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आखिर कब तक भारतीय इतिहास को कलंकित किया जाएगा?

पद्मावती विवाद : 'भंसाली नहीं माने, तो हम उन्हें कोई भी फिल्म नहीं बनाने देंगे', जानें किसने क्या कहा...
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती को लेकर चल रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। फिल्म का विरोध न केवल करणी सेना जैसे संगठन कर रहे हैं, बल्कि बीजेपी और कांग्रेस के कुछ विधायक और सांसद भी विरोध को हवा दे रहे हैं। खास बात यह है कि यह विवाद तब है जबकि किसी ने भी फिल्म पद्मावती को देखा तक नहीं है। यहां तक कि सेंसर बोर्ड ने भी इसे अभी पास नहीं किया है। ताजा बयान बीजेपी के विधायक राम कदम का आया है। उनका विरोध इस मायने में अहम है क्योंकि वह फिल्म स्टूडियो सेटिंग और संबद्ध मजदूर यूनियन के प्रमुख भी हैं। 
राम कदम ने न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा, 'हमारा संगठन ऐसे लोगों का समर्थन नहीं करेगा, जो अपनी फिल्म की पब्लिसिटी के लिए इतिहास से छेड़छाड़ करते हैं. हम बैन की मांग करेंगे। वहीं यदि भंसाली नहीं माने, तो हमारा यूनियन उनको कोई भी फिल्म शूट नहीं करने देगा।'
बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म पद्मावती  की रिलीज की तैयारियों के बीच कहा है कि मैं जानती हूं और मैं मानती हूं कि इस फिल्म की रिलीज को कोई नहीं रोक सकता है. बड़े पर्दे पर लगते ही यह फिल्म इस इंडस्ट्री के लिए बड़ी जीत साबित होगी. फिल्म में टाइटल भूमिका निभा रही पादुकोण ने मीडिया को दिये एक इंटरव्यू में कहा कि एक महिला होने के नाते इस फिल्म का हिस्सा होने पर मुङो गर्व है. मुङो यह कहानी सुनाते हुये गर्व होगा और यह कहानी अभी सुनाये जाने की जरूरत भी है.
वैसे इस मुद्दे पर इससे पहले भी कई नेता अपनी बात रख चुके हैं और इनमें से ज्यादातर ने पद्मावती का विरोध करने वालों का समर्थन किया है।
दीपिका पादुकोण का सही सवाल था कि एक देश के तौर पर हम कहां जा रहे हैं?
सच में यह हमारा पिछड़ापन ही है कि अब हम अनपढ़, फुहढ़ अश्लीलता परोस रहे कलाकारों से सभ्यता सीख रहे हैं। 
यह सिनेमा एक षडयंत्र के तहत हमें एकतरफा सेक्युलरिज़्म सिखा रहा है, जिसकी फिल्मों में पंडित जी हमेशा बेईमान, गांव का ठाकुर जाहिल और लाला ब्याजखोर ही दिखाया गया। दूसरी तरफ पादरी और मौलवी हमेशा मानवीय ही दिखाए गए। यदि सिनेमा समाज का दर्पण है तो यह हक़ीक़त नहीं है, कश्मीर के मदरसों और केरल के चर्च यौन उत्पीड़न, धर्मांतरण,लव जिहाद के ठिकाने हैं, इन पर भी कुछ दिखा देते। खैर, यह तुम्हारे बूते की बात नहीं।
लेकिन, ध्यान रखो कि तुम्हारी यही एकतरफा हरकतें हैं, जो देश में चुपचाप दक्षिणपंथ को मजबूत कर रही हैं। 
आइए जानते हैं अब तक किसने क्या कहा है...
  • दीपिका लेक्चर न दें : बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने फिल्म की लीड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण पर निशाना साधते हुए कहा है, 'अभिनेत्री दीपिका पादुकोण हमें पिछड़ेपन को लेकर लेक्चर दे रही हैं! यह देश तभी विकास कर सकता है, जब उनकी नजर में वह पीछे जा रहा हो।' इस बीच दीपिका पादुकोण ने कहा है कि फिल्म को रिलीज होने से कुछ भी नहीं रोक सकता है। 
  • प्रिंट जला दें : विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के नेता आचार्य धर्मेन्द्र ने फिल्म पद्मावती में इतिहास के साथ की गई कथित छेड़छाड़ के मामले पर तीव्र रोष व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्म पद्मावती के सारे प्रिंट जला दिए जाने चाहिए और निर्माता/निर्देशक संजय लीला भंसाली पर मुकदमा चलाना चाहिए। 
  • मूल समस्याओं पर ध्यान दें: कांग्रेस नेता शशि थरूर ने  कहा कि फिल्म पर विवाद राजस्थानी महिलाओं की स्थिति पर ध्यान देने का एक मौका है और शिक्षा 'घूंघट' या सिर पर पर्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण है। थरूर ने ट्वीट कर कहा, " 'पद्मावती' विवाद आज राजस्थानी महिलाओं की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करने का एक मौका है, न कि छह शताब्दी पुरानी महारानियों पर ध्यान केंद्रित करने का। .राजस्थान की महिला की साक्षरता दर सबसे कम है. शिक्षा 'घूंघट' से ज्यादा जरूरी है।"
  • माफी मांगें : पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा है कि ऐतिहासिक तथ्यों से कथित तौर पर छेड़छाड़ करने पर ‘पद्मावती’ के निर्माता माफी मांगे। उन्होंने कहा कि फिल्म में रानी पद्मावती (पद्मिनी) के चरित्र से छेड़छाड़ की गई है।  संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ शुरू से ही विवादों में रही है। 
संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती का बिहार में भी तीखा विरोध हो रहा है। बिहार के कई जिलों में फिल्म के विरोध में धरना-प्रदर्शन हो चुका है। 18 नवंबर को सभी जिला मुख्यालयों में पुतला दहन के अलावा एनडीए मंत्रियों का घेराव और विरोध भी किया जाएगा। 
भाजपा-जदयू मंत्रियों का होगा घेराव
क्षत्रिय समन्यवय समिति बिहार के कार्यक्रम संचालक मनीष सिंह ने बताया कि 18 नवम्बर को शाम 4 बजे सभी जिला मुख्यालयों पर भंसाली का पुतला दहन कार्यक्रम किया जाएगा। भाजपा एवं जदयू के जिला एवं राज्यस्तरीय कार्यालयों पर ज्ञापन सौंप कर फिल्म का प्रदर्शन रोकने की मांग की जाएगी। भाजपा एवं जदयू के मंत्रियों पर उनके क्षेत्र के क्षत्रियों द्वारा सशर्त दबाव बनाया जागा कि बिहार में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाई जाए अन्यथा क्षत्रिय समाज वैसे तटस्थ राजनेता के निर्वाचन में उनके विरुद्ध मतदान करने की मुहिम चलाएगा। 
क्षत्रिय समन्वय समिति कर रही विरोध
महासती रानी पद्मावती पर बनी फिल्म के निर्माता एवं निदेशक संजय लीला भंसाली के निदेशन में बनाये गए विवादित फिल्म “पद्मावती”  से जुड़े अनेक दृश्यों पर पूरे भारतवर्ष से हिन्दुओं खासकर राजपूतों का राष्ट्र व्यापी विरोध एक जनांदोलन का रुप ले लिया है। इसी क्रम में बिहार में संचालित सभी राष्ट्रीय एवम राजकीय क्षत्रिय संगठनों के प्रतिनिधियों से गठित क्षत्रिय समन्वय समिति पहले चरण में गर्दनीबाग पटना में शान्तिपूर्ण धरना देकर मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल के समक्ष अपनी मांग रखी जा चुकी है। संचालक मनीष सिंह ने कहा कि क्षत्रियों का इतिहास राष्ट्र गौरव का विषय है और महारानी पद्मावती हिंदुस्तान के इतिहास की नायिका है। क्षत्रिय समन्वय समिति ने ऐलान कर रखा है कि गौवशाली इतिहास के साथ छेड़छाड़ किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। क्षत्रिय समन्वय समिति ने सरकार को चेतावनी दी है कि बिहार में इस फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया जाए नहीं तो माता पद्मावती के सम्मान में जरूरत पड़ने पर क्षत्रिय समाज जेल जाने से भी पीछे नही हटेगा। 
सस्ती लोकप्रियता के लिए गौरवशाली इतिहास को किया जा रहा कलंकित
क्षत्रिय समन्वय समिति बिहार के कार्यक्रम संचालक मनीष सिंह ने बताया कि भारतीय हिन्दू संस्कृति में पतिव्रता और साहसी स्त्रियों में महासती पद्मावती का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। भारत और राजस्थान के केशरिया ध्वजवाहक हिन्दू राजपूताने  के गौरवशाली इतिहास को कलंकित कर इस फिल्म के द्वारा सस्ती लोकप्रियता हासिल कर ज्यादा से ज्यादा धन उगाही का माध्यम बनाने की असफल कोशिश की जा रही है और ऐसे कृत्यों से भारतीय इतिहास कलंकित होगा। 
Image may contain: outdoorबॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म पद्मावती  की रिलीज की तैयारियों के बीच कहा है कि मैं जानती हूं और मैं मानती हूं कि इस फिल्म की रिलीज को कोई नहीं रोक सकता है। बड़े पर्दे पर लगते ही यह फिल्म इस इंडस्ट्री के लिए बड़ी जीत साबित होगी। फिल्म में टाइटल भूमिका निभा रही पादुकोण ने मीडिया को दिये एक इंटरव्यू में कहा कि एक महिला होने के नाते इस फिल्म का हिस्सा होने पर मुझे गर्व है। मुझे यह कहानी सुनाते हुये गर्व होगा और यह कहानी अभी सुनाये जाने की जरूरत भी है। 
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लाल चिन्ह वाले द्वार से कूद पद्मावती
ने खिलजी से अपनी शील की रक्षा की थी  
दीपिका ने कहा है कि फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली का यह राजपूत रानी पद्मावती के परम बलिदान, अद्भुत साहस और सम्मान की गाथा को श्रद्धांजलि है।  जब दीपिका से यह पूछा गया कि भंसाली पर हर तरफ से आरोप लग रहा है कि उन्होंने फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की है और फिल्म की रिलीज को रोके जाने की मांग हो रही है। तब दीपिका ने कहा कि फिल्म तो तय समय से यानी एक दिसंबर को ही रिलीज होगी. दीपिका ने कहा कि यह बहुत डराने वाली बात है. हम किन बातों में पड़ रहे हैं और हम एक देश के रूप में कहां पहुंच गये है। पद्मावती की रिलीज को कोई रोक नहीं सकता है। 
फिल्म से जुड़े विवाद पर फिल्म पड़ेगी भारी 
फिल्म की रिलीज पर हल्ला बोल के जवाब में उन्होंने कहा कि हम केवल सेंसर बोर्ड के प्रति जवाबदेह है। यह फिल्म इससे जुड़े विवाद पर भारी पड़ेगी. दीपिका ने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि फिल्म उनकी निभाई भूमिका यानी पद्मावती पर आधारित है, जबकि फिल्म में दो बड़े अभिनेता शाहिद कपूर और रणवीर सिंह भी है। दीपिका की संजय लीला भंसाली के साथ यह तीसरी फिल्म है। 
पद्मावती फिल्म पर हो रहे विवाद पर दो किस्से स्मरण आ रहे हैं : (1) बात सन 1968/69 की है। मक्का फिल्म्स ने हज पर आधारित फिल्म "खान-ए-खुदा" के प्रदर्शन पूर्व भारत के हर प्रमुख प्रान्त में मुस्लिम उलेमाओं, मौलवी एवं विद्धवानों के लिए pre-release का आयोजन किया था। ताकि फिल्म में यदि किसी भी तरह की कोई कमी हो, फिल्म को सेंसर बोर्ड में भेजने से पूर्व ही उसे दूर कर लिया जाए। सौभाग्य से दिल्ली में यह आयोजन पिताश्री एम. बी.एल.निगम के ज़िम्मे था, पहले तो यह आयोजन जामा मस्जिद के निकट जगत सिनेमा(अब बंद है) पर प्रातः 9 बजे रखा गया था। दुर्भाग्य से जगत कर्मचारियों के कारण शो नहीं हो पाया, क्योकि सिनेमा स्टाफ ने पूरी बालकनी अपने परिचितों से भर दी थी, जबकि मनोरंजन विभाग से केवल 25 आदमियों के लिए ही इज़ाज़त होती है। बरहाल महादेव रोड स्थित ऑडिटोरियम में आयोजन हुआ, सभी प्रतिष्ठित लोगों ने लिखित में फिल्म को प्रदर्शन की इजाजत दे दी। फिल्म हाउस फूल में 8वें सप्ताह में ही थी, कि मेरठ से आवाज़ आ गयी, विरोध में नहीं, बल्कि उनका कहना था "फिल्म में कोई कमी नहीं, लेकिन रील घिसने पर काट के जोड़ी जाएगी तो ख़राब रील कूड़े में जाएगी, उससे हमारे काबा की तोहीन होगी।" फिल्म निर्माता एवं वितरक ने निस्संकोच सप्ताह पूरे होने से 3 दिन पहले ही सब जगह से प्रदर्शन रोक दिया। तब से लेकर आज तक फिल्म का पुनः प्रदर्शन नहीं हुआ। जबकि अनेको फिल्मों में काबा और दरगाहों की शूटिंग है। (2)  सभी जानते हैं कि फिल्म "मुग़ल-ए-आज़म" 60 के दशक की सबसे महँगी फिल्म थी। निर्माता-निर्देशक के. आसिफ कर्जे में डूब चुके थे, इसलिए उन्होंने ने फिल्म में दुःखद अंत की बजाए सुखद अंत का फिल्मांकन किया। संगीतकार नौशाद को इतिहास से छेड़छाड़ नगवार गुजरा, नौशाद साहब और आसिफ में विवाद खड़ा हो गया। नौशाद साहब इस बात से अज्ञान थे कि फिल्म इम्तिआज़ अली ताज के उपन्यास पर आधारित है, इसका इतिहास से दूर तक कोई सरोकार नहीं। नौशाद साहब इतना क्रोधित थे कि संगीतकार की सूची से नाम निकालने और फिल्म में संगीत देने के लिए एक-एक पैसा वापस देने की बात बोल गए। लेकिन जब मालूम हुआ कि वास्तव में फिल्म ताज के उपन्यास पर आधारित है,तब जाकर विवाद समाप्त हुआ था। 
स्वतंत्र पत्रकारिता करते लेख शीर्षक "अनारकली कौन थी?" और अंग्रेजी में "Was Anarkali a myth?" लिखे। अंग्रेजी लेख तो Screen ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था, जबकि हिन्दी वाला लेख भी हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं ने प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया था। मजे की बात यह थी कि कुछ ने तो 2/3 बार प्रकाशित किया था। जिसे मैंने अपनी पुस्तक "भारतीय फिल्मोद्योग -- एक विवेचन" में भी सम्मिलित किया। 
कहने का अभिप्राय केवल इतना ही है कि "पद्मावती" फिल्म पर विवादित बयानबाज़ी से पूर्व फिल्मकारों को इतिहास पढ़ना चाहिए। जब पद्मावती खिलजी से अपनी शीलता को बचाने कुएं में कूदकर अपनी जान दे देती है, इतना तो दिमाग का प्रयोग करो कि " क्या पद्मावती खिलजी के साथ रासलीला कर सकती है?" क्यों इतिहास का मजाक बना रहे हो। वैसे पूर्व में इस फिल्म के विरोध के बहुत कुछ लिख चूका हूँ। और लिखने को कुछ शेष नहीं बचा। 
अपने जुझारू रवैए की वजह से ही राजे दूसरी बार सीएम बनी हैं। इसलिए आम राजपूत और देशभक्त का मानना है कि यदि वसुंधरा राजे विरोध करेंगी तो भस्मासुर संजय लीला भंसाली की हिम्मत नहीं की,वह एक दिसम्बर को फिल्म रिलीज कर दें। राजस्थान में इस समय सत्तारुढ़ भाजपा के 24 राजपूत विधायक हैं। इनमें से पांच सीधे तौर पर मंत्री हैं। ये हैं राजेन्द्र सिंह राठौड़, राजपाल सिंह शेखावत, गजेन्द्र सिंह खींवसर, पुष्पेन्द्र सिंह राणावत व प्रेम सिंह बाजौर, जबकि शंभु सिंह खेतासर तथा महेन्द्र सिंह राठौड़ राज्यमंत्री की सुविधा ले रहे हैं। इसी प्रकार लोकसभा के सांसद गजेन्द्र सिंह शेखावत और राज्यवर्धन सिंह राठौड़ केन्द्रीय मंत्री तथा हरिओम सिंह राठौड़ लोकसभा तथा हर्षवर्धन सिंह राज्यसभा के सांसद हैं। इतना ही नहीं राव राजेन्द्र सिंह राजस्थान विधानसभा के उपाध्यक्ष हैं। यानि केन्द्र और राज्य में राजपूत समाज का जबरदस्त दबदबा है। समाज की ताकत पर सत्ता का सुख भोग रहे भाजपा मुख्यमंत्री, मंत्री सांसद और विधायक विरोध करने लगे तो फिर राजपूत समाज के आम व्यक्ति को विरोध करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। इस सारे प्रकरण में सीएम वसुंधरा राजे की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यदि सीएम राजे इशारा करेंगी तो राजपूत मंत्री और विधायक भी विरोध करने लगेंगे, लेकिन यदि राजे का इशारा नहीं होगा तो किसी भी राजपूत मंत्री अथवा विधायक में इतनी हिम्मत नहीं कि वह फिल्म पद्मावती का विरोध कर दे। भले ही जयपुर ग्रामीण के सांसद राज्यवर्धन सिंह केन्द्र में सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री हों।
किसी फिल्म या कलाकृति से भावनाएं आहत होने का आलम यह है कि महज ऐसी आशंका से पाबंदी की घोषणा कर दी जाती है, जबकि उसका कोई मजबूत आधार नहीं होता। गोवा में होने वाले आइएफएफआइ यानी अंतरराष्ट्रीय भारतीय फिल्म महोत्सव में जिस तरह दो फिल्मों- ‘एस दुर्गा’ और ‘न्यूड’ को भारतीय पैनोरमा खंड से हटाया गया, वह एक बड़ा सवाल है कि किसी खास सामाजिक समूह की ओर से जताई जाने वाली आपत्ति के बरक्स खुद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यह फैसला किया। ज्यादा हैरानी की बात यह है कि इस बारे में मंत्रालय ने आइएफएफआइ की तेरह सदस्यीय जूरी को बताना तक जरूरी नहीं समझा। जाहिर है, मंत्रालय का यह रवैया जूरी के कई सदस्यों को नागवार गुजरा और उसके प्रमुख सुजॅय घोष ने विरोधस्वरूप इस्तीफा दे दिया।
यह एक विचित्र पहलू है कि एक ओर किसी फिल्म के नाम में ‘दुर्गा’ जुड़ा होने भर से भावनाएं आहत होने की आशंका खड़ी हो जाती है और उसे हटाने का फैसला कर लिया जाता है, दूसरी ओर इसी तरह की स्थितियों में उत्तर प्रदेश सरकार ‘पद्मावती’ को संरक्षण देने का भरोसा देती है। जबकि ‘एस दुर्गा’ और ‘न्यूड’ नामक फिल्मों की जो कहानी अब तक सामने आई हैं, उसके मुताबिक उन्हें आइएफएफआइ की सूची से हटाने की कोई तुक नहीं बनती थी। ‘एस दुर्गा’ में पुरुष प्रधान समाज में उत्पीड़न और शक्ति के दुरुपयोग की मानसिकता से लड़ते दुर्गा नामक नायक को दिखाया गया है, वहीं ‘न्यूड’ में दो महिलाओं के निजी जीवन के संघर्ष और जीवट का चित्रण है।

दरअसल, इस मसले पर अपनी राजनीति चमकाने वाले समूहों का निहित स्वार्थ होता है या फिर भावना आहत होने की दुहाई पर साधारण लोग इस्तेमाल हो जाते हैं। यह विचार करने की जरूरत नहीं समझी जाती कि किसी अभिव्यक्ति या कृति के विरोध से पहले उसके संदर्भ जान-समझ लिए जाएं। लेकिन सवाल है कि सरकारी महकमों या फिर सत्ता संस्थानों की ओर से कला माध्यमों में जो दखल दी जाती है, क्या वहां भी वही लापरवाही बरती जाती है? 

न्यूज एंकर ने ट्वीट करके पूछा- सेक्सी राधा और सेक्सी दुर्गा क्यों मैरी, फातिमा और आयशा क्यों नहीं

गौरव सावंत इंडिया टूडे 
जहां एक तरफ भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव से सनल ससिधरन की फिल्म ‘सेक्सी दुर्गा’ और रवि जाधव की ‘न्यूड’ को हटाए जाने के बाद शुरू हुआ विवाद अभी थमा नहीं है। वहीं इंडिया टूडे के एंकर गौरव सावंत ने सेक्सी दुर्गा के नाम पर आपत्ति जताते हुए ट्वीट किया है। गौरव ने ट्वीट करके पूछा है कि फिल्ममेकर्स सिर्फ सेक्सी दुर्गा और सेक्सी राधा नाम ही क्यों इस्तेमाल करते हैं। क्या मैरी, फातिमा और आयशा के साथ कभी सेक्सी शब्द जोड़ा गया है। इसके बाद ट्विटर पर लोगों ने उन्हें चार्ली हेब्दो तक की याद दिला दी। दुर्गा और राधा दोनों हिन्दू देवियों के नाम हैं। वहीं फातिमा, मैरी और आयशा ईसाई और इस्लाम धर्म से जुड़ी महिलाओं के नाम है। सेक्सी दुर्गा फिल्म इस समय विवादों में है। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव से न्यूड और सेक्सी दुर्गा हटाए जाने के बाद से चयन समिति के सदस्य इस्तीफे दे रहे हैं।


नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर जूरी के एक सदस्य ने बताया, “हमने सुना कि जिस समय प्रेस रिलीज भेजी गई थी, उसी समय दो फिल्में हटाई जा रही थीं। इसका कारण हमें नहीं पता है।” जूरी सदस्य ने कहा, “हमने उन्हें पत्र लिखा है। अब हम उनके स्पष्टीकरण का इंतजार कर रहे हैं।” जूरी ने हालांकि, सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मति ईरानी को क्लीन चिट दी है। जूरी सदस्य ने कहा, “वह इसे सही से करना चाहती थीं। चयन प्रक्रिया में उन्होंने सभी सही कदम उठाए। उन्होंने स्वंय जूरी सदस्यों और समिति के सदस्यों को चुना।” सदस्य ने आगे कहा, “लेकिन उनके ऊपर भी प्रभावशाली लोग हैं, जिनके सामने उन्हें झुकना पड़ गया होगा, जैसा कि आप जानते हैं कि यह चयन का समय है।” जूरी सदस्य ने बताया कि जब फिल्मों का चयन हो रहा था, उस समय कोई दखलअंदाजी नहीं थी। जूरी सदस्य ने कहा कि फिल्म ‘न्यूड’ में शायद नग्नता व अश्लीलता ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को परेशान किया हो, जिसके चलते यह हुआ। इस पर अभी तक सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी की टिप्पणी नहीं मिल सकी है।      
जावेद अख़्तर आम राजपूतों और राजपूत रजवाड़ों के बीच फालतू का विवाद और फर्क खड़ा करते हैं। क्या यही बात वे निज़ाम के हैदराबाद के लिये कहेंगे जिसने अंग्रेजों के सारे नाज-नखरे उठाए? और जिसे हिंदुस्तान में मिलना भी मंजूर नहीं था। राजपूत रजवाड़ों के पास तो कंवरसिंह हैं, वीर बाबू अमरसिंह हैं,ठाकुर खुशाल सिंह औवा हैं, रामसिंह पठानिया है, राव गोपाल सिंह हैं, राजा देवी बख्श सिंह हैं, राजा बलभद्रसिंह हैं,महारानी ईश्वरी देवी, उमरगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह हैं,राना बेनी माधवसिंह हैं,राजा ठाकुर किशोर सिंह हैं, नरपतसिंह हैं,महाराज बख्तावरसिंह हैं, राजा बलवंत सिंह हैं,बंधु सिंह हैं--बहुत से राजे रजवाड़े जो अंग्रेजों से भिड़ गये। शहीद हुए। आपके इतिहास ज्ञान का अभाव उन पर आरोप की तरह बस इसलिये कि आपको अपने फिल्मी साथी का रक्षण करना है। शौक से कीजिए लेकिन इन शहीद राणाओं की कीमत पर नहीं।













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