किताब के मुताबिक हिंदू युवा वाहिनी की अगुआई में कई हिंदूवादी संगठनों ने एेलान किया कि वह आजमगढ़ में आतंकवाद के खिलाफ एक रैली का आयोजन करेंगे। इस रैली में योगी आदित्यनाथ मुख्य वक्ता थे। 7 सितंबर 2008 की सुबह गोरखनाथ मंदिर से 40 वाहनों का काफिला रवाना हुआ। चूंकि आजमगढ़ में कुछ गलत होने का अंदेशा था, इसलिए योगी की टीम ने तैयारियां की हुई थीं। काफिले में योगी की लाल रंग की एसयूवी सातवें नंबर पर थी।
एेसे हुआ हमला: दोपहर 1 बजकर 20 मिनट पर जब काफिला टकिया (आजमगढ़ से थोड़ा पहले) से गुजर रहा था तो एक पत्थर काफिले की सातवीं गाड़ी पर आकर लगा। इसके बाद चारों तरफ से पत्थरों की बारिश शुरू हो गई। चंद पलों में पेट्रोल बम से हमला किया गया। यह एक सिंक्रनाइज हमला था, जिसकी पहले ही अच्छी तरह योजना बनाई गई थी। इससे योगी के समर्थक तितर-बितर हो गए। काफिला तीन हिस्सों में बंट गया। 6 वाहन आगे चले गए और बाकी पीछे रह गए। किताब के मुताबिक जो बीच में थे वे हमले की चपेट में आ गए। इसके बाद हमलावरों ने वाहनों को घेरकर हमला करना शुरू कर दिया। लेकिन उनका निशाना योगी आदित्यनाथ थे, जिन्हें वह अब तक ढूंढ नहीं पाए थे। योगी के न मिलने के कारण वह और उग्र हो गए। जब काफिले के लोगों को होश आया तो हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था-योगी कहां हैं?
तो कहां गायब हो गए थे योगी?: हमले की सूचना मिलते ही पुलिस स्टेशनों से टीमें भेजी गईं। इस बीच आसपास के विक्रेता मदद के लिए दौड़े और गाड़ियों के आसपास सुरक्षा घेरा बना लिया। सिटी सर्किल अॉफिसर शैलेन्द्र श्रीवास्तव ने जवाबी कार्रवाई का आदेश दिया। इसमें एक शख्स मारा गया। घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन योगी का अब तक कोई अता-पता नहीं था। उनकी खोजबीन और तेज कर दी गई। लेकिन योगी तो पहले ही बहुत आगे निकल चुके थे और बाकी गाड़ियों के आने का इंतजार कर रहे थे। दरअसल योगी को काफिले की पहली गाड़ी में शिफ्ट कर दिया गया था। यह सब पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस में हुआ, जहां काफिला कुछ देर के लिए रुका था। अंतिम समय में हुए इस बदलाव की जानकारी हमलावरों को नहीं थी।
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