रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा बड़े, अत्याधुनिक और विविध परमाणु हथियारों से नहीं है बल्कि यह खतरा उनकी सुरक्षा कर रहे संस्थानों की स्थिरता को लेकर है। उसमें कहा गया है, ‘‘इस संबंध में, भविष्य में पाकिस्तान की स्थिरता का कयास लगाना आसान नहीं है।’’ पिछले चार दशकों में चरमपंथी जिहादी राज्येतर तत्वों के माध्यम से अफगानिस्तान और भारत में अशांति फैलाने की पाकिस्तान के प्रयासों से उसे भी तगड़ा झटका लगा है. यह रिपोर्ट गौरव कामपानी और भारत गोस्वामी ने लिखी है।
इससे पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने चेतावनी दी थी कि भारत अगर देश (पाकिस्तान) के परमाणु ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक करता है, तो किसी को भी इस्लामाबाद से संयम बरतने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। आसिफ ने बीते 5 अक्टूबर को भारतीय वायु सेना के प्रमुख बी.एस. धनोआ के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी थी, जिसमें उन्होंने (धनोआ) कहा था कि अगर सर्जिकन स्ट्राइक करने की जरूरत पड़ी तो उनका लड़ाकू विमान पाकिस्तान के परणाणु ठिकानों को निशाना बना सकता है और उन्हें नेस्तनाबूद कर सकता है। विदेश मंत्री ने यहां 'यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस' पर एक चर्चा के दौरान भारतीय नेताओं से ऐसा कोई कदम नहीं उठाने की चेतावनी देते हुए कहा कि इसके गंभीर परिणाम हो सकते है।
वॉशिंगटन वाइट हाउस ने लश्कर-ए-तैयबा आतंकी हाफिज सईद की रिहाई पर पाकिस्तान की जमकर लताड़ लगाई। वाइट हाउस ने पाकिस्तान को सीधी चेतावनी दी कि अगर हाफिज को दोबारा तुरंत गिरफ्तार कर उस पर मुकदमा नहीं चलाया गया तो इसका नतीजा \'द्विपक्षीय संबंधों और दुनिया भर में पाकिस्तान की छवि' पर बुरे असर के रूप में दिखेगा। लेकिन इस सन्दर्भ में अमरीका पाकिस्तान को किसी तरह से सहायता को तुरन्त बंद कर देनी चाहिए।
यदि पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादी संगठनों पूर्व में धमकी दे चुके हैं कि जरुरत पड़ने पर पाकिस्तान सरकार के परमाणुओं का इस्तेमाल करने से भी पीछे नहीं हटेंगें। जिसकी विश्व में पाकिस्तान को बहुत बदनामी का सामना भी करना पड़ा था।
इस मसले पर बेहद कड़े बयान में वाइट हाउस पाकिस्तान को आतंकवाद का पोषक देश कहते-कहते बचा। अमेरिकी राष्ट्रपति के दफ्तर ने कहा कि सईद पर मुकदमा चलाने और आरोप गठित करने में पाकिस्तान की असफलता से 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से लड़ने के पाकिस्तान के वादे और अपनी जमीन पर आतंकवादियों को पनाह नहीं देने के उसके दावे को लेकर बेहद निराशाजनक संदेश जाता है।'
वाइट हाउस ने सईद को एक 'कुख्यात आतंकवादी' बताया और कहा कि सईद के दोषी होने को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति है। इस सहमति पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संकल्प 1267 के तहत दिसंबर 2008 में मुहर लगी थी। इसके साथ ही, डिपार्टमेंट ऑफ ट्रेजरी ने उसे विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी घोषित कर रखा है।
वाइट हाउस के बयान में कहा गया है, 'जैसा कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की दक्षिण एशिया पॉलिसी में स्पष्ट है, अमेरिका पाकिस्तान के साथ एक रचनात्मक रिश्ते की उम्मीद करता है, लेकिन पाकिस्तान की जमीन पर अड्डा जमाए उन उग्रवादी और आतंकवादी समूहों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की भी अपेक्षा रखता है जो क्षेत्र के लिए खतरा हैं। सईद की रिहाई गलत दिशा में बढ़ाया गया कदम है। पाकिस्तान सरकार के पास अब हाफिज सईद को उसके अपराध के लिए गिरफ्तार और आरोपित कर बिना विभेद के सभी तरह के आतंकवाद से लड़ने के प्रति गंभीरता प्रदर्शित करने का एक मौका है।'
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से भी इसी तरह के लेकिन थोड़े नरम बयान के तुरंत बाद आए वाइट हाउस के इस राजनीतिक संदेश में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का बिल्कुल खरा-खोंटा अंदाज साफ झलक रहा है। इस बयान में वह राजनियक नफासत नहीं दिख रही जिसे विदेश मंत्री को ओढ़ना पड़ता है। अब यह देखना है कि क्या पाकिस्तान अमेरिका की बात मानता है और अगर नहीं तो अमेरिका क्या करेगा।
यह बयान वाइट हाउस को अमेरिकी संसद से भी अलग करता है जिसने पिछले हफ्ते ही डिफेंस बिल के उस प्रावधान को बदल दिया था जिसके तहत पाकिस्तान सरकार को लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क, दोनों की गतिवितियों पर कठोर रूप से अंकुश लगाने की दिशा में कदम उठाने को मजबूर किया जाता। लेकिन, संशोधित बिल में सिर्फ हक्कानी नेटवर्क पर कार्रवाई की बात कही गई है जिससे स्पष्ट होता है कि वॉशिंगटन को पूर्वी क्षेत्र में खासकर लश्कर-ए-तैयबा, हाफिज सईद और उनकी गतिविधियों की कोई चिंता नहीं है।
पूर्व की अमेरिकी सरकार स्वार्थवश आतंकवाद और आतंकवादी समूहों के लिए पाकिस्तानी जमीन के इस्तेमाल का सबूत सौंपे जाने के बावजूद उसे पुचकारती रही थी। दरअसल, तब का अमेरिकी प्रशासन इस बात से डरता था कि उसके पास एक ऐसे देश को हैंडल करने के लिहाज से पर्याप्त बढ़त नहीं है जिस पर कड़ाई करने के बाद हालात और बिगड़ने का डर हो। लेकिन, ट्रंप के शासन में पाकिस्तान और आतंकवादियों को मिल रही इसकी सरपरस्ती पर सीधा-सीधा निशाना साधकर वाइट हाउस ने इस्लामबाद को किनारे लगा दिया है।
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