आई थी ‘महामंदी’
इतिहास में महामंदी या भीषण मंदी (द ग्रेट डिप्रेशन1929-39) के नाम से जानी जानेवाली घटना एक विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की थी। यह वर्ष 1929 में शुरू हुई और 1939-40 तक जारी रही थी। विश्व के आधुनिक इतिहास की इस सबसे बड़ी मंदी ने ऐसा कहर मचाया था कि उससे उबरने में कई साल लग गए थे। इससे फासीवाद बढ़ा और द्वितीय विश्वयुद्ध की नौबत आ गई।
नोटबंदी के बाद बढ़े शेयर बाजार
08 नवंबर 2016 को नोटबंदी जब लागू हुआ तो उस वक्त सेंसेक्स करीब 25 हजार के आस-पास था और निफ्टी करीब आठ हजार अंकों के करीब आज के दौर में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का शेयर सूचकांक करीब 32 हजार के इर्द-गिर्द है जबकि निफ्टी 10 हजार के इर्द गिर्द है। जाहिर तौर पर नोटबंदी के बाद निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और बिकवाली घटी है। यानि हम कह सकते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में एक स्थायित्व का भाव है।
जाली नोटों से मुक्ति दिलाएगी नोटबंदी
अर्थक्रांति नाम से एक थिंक टैंक चलाने वाले अनिल बोकिल ने कहा कि नोटबंदी जरूरी थी क्योंकि भारतीय रुपया नकली नोटों की वजह से बर्बाद हो रहा था। जो भी किया गया वह इकॉनमी को बचाने के लिए किया गया। यह केवल ब्लैक मनी तक सीमित नहीं था, इसके और भी कई आयाम थे। रिजर्व बैंक के अनुसार 500 रुपये के बंद हुए हर 10 लाख नोट में औसत 7 नोट नकली थे और 1000 रुपये के बंद हुए हर 10 लाख नोटों में औसत 19 नोट नकली थे।
विनिर्माण क्षेत्र में तेजी आई
नोटबंदी की नकारत्मक खबरें फैलाए जाने के बीच देश के विनिर्माण क्षेत्र में नए ऑर्डर मिलने, उत्पादन और रोजगार गतिविधियां बढने से अगस्त माह में उछाल दर्ज किया गया। निक्केई इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) अगस्त माह में उछलकर 51.2 पर पहुंच गया। एक माह पहले जुलाई में यह 47.9 पर था। माल एवं सेवाकर (जी.एस.टी.) के एक जुलाई से लागू होने के चलते विनिर्माण क्षेत्र में गतिविधियां काफी धीमी पड़ गई थी। अगस्त में क्षेत्र इस स्थिति से उबर गया। रिपोर्ट तैयार करने वाली आईएचएस मार्केट की प्रधान अर्थशास्त्री पोलियाना डी लीमा ने कहा, ”अगस्त पीएमआई दर्शाता है कि भारत में विनिर्माण क्षेत्र जुलाई के जीएसटी लागू होने के झटके से उबर गया है।”
दूसरी तिमाही में 7.5% तक GDP
नीति आयोग के नवनियुक्त उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा है कि मजबूत आर्थिक बुनियाद, बेहतर मानसून तथा एफडीआई एवं सेवा क्षेत्र के अच्छे प्रदर्शन से चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में आर्थिक वृद्धि दर 7.0 से 7.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। उन्होंने यह भी कहा कि पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2017) में आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट का कारण नोटबंदी नहीं है। दरअसल नोटबंदी केवल 6 सप्ताह के लिए 8 नवंबर से 30 दिसंबर तक थी। उसमें भी करंसी मौजूद थी। कुमार ने कहा कि वास्तव में जीडीपी वृद्धि में कमी का कारण जीएसटी लागू होने से पहले कंपनियों द्वारा उस दौरान बचे हुए माल को छूट देकर निकालना (डिस्टॉकिंग) और विनिर्माण क्षेत्र का तुलनात्मक आधार पर कमजोर प्रदर्शन है।
क्या विडंबना है कि जो काम आपकी योजना में भी था, लेकिन करने का साहस नहीं कर पाए और जब वही काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर दिया, नवम्बर 8 को कांग्रेस पार्टी देश में नोटबंदी की सालगिरह पर काला दिवस मना रही है, कांग्रेस का आरोप है कि नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी कर भारत के लोगों पर अत्याचार किया था, 100 से अधिक लोग शहीद हो गए थे, मोदी इन सभी लोगों के हत्यारे है, देश को मोदी ने बर्बाद कर दिया, लोगों को लाइन में लगाकर मार डाला।
अगर कांग्रेस का यही सेम लॉजिक 1947 पर लगाया जाये तो कांग्रेस के हिसाब से ही गांधी तथा नेहरू 30 लाख से अधिक भारतीयों के क़त्ल के जिम्मेदार है, गांधी नेहरू के कारण 30 लाख भारतीय शहीद हो गए, जिनको आज तक कांग्रेस ने श्रद्धांजलि नहीं दी, और 30 लाख भारतीयों के हत्यारे नेहरू को भारत रत्न और मोहनदास गांधी को तथाकथित राष्ट्रपिता बता दिया गया, जैसे भारत का निर्माण गांधी ने किया (5000 साल से अधिक का तो इतिहास भारत का मौजूद है)
कांग्रेस कहती है कि मोदी ने नोटबंदी से पहले तैयारी नहीं की, फैसला मोदी ने जल्दबाजी में लिया, इसी हिसाब से गांधी-नेहरू ने कौन सी तैयारी बंटवारे से पहले करी, नेहरू को तो PM बनने की जल्दी थी, वहीँ गांधी को राष्ट्रपिता और संत बनने की जल्दी, जिसके कारण 30 लाख तो क़त्ल कर दिए गए और करोडो भारतीयों की तो पूरी जिंदगी की कमाई, घर, जमीन सब लूट गया, किसी को आज तक कांग्रेस ने मुआवजा दिया है और बंटवारे का फल तो देखो, आज भारत के दोनों तरफ भारत के दुश्मन है जो आतंकवाद फैला रहे है।

कांग्रेस की माने तो मोदी की नोटबंदी से देश बर्बाद हो गया, मोदी देश से माफ़ी मांगे, 30 लाख भारतीयों के क़त्ल, देश के 3 टुकड़े होने के लिए कांग्रेस ने देश से कितनी बार माफ़ी मांगी है ?
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज जमकर अपना मुँह खोला, वो गुजरात में थे और उन्होंने जमकर विरोध किया , बहुत दिनों बाद वो लोगों को बोलते हुए दिखाई दिए, मनमोहन ने मोदी पर जमकर निशाना साधा, मोदी पर हमला किया, मोदी की नीतियों पर हमला बोला, और हमला बोलते बोलते ऐसी बातें कह दी की अब वो चर्चा का विषय बन चुकी है
मनमोहन सिंह ने नोटबंदी की आलोचना की, और कहा की नोटबंदी के कारण देश की कमर टूट गयी, नोटबंदी एक लूट थी, नोटबंदी एक घोटाला था।
मोदी के इस निर्णय की भूतपूर्व प्रधानमन्त्री डॉ मनमोहन सिंह लाख विरोध कर लें, परन्तु हृदय से मोदी के इस साहसिक निर्णय की प्रशंसा भी करते हैं, लेकिन गुलामी मानसिकता होने के कारण अपनी आका के निर्देशों का पालन कर रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ, सुलझे नेता एवं भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने तो अपनी पुस्तक के माध्यम से सोनिया गाँधी तो क्या कांग्रेस पार्टी को बेनकाब करने का साहस कर दिखाया, डॉ मनमोहन सिंह आप कब साहस दिखाओगे? एक अर्थशास्त्री होने के कारण आपका कर्तव्य था, मोदी के इस निर्णय से दूरगामी देशहित में होने वाले परिणामों से देश को अवगत करवाते, आप तो विरोध करने बैठ गए। जबकि अर्थशास्त्री अनिल बोकिल मोदी के इस निर्णय की प्रशंसा कर रहे हैं।
मनमोहन सिंह ने ये भी कहा की, नोटबंदी का फैसला मोदी ने किस से पूछकर लिया था, मोदी की हिम्मत ही कैसे हुई की बिना किसी से पूछे उन्होंने नोटबंदी का फैसला किया।
मनमोहन सिंह यही नहीं रुके, उन्होंने ये भी कहा की मोदी की सारी आर्थिक नीतियां ख़राब है, और उस से भारत और यहाँ की इकॉनमी का बेडागर्क हो रहा है।
जबकि अभी हाल ही में वर्ल्ड बैंक ने भारत की आर्थिक नीतियों की तारीफ की है, और व्यापार में आसानी वाली रैंकिंग में भी भारत ने ऐतिहासिक सुधार किया है, 130 नंबर से भारत 100 नंबर पर पहुँच गया है, भारत में वर्ल्ड बैंक अरबों डॉलर लगाने को तैयार है।
कोई भी बैंक बिना रिसर्च किये किसी देश को पैसा नहीं देता, भारत की इकॉनमी को देखते हुए ही वर्ल्ड बैंक भारत में इतना दिलचस्बी दिखा रहा है, आपको ये भी बता दें की मनमोहन सिंह जो मोदी पर आज इतना बोले, 2004 में वाजपेयी ने मनमोहन सिंह को 8.4% वाली जीडीपी दी थी, जिसे मनमोहन सिंह ने अपनी आर्थिक नीतियों के कारण 2014 में 4.8% कर मोदी को दे दिया।
जिस मनमोहन सिंह ने कोयला, 2G, और अन्य कई घोटालों पर आज तक 1 भी शब्द नहीं कहा है, वो नोटबंदी को लूट और घोटाला बता गए, साथ ही मनमोहन सिंह ने ये भी स्वीकार कर लिया की मोदी तो अपनी मर्जी से फैसले करते है, पर जब वो PM थे वो किसी और (सोनिया) की मर्जी से फैसले लिए करते थे।
‘कैश बब्बल’ से बच गया इंडिया
देश के जाने माने अर्थशास्त्री अनिल बोकिल ने कहा कि देश में ‘कैश बब्बल’ था और अगर नोटबंदी न होती तो भारत भी अमेरिका की तरह 2008 जैसी मंदी का शिकार हो सकता था। बोकिल के अनुसार नोटबंदी से पहले कम टैक्स कलेक्शन होता था जिस कारण सरकार को ज्यादा नोट छापने पड़ते थे और उसकी वजह से देश में कैश का ढेर हो गया था। हर ट्रांजैक्शंस के लिए कैश चल रहा था। जिसका अंजाम बुरा हो सकता था।
नोटबंदी ने ‘महामंदी’ से बचाया
2008 में अमेरिका में छाई थी मंदी
2008 में अमेरिका में आई महामंदी के कारण प्रमुख व्यवसायों की विफलता, ट्रिलियन अमेरिकी डॉलरों में अनुमानित उपभोक्ता संपत्ति में कमी, सरकारों द्वारा पर्याप्त वित्तीय प्रतिबद्धताएं और आर्थिक गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण गिरावट देखी गई थी। वर्ष 2008 की शुरुआत में जीडीपी के नकारात्मक आंकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। अमेरिका में होम लोन और मॉर्गेज लोन न चुका पानेवाले ग्राहकों की संख्या बढ़ती चली गई थी, जिससे लेहमैन ब्रदर्स, मेरीलिंच, बैंक ऑफ अमेरिका जैसी वित्तीय संस्थाएं तरलता (Liquidity)के अभाव में आ गईं थी। अमेरिकी सरकार के बैलआउट पैकेज भी इस अभाव को कम नहीं कर पाए और देखते ही देखते अमेरिका में 63 बैंकों में ताले लग गए थे।
इंडियन इकोनॉमी पर पड़ा था असर
अमेरिकी मंदी का असर भारत सहित पूरे विश्व पर हुआ, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह असर शेयर बाजार, इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट, आउसोर्सिंग बिजनेस पर ही ज्यादा दिखाई दिया था। एक समय 21000 के स्तर पर चल रहा सेंसेक्स मार्च 2009 तक 8000 के स्तर पर आ गया था, यानि डाउजोंस के गिरने से सेंसेक्स में भी 60 प्रतिशत तक की गिरावट हुई। डॉलर के रुपये के मुकाबले कमजोर होने से आउटसोर्सिंग और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बिजनेस में भारत को बहुत फर्क पड़ा था। भारत की इकोनॉमी गर्त में जा रही थी। कमोबेश यही स्थिति नोटबंदी से पहले उत्पन्न हो रही थी जिसे मोदी सरकार ने भांप लिया और समय समय रहते कदम उठा लिया।
1929-39 में आई थी ‘महामंदी’
इतिहास में महामंदी या भीषण मंदी (द ग्रेट डिप्रेशन1929-39) के नाम से जानी जानेवाली घटना एक विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की थी। यह वर्ष 1929 में शुरू हुई और 1939-40 तक जारी रही थी। विश्व के आधुनिक इतिहास की इस सबसे बड़ी मंदी ने ऐसा कहर मचाया था कि उससे उबरने में कई साल लग गए थे। इससे फासीवाद बढ़ा और द्वितीय विश्वयुद्ध की नौबत आ गई।
नोटबंदी के बाद बढ़े शेयर बाजार
08 नवंबर 2016 को नोटबंदी जब लागू हुआ तो उस वक्त सेंसेक्स करीब 25 हजार के आस-पास था और निफ्टी करीब आठ हजार अंकों के करीब आज के दौर में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का शेयर सूचकांक करीब 32 हजार के इर्द-गिर्द है जबकि निफ्टी 10 हजार के इर्द गिर्द है। जाहिर तौर पर नोटबंदी के बाद निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और बिकवाली घटी है। यानि हम कह सकते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में एक स्थायित्व का भाव है।
जाली नोटों से मुक्ति दिलाएगी नोटबंदी
अर्थक्रांति नाम से एक थिंक टैंक चलाने वाले अनिल बोकिल ने कहा कि नोटबंदी जरूरी थी क्योंकि भारतीय रुपया नकली नोटों की वजह से बर्बाद हो रहा था। जो भी किया गया वह इकॉनमी को बचाने के लिए किया गया। यह केवल ब्लैक मनी तक सीमित नहीं था, इसके और भी कई आयाम थे। रिजर्व बैंक के अनुसार 500 रुपये के बंद हुए हर 10 लाख नोट में औसत 7 नोट नकली थे और 1000 रुपये के बंद हुए हर 10 लाख नोटों में औसत 19 नोट नकली थे।
विनिर्माण क्षेत्र में तेजी आई
नोटबंदी की नकारत्मक खबरें फैलाए जाने के बीच देश के विनिर्माण क्षेत्र में नए ऑर्डर मिलने, उत्पादन और रोजगार गतिविधियां बढने से अगस्त माह में उछाल दर्ज किया गया। निक्केई इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) अगस्त माह में उछलकर 51.2 पर पहुंच गया। एक माह पहले जुलाई में यह 47.9 पर था। माल एवं सेवाकर (जी.एस.टी.) के एक जुलाई से लागू होने के चलते विनिर्माण क्षेत्र में गतिविधियां काफी धीमी पड़ गई थी। अगस्त में क्षेत्र इस स्थिति से उबर गया। रिपोर्ट तैयार करने वाली आईएचएस मार्केट की प्रधान अर्थशास्त्री पोलियाना डी लीमा ने कहा, ”अगस्त पीएमआई दर्शाता है कि भारत में विनिर्माण क्षेत्र जुलाई के जीएसटी लागू होने के झटके से उबर गया है।”
दूसरी तिमाही में 7.5% तक GDP
नीति आयोग के नवनियुक्त उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा है कि मजबूत आर्थिक बुनियाद, बेहतर मानसून तथा एफडीआई एवं सेवा क्षेत्र के अच्छे प्रदर्शन से चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में आर्थिक वृद्धि दर 7.0 से 7.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। उन्होंने यह भी कहा कि पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2017) में आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट का कारण नोटबंदी नहीं है। दरअसल नोटबंदी केवल 6 सप्ताह के लिए 8 नवंबर से 30 दिसंबर तक थी। उसमें भी करंसी मौजूद थी। कुमार ने कहा कि वास्तव में जीडीपी वृद्धि में कमी का कारण जीएसटी लागू होने से पहले कंपनियों द्वारा उस दौरान बचे हुए माल को छूट देकर निकालना (डिस्टॉकिंग) और विनिर्माण क्षेत्र का तुलनात्मक आधार पर कमजोर प्रदर्शन है।




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