
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार
गुजरात चुनाव पर पूरे देश की नजर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की प्रतिष्ठा दांव पर बताई जा रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी गुजरात चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंके हुए है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के लिए गुजरात चुनाव लिटमस टेस्ट है। राहुल गांधी अपने रिवाइवल के लिए गुजरात में पूरी ताकत लगा रखे है। दैनिक भास्कर द्वारा कराए गए सर्वे में स्पष्ट हुआ है कि गुजरात में जाति कोई मुद्दा नहीं है और 62 प्रतिशत पाटीदार को भारतीय जनता पार्टी के साथ है।
दैनिक भास्कर ने किया सर्वे
गुजरात चुनाव से पहले दैनिक भास्कर और दिव्य भास्कर ने गुजरात में बड़ा सर्वे किया है. अखबार का दावा है एक से दस नवंबर के बीच पचासी हजार से ज्यादा लोगों का सैंपल सर्वे एकत्र किया गया. सर्वे के लिए वेबसाइट, मिस्ड कॉल के अलावा मतदाताओं से संपर्क भी किया गया है.
नोटबंदी-जीएसटी भी बेअसर
गुजरात चुनाव में जातिवाद के अलावा नोटबंदी और जीएसटी को भी दैनिक भास्कर के सर्वे में बेअसर बताया गया है. सर्वे की माने तो नोटबंदी और जीएसटी सरीखे मुद्दों का असर मात्र 34% मतदाताओं द्वारा बताया गया है. 40% मतदाताओं का मानना है कि इन मुद्दों का कोई असर नहीं पड़ेगा. यही स्थिति गुजरात चुनाव में जातीय आधार पर हो रही गोलबंदी की भी बताई गई है. पाटीदारों के अलावा पिछड़ों और दलितों के ध्रुवीकरण की बात कही जा रही है. सर्वे में 62 फ़ीसदी लोगों ने माना कि वे पार्टी देखकर वोट करेंगे और महज 3% मतदाताओं का मानना था कि उम्मीदवारों की जाति देख कर वोट करेंगे.
हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश भी बेअसर
दैनिक भास्कर और दिव्य भास्कर द्वारा कराए गए सर्वे में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर और दलित नेता जिग्नेश मेवानी को भी असरहीन बताया गया है. सर्वे में शामिल लोगों में 65 फ़ीसदी ने माना कि इन तीनों नेताओं का कोई असर नहीं पड़ेगा. हालांकि जातिवाद को एक मुद्दा बताया गया है लेकिन अधिकांश लोगों ने पार्टी के आधार पर वोट करने की बात कही है.
पाटीदार भी भाजपा के पक्ष में
सर्वे में 62 फ़ीसदी पाटीदारों को भारतीय जनता पार्टी के साथ बताया गया है और 62 फ़ीसदी पाटीदार भाजपा को एक मौका देने के पक्ष में है. सर्वे में विजय रूपाणी सरकार को 11% लोगों ने दसमें आठ अंक दिया है तो 31% लोगों ने 10 में 10 अंक दिए हैं.
राहुल का सॉफ्ट हिंदुत्व भी बेअसर
सर्वे में राहुल गांधी का सॉफ्ट हिंदुत्व और मंदिर दर्शन भी बेअसर दिख रहा है. सर्वे में शामिल लोगों से पूछा गया था कि राहुल गांधी के मंदिर में जाने से कांग्रेस की क्या स्थिति होगी तो 55 फ़ीसदी लोगों का मानना था कि कांग्रेस की स्थिति में मंदिर दर्शन का कोई फर्क नहीं पड़ेगा.
विकास पागल हो गया है पर भारी मैं विकास हूं
गुजरात में कराए गए दैनिक भास्कर के सर्वे में जनता का मूड भांपने के लिए विकास के मुद्दे पर लोगों का नजरिया पूछा गया। काँग्रेस के नारे विकास पागल हो गया है पर भारतीय जनता पार्टी मैं विकास हूं का नारा भारी है. सर्वे में बताया गया है कि 62% लोग मैं विकास हूं के नारे के साथ हैं और इनका मानना है कि गुजरात चुनाव में मैं विकास हूं का नारा ही आगे रहेगा. 27% लोगों ने विकास पागल हो गया है नारे के मैदान मारने की बात कही है।
अब जनता में एक जागृति आयी हुई, जिसे कांग्रेस और इसके समर्थक लेशमात्र भी समझने में असमर्थ हैं कि आरक्षण को समस्त पार्टियाँ अपने वोट बैंक में इस्तेमाल कर रही हैं। एक समय था जब मुस्लिम वोट बैंक सियासत होती थी,लेकिन आज होती है आरक्षण की। अगर कांग्रेस और इसके समर्थक दलों ने इस नीति को नहीं त्यागा, वह दिन दूर नहीं जब कायस्थ, वैश्य और ब्राह्मण समाज भी आंदोलन की तैयारी में है : "हमें भी आरक्षण दो या आरक्षण समाप्त करो", उस स्थिति में जाति की राजनीति खेलने वाले कहाँ जाएँगे? हालाँकि बीच-बीच में इन समाजों की तरफ से यह माँग भी उठती रहती है कि "वोट उस पार्टी को दें जो आरक्षण को समाप्त करे।" उत्तर प्रदेश में गठित राष्ट्रव्यापी जनता पार्टी इस ओर उठा कदम है। जिस आरक्षण को डॉ आंबेडकर ने केवल 10 वर्ष के लिए माँगा था, उसी का दुरूपयोग होता देख अपने ही जीवन तत्काल प्रभाव से समाप्त करने को भी कहा, परन्तु वोट के भूखे नेताओं ने इसे आज तक अपनाए हुए हैं, क्यों? जाति के नाम पर कितनी पार्टियाँ बन गयीं, लेकिन समस्या वहीँ की वहीँ है, जो 7 दशक पूर्व थी, इस स्थिति में इन राजनीतिक पार्टियों के क्या औचित्य है? क्यों जनता इन्हे वोट देती हैं? पाटीदार आरक्षण आज गुजरात में उठी है, कल पूरे भारत में भी उठ सकती है, इसलिए गैर-पाटीदार केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि समस्त भारत में आरक्षण समर्थक समस्त पार्टियों को वोट न देकर एक नए भारत के निर्माण करें।
अब जनता में एक जागृति आयी हुई, जिसे कांग्रेस और इसके समर्थक लेशमात्र भी समझने में असमर्थ हैं कि आरक्षण को समस्त पार्टियाँ अपने वोट बैंक में इस्तेमाल कर रही हैं। एक समय था जब मुस्लिम वोट बैंक सियासत होती थी,लेकिन आज होती है आरक्षण की। अगर कांग्रेस और इसके समर्थक दलों ने इस नीति को नहीं त्यागा, वह दिन दूर नहीं जब कायस्थ, वैश्य और ब्राह्मण समाज भी आंदोलन की तैयारी में है : "हमें भी आरक्षण दो या आरक्षण समाप्त करो", उस स्थिति में जाति की राजनीति खेलने वाले कहाँ जाएँगे? हालाँकि बीच-बीच में इन समाजों की तरफ से यह माँग भी उठती रहती है कि "वोट उस पार्टी को दें जो आरक्षण को समाप्त करे।" उत्तर प्रदेश में गठित राष्ट्रव्यापी जनता पार्टी इस ओर उठा कदम है। जिस आरक्षण को डॉ आंबेडकर ने केवल 10 वर्ष के लिए माँगा था, उसी का दुरूपयोग होता देख अपने ही जीवन तत्काल प्रभाव से समाप्त करने को भी कहा, परन्तु वोट के भूखे नेताओं ने इसे आज तक अपनाए हुए हैं, क्यों? जाति के नाम पर कितनी पार्टियाँ बन गयीं, लेकिन समस्या वहीँ की वहीँ है, जो 7 दशक पूर्व थी, इस स्थिति में इन राजनीतिक पार्टियों के क्या औचित्य है? क्यों जनता इन्हे वोट देती हैं? पाटीदार आरक्षण आज गुजरात में उठी है, कल पूरे भारत में भी उठ सकती है, इसलिए गैर-पाटीदार केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि समस्त भारत में आरक्षण समर्थक समस्त पार्टियों को वोट न देकर एक नए भारत के निर्माण करें।
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