आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
गुजरात के गांधीनगर में एक आर्चबिशप के पत्र ने राजनीतिक गलियारों में घमासान मचा दिया है। आर्चबिशप थामस मैकवान ने एक पत्र में बिना किसी राजनीतिक पार्टी का नाम लिए अपील की है कि राष्ट्रवादी ताकतों से देश भर चुका है और गुजरात चुनाव में वोट करके इस समस्या को खत्म किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये पत्र पब्लिक के लिए नहीं है बल्कि प्रार्थना करने के लिए एक अपील है।
सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने सवाल पूछा कि एक चर्च राजनीतिक मामलों में क्यों दखल दे रहा है। एनडीटीवी को दिए बयान के मुताबिक आर्चबिशप थामस ने कहा कि हमने पहली बार पत्र नहीं लिखा है, इससे पहले भी जब चुनाव हुए हैं तो हमने लोगों को सचेत करने का काम किया है।
हमने लोगों को वोट करने के लिए प्रेरित किया और उनसे कहा कि वो अपने विवेक के आधार पर अपना नेता चुनें। आर्चबिशप ने यह भी कहा कि यह पत्र केवल पब्लिक के लिए ही नहीं है बल्कि यह लोगों के लिए एक प्रार्थना है। उन्होंने कहा कि गुजरात में क्रिश्चचियन वोट एक बहुत ही छोटा भाग है।
65 साल के आर्चबिशप मैकवान ने 21 नवंबर को लिखे अपने पत्र में कहा कि इस चुनाव के नतीजे बहुत मायने रखते हैं जिसका प्रभाव हमारे प्यारे देश पर पड़ेगा। इस पत्र में आरोप लगाते हुए कहा गया कि हमारे देश की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष छवि दांव पर लगी है।
मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब हमारे चर्च पर हमला न किया जाता हो। पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि अल्पसंख्यकों, ओबीसी और गरीबों के बीच तेजी से असुरक्षा की भावना बढ़ी है।
पत्र में एक प्रार्थना का जिक्र भी किया गया है। आर्चबिशप ने गुजरात के सभी विशप से प्रार्थना करने के लिए कहा, जिससे एक ऐसा व्यक्ति गुजरात चुनाव में जीते जो भारतीय संविधान के प्रति वफादार हो और हर व्यक्ति का बिना किसी भेदभाव के आदर करे।
प्रार्थना में उन्होंने देश को राष्ट्रवादी ताकतों से सुरक्षित रखने की बात कही। आपको बता दें कि थामस मैकवान गांधीनगर में पिछले दो सालों से आर्चबिशप के तौर पर सेवा कर रहे हैं। आपको बता दें कि गुजरात में 9 और 14 दिसंबर को चुनाव होने हैं और उनके परिणाम 18 दिसंबर को आएंगे।
गुजरात के राजनीतिक हलकों में इस अपील को सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ वोट का परोक्ष आह्वान माना जा रहा है. गांधीनगर के कलक्टर और जिला चुनाव अधिकारी सतीश पटेल ने बताया कि चुनाव आयोग ने मीडिया की खबरों का संज्ञान लेने के बाद नोटिस जारी किया है और पादरी से कहा है कि वे ऐसा पत्र जारी करने के पीछे की अपनी मंशा साफ करें.
पटेल ने रविवार (26 नवंबर) को कहा, ‘‘हमने प्रधान पादरी को एक नोटिस जारी किया है और मीडिया में काफी प्रचारित हुए पत्र के पीछे की उनकी मंशा साफ करने को कहा है . हमने उन्हें जवाब देने के लिए कुछ वक्त दिया है. हम अपने जवाब के आधार पर भविष्य के कदम पर फैसला करेंगे.’’ उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि पत्र का मकसद ऐसे समय में अल्पसंख्यक समुदाय को ‘‘भ्रमित’’ और गुमराह करना था जब राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू है. पटेल ने कहा, ‘‘हम समझते हैं कि पत्र ऐसे समय में वोटरों को गुमराह करने और अल्पसंख्यक समुदाय को भ्रमित करने के लिए था जब आदर्श आचार संहिता लागू है . ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.’’
क्या पादरी तमिलनाडु की तरह गुजरात और अन्य राज्यों में चर्च से सरकार बनाने या चलाने का खेल खेल रहे हैं? पहले तो दिल्ली की जामा मस्जिद से मुस्लिम को भाजपा से दूर रह कर वोट न देने की अपील होती थी, लेकिन मुस्लिम हित की चिन्ता करने वाले छद्दम नेता और पार्टियों की बाढ़ आने से जामा मस्जिद का वर्चस्व खंडित हो रहा है। अब पादरी भी कूद पड़े, यह राजनीति का अखाडा है क्या? यह साम्प्रदायिकता नहीं है तो क्या है?
पटेल ने रविवार (26 नवंबर) को कहा, ‘‘हमने प्रधान पादरी को एक नोटिस जारी किया है और मीडिया में काफी प्रचारित हुए पत्र के पीछे की उनकी मंशा साफ करने को कहा है . हमने उन्हें जवाब देने के लिए कुछ वक्त दिया है. हम अपने जवाब के आधार पर भविष्य के कदम पर फैसला करेंगे.’’ उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि पत्र का मकसद ऐसे समय में अल्पसंख्यक समुदाय को ‘‘भ्रमित’’ और गुमराह करना था जब राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू है. पटेल ने कहा, ‘‘हम समझते हैं कि पत्र ऐसे समय में वोटरों को गुमराह करने और अल्पसंख्यक समुदाय को भ्रमित करने के लिए था जब आदर्श आचार संहिता लागू है . ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.’’
क्या पादरी तमिलनाडु की तरह गुजरात और अन्य राज्यों में चर्च से सरकार बनाने या चलाने का खेल खेल रहे हैं? पहले तो दिल्ली की जामा मस्जिद से मुस्लिम को भाजपा से दूर रह कर वोट न देने की अपील होती थी, लेकिन मुस्लिम हित की चिन्ता करने वाले छद्दम नेता और पार्टियों की बाढ़ आने से जामा मस्जिद का वर्चस्व खंडित हो रहा है। अब पादरी भी कूद पड़े, यह राजनीति का अखाडा है क्या? यह साम्प्रदायिकता नहीं है तो क्या है?
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