8 नवंबर 2016 को अचानक लागू हुई नोटबंदी ने देशभर में तूफान ला दिया था। करप्शन और ब्लैकमनी खत्म करने के अहम मकसद से लागू की गई नोटबंदी की सफलता पर अब भी बहस हो रही है।
नोटबंदी वास्तव में लूटबंदी साबित हुई है,कांग्रेस व अन्य लुटेरे जो आज गला फाड़ फाड़ कर चीख रहे हैं कि नोटबंदी से कुछ हासिल नहीं हुआ दरअसल उन्हें भी पता है कि नोटबंदी से सबसे अहम यदि कुछ हासिल हुआ है तो वो ये कि लुटेरों के मन में ये खौफ घर कर गया है कि आज भारत में वो सरकार है जो कभी भी उनके कालेधन को कचरा बनाने के लिये कुछ भी कठोर कदम उठा सकती है और इतना ही नहीं बल्कि देश की जनता भी तमाम कष्ट सहने के बावजूद नोटबंदी का समर्थन करके दर्शा चुकी है कि आगे भी ऐसे देशहित के किसी भी निर्णय में हम सरकार का पूरा-पूरा साथ देंगे,शायद इसीलिए जनता को बरगलाने के लिये ये काले मन और धन वाले कल काला दिवस मना रहे हैं लेकिन ये लोग कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे,क्योंकि देश के लोग अब जागरुक हो चुके हैं,उन्हें पता चल चुका है कि काले दिन तो उसी दिन खत्म हो गये थे जब मोदीजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी,अब तो अच्छे दिनों वाला युग चल रहा है,वास्तव में अंधेर नगरी वाले काले दिन तो वो थे जब नाक के नीचे ही संगठित लूट होते हुए देखकर भी देश के एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री बोलते थे कि "मैन्नू कुछ नहीं पता"।आपको कुछ पता हो या नहीं मनमोहन जी लेकिन हमें जरूर पता है कि आज जो प्रधानमंत्री देश में है वो कभी कोई काला काम नहीं करेगा,ना खाएगा ना खाने देगा और ना डरेगा ना झुकेगा।आज पूरा देश संगठित होकर मोदीजी के साथ खड़ा है, भगवान मोदीजी को बुरी नजर से बचाएं।
सरकार का दावा है कि वह नोटबंदी के अपने मकसद में सफल रही। फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली ने खुद यह दावा कि नोटबंदी से इकोनॉमी फॉर्मल हुई है। देश कैशलेस इकोनॉमी की ओर तेजी से बढ़ा है और सिस्टम में ब्लैकमनी का फ्लो घटा है। वहीं, विपक्ष का दावा है कि नोटबंदी सबसे बड़ा घोटाला है और यह ब्लैकमनी को व्हाइट करने की बड़ी स्कीम साबित हुई।
1. ब्लैकमनी
सरकार ने नोटबंदी से सिस्टम में रहे कुल कैश का लगभग 86% बैन कर दिया था। सरकार का दावा था कि इस कैश में बड़ी मात्रा ब्लैकमनी की है। इसलिए सरकार ये उम्मीद कर रही थी कि इस कैश का काफी बड़ा हिस्सा सिस्टम में वापस नहीं आएगा और बेकार हो जाएगा। रिजर्व बैंक ने बताया कि नोटबंदी से पहले (8 नवंबर 2016) देश में 500-1000 के पुराने नोटों के तौर पर 15.44 लाख करोड़ रुपए के नोट चल रहे थे, जिसमें से 15.28 लाख करोड़ रुपए के पुराने नोटों के तौर पर 15.44 लाख करोड़ रुपए के नोट चल रहे थे, जिसमें से 15.28 लाख करोड़ रुपए के पुराने नोट (30 जून 2017 तक) वापस आ गए हैं। इस तरह करीब 99 फीसदी स्क्रैप करंसी सिस्टम में वापस आ गई। इस तरह, ब्लैकमनी कितनी खत्म हुई यह आंकड़ों से साफ है।
सरकार का दावा
फाइनेंस मिनिस्ट अरुण जेटली का कहना है कि नोटबंदी से हम देश को फॉर्मल इकोनॉमी और लेस कैश की तरफ ले जाने में कामयाब हुई। इससे ब्लैकमनी का फ्लो कम हुआ। री मोनेटाइजेशन भी कुछ महीनों में कर दिया। इस साल अप्रैल से सितंबर के दौरान पिछले साल के इसी समय की तुलना में सिस्टम में आ गया है, इसका मतलब हुआ कि अब सभी पैसों की डिटैल सिस्टम में मौजूद है।
सीनियर इकोनॉमिस्ट एवं ब्लैक इकोनॉमी एक्सपर्ट अरुण कुमार ने moneybhaskar.com को बताया कि भारत की ब्लैक इकोनॉमी लगभग 300 से 400 लाख करोड़ रुपए की है। इसका एक फीसदी हिस्सा कैश है। यानी कि लगभग 3 से 4 लाख करोड़ रुपए और नोटबंदी के कारण केवल 1 फीसदी ब्लैक मनी खत्म हुई और 99 फीसदी जमा हो गई। इसका मतलब है कि नोटबंदी से ब्लैक इकोनॉमी में मात्र 0.1 फीसदी ही कमी आई। इकोनॉमिस्ट पीएच पई पनंदिकर ने moneybhaskar.com को बताया कि नोटबंदी के बाद यह कहा गया था कि देश में ब्लैक मनी खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अनुमान था कि 2 लाख करोड़ रुपए ब्लैक मनी वापस आएगी, लेकिन केवल कुछ हजार करोड़ रुपए ही वापस आए। बल्कि पुराने नोट भी 99 फीसदी वापस आ गया। इसका सीधा सा मतलब है कि ब्लैक मनी पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
2. करप्शन
फाइनेंस मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, नोटबंदी से 1.6 से लेकर 1.7 लाख करोड़ रुपए के संदिग्ध ट्रांजैक्शन का पता चला है। टैक्स अफसर इसकी जांच कर रहे हैं। इसके अलावा, कैश सीज करने कार्रवाई भी बड़े पैमाने पर की गई है। अघोषित आय की बात करें तो अभी तक 29213 करोड़ रुपए की अघोषित आय का पता लगाया गया है। दूसरी ओर, सरकार ने इस दौरान शेल कंपनियों पर बड़ी कार्रवाई की है। सरकार ने 2.97 लाख शेल कंपनियों को नोटिस दिया और बाद में 2.24 पर कार्रवाई कर डी-रजिस्टर्ड कर दिया।
नोटबंदी वास्तव में लूटबंदी साबित हुई है,कांग्रेस व अन्य लुटेरे जो आज गला फाड़ फाड़ कर चीख रहे हैं कि नोटबंदी से कुछ हासिल नहीं हुआ दरअसल उन्हें भी पता है कि नोटबंदी से सबसे अहम यदि कुछ हासिल हुआ है तो वो ये कि लुटेरों के मन में ये खौफ घर कर गया है कि आज भारत में वो सरकार है जो कभी भी उनके कालेधन को कचरा बनाने के लिये कुछ भी कठोर कदम उठा सकती है और इतना ही नहीं बल्कि देश की जनता भी तमाम कष्ट सहने के बावजूद नोटबंदी का समर्थन करके दर्शा चुकी है कि आगे भी ऐसे देशहित के किसी भी निर्णय में हम सरकार का पूरा-पूरा साथ देंगे,शायद इसीलिए जनता को बरगलाने के लिये ये काले मन और धन वाले कल काला दिवस मना रहे हैं लेकिन ये लोग कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे,क्योंकि देश के लोग अब जागरुक हो चुके हैं,उन्हें पता चल चुका है कि काले दिन तो उसी दिन खत्म हो गये थे जब मोदीजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी,अब तो अच्छे दिनों वाला युग चल रहा है,वास्तव में अंधेर नगरी वाले काले दिन तो वो थे जब नाक के नीचे ही संगठित लूट होते हुए देखकर भी देश के एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री बोलते थे कि "मैन्नू कुछ नहीं पता"।आपको कुछ पता हो या नहीं मनमोहन जी लेकिन हमें जरूर पता है कि आज जो प्रधानमंत्री देश में है वो कभी कोई काला काम नहीं करेगा,ना खाएगा ना खाने देगा और ना डरेगा ना झुकेगा।आज पूरा देश संगठित होकर मोदीजी के साथ खड़ा है, भगवान मोदीजी को बुरी नजर से बचाएं।
सरकार का दावा है कि वह नोटबंदी के अपने मकसद में सफल रही। फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली ने खुद यह दावा कि नोटबंदी से इकोनॉमी फॉर्मल हुई है। देश कैशलेस इकोनॉमी की ओर तेजी से बढ़ा है और सिस्टम में ब्लैकमनी का फ्लो घटा है। वहीं, विपक्ष का दावा है कि नोटबंदी सबसे बड़ा घोटाला है और यह ब्लैकमनी को व्हाइट करने की बड़ी स्कीम साबित हुई।
1. ब्लैकमनी
सरकार ने नोटबंदी से सिस्टम में रहे कुल कैश का लगभग 86% बैन कर दिया था। सरकार का दावा था कि इस कैश में बड़ी मात्रा ब्लैकमनी की है। इसलिए सरकार ये उम्मीद कर रही थी कि इस कैश का काफी बड़ा हिस्सा सिस्टम में वापस नहीं आएगा और बेकार हो जाएगा। रिजर्व बैंक ने बताया कि नोटबंदी से पहले (8 नवंबर 2016) देश में 500-1000 के पुराने नोटों के तौर पर 15.44 लाख करोड़ रुपए के नोट चल रहे थे, जिसमें से 15.28 लाख करोड़ रुपए के पुराने नोटों के तौर पर 15.44 लाख करोड़ रुपए के नोट चल रहे थे, जिसमें से 15.28 लाख करोड़ रुपए के पुराने नोट (30 जून 2017 तक) वापस आ गए हैं। इस तरह करीब 99 फीसदी स्क्रैप करंसी सिस्टम में वापस आ गई। इस तरह, ब्लैकमनी कितनी खत्म हुई यह आंकड़ों से साफ है।
सरकार का दावा
फाइनेंस मिनिस्ट अरुण जेटली का कहना है कि नोटबंदी से हम देश को फॉर्मल इकोनॉमी और लेस कैश की तरफ ले जाने में कामयाब हुई। इससे ब्लैकमनी का फ्लो कम हुआ। री मोनेटाइजेशन भी कुछ महीनों में कर दिया। इस साल अप्रैल से सितंबर के दौरान पिछले साल के इसी समय की तुलना में सिस्टम में आ गया है, इसका मतलब हुआ कि अब सभी पैसों की डिटैल सिस्टम में मौजूद है।
सीनियर इकोनॉमिस्ट एवं ब्लैक इकोनॉमी एक्सपर्ट अरुण कुमार ने moneybhaskar.com को बताया कि भारत की ब्लैक इकोनॉमी लगभग 300 से 400 लाख करोड़ रुपए की है। इसका एक फीसदी हिस्सा कैश है। यानी कि लगभग 3 से 4 लाख करोड़ रुपए और नोटबंदी के कारण केवल 1 फीसदी ब्लैक मनी खत्म हुई और 99 फीसदी जमा हो गई। इसका मतलब है कि नोटबंदी से ब्लैक इकोनॉमी में मात्र 0.1 फीसदी ही कमी आई। इकोनॉमिस्ट पीएच पई पनंदिकर ने moneybhaskar.com को बताया कि नोटबंदी के बाद यह कहा गया था कि देश में ब्लैक मनी खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अनुमान था कि 2 लाख करोड़ रुपए ब्लैक मनी वापस आएगी, लेकिन केवल कुछ हजार करोड़ रुपए ही वापस आए। बल्कि पुराने नोट भी 99 फीसदी वापस आ गया। इसका सीधा सा मतलब है कि ब्लैक मनी पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
2. करप्शन
फाइनेंस मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, नोटबंदी से 1.6 से लेकर 1.7 लाख करोड़ रुपए के संदिग्ध ट्रांजैक्शन का पता चला है। टैक्स अफसर इसकी जांच कर रहे हैं। इसके अलावा, कैश सीज करने कार्रवाई भी बड़े पैमाने पर की गई है। अघोषित आय की बात करें तो अभी तक 29213 करोड़ रुपए की अघोषित आय का पता लगाया गया है। दूसरी ओर, सरकार ने इस दौरान शेल कंपनियों पर बड़ी कार्रवाई की है। सरकार ने 2.97 लाख शेल कंपनियों को नोटिस दिया और बाद में 2.24 पर कार्रवाई कर डी-रजिस्टर्ड कर दिया।
करप्शन में हवाला करोबार का भी एक बड़ा रोल है। moneybhaskar.com को अलग-अलग सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, नोटबंदी की मार हवाला कारोबार पर पड़ी और बिजनेस करीब 30 फीसदी तक घटा। हालांकि, सूत्रों ने बताया कि नोटबंदी के बाद हवाला कारोबारियों ने बिजनेस का तरीका बदल दिया है और वे भी डिलिटल तरीके अपना रहे हैं।
सरकार का दावा
फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली ने मंगलवार को ब्लॉग लिखा कि नोटबंदी से करप्शन पर लगाम लगाने में सरकार कामयाब रही है। लेनदेन फॉर्मल हुआ है। अगस्त 2017 तक 56 लाख और व्यक्तिगत आयकरदाताओं ने रिटर्न फाइल किया है, जबकि पिछले साल यह बढ़ोत्तरी 22 लाख की थी।
इकोनॉमिस्ट और पूर्व CSO प्रणब सेन ने moneybhaskar.com को बताया कि नोटबंदी के एक साल बाद टैक्सेशन बढ़ गया, इसका पता अभी नहीं चल पाया है। यहां तक कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को भी इसका नहीं पता। इनकम टैक्स को यह जरूर पता करना चाहिए कि नोटबंदी के बाद टैक्स देने वालों की संख्या बढ़ी है या नहीं। अगर लोग अब भी टैक्स नहीं भर रहे हैं तो इसका मतलब है कि करप्शन कम करने में नोटबंदी से कोई खास फायदा नहीं मिलने वाला।
3. टेरर फंडिंग
कश्मीर में हिंसा के लिए आतंकी संगठनों को हवाला के जरिए फंडिंग का शक होने के बाद नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) द्वारा हुर्रियत, अलगाववादी नेताओं और उनके रिश्तेदारों पर जांच का शिंकजा कसा गया। इस मामले में केस भी दर्ज किेए गए। शुरू हुई जांच में हुर्रियत नेताओं और कश्मीर के कई बड़े कारोबारियों के ठिकानों पर छापेमारी की गई थी। इस मामले की जांच के दौरान अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के दामाद समेत कई अन्य लोगों को भी पूर्व में गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके अलावा, एनआईए ने पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जमात-उद-दावा और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा नेता हाफिज सईद को भी बतौर आरोपी नामजद किया है। बता दें, 1990 के दशक की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के फलने-फूलने के बाद से यह पहली बार है कि केंद्रीय जांच एजेंसी ने आतंकवादी और अलगाववादी संगठनों की फंडिंग को लेकर सख्त एक्शन किया है। नोटबंदी के एक साल पूरे होने के ठीक एक दिन पहले यानी 7 नवंबर 2017 को एनआईए ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। इसमें एनआईए ने करीब 36.34 करोड़ रुपए की डिनोटिफाइड करंसी भी बरामद की है।
जबकि दूसरा पक्ष कुछ और कहानी बता रहा है। नोटबंदी के एक साल पूरा होने की पूर्व संध्या पर नवम्बर 7 को जारी किए गए एक देशव्यापी सर्वेक्षण में 63 फीसदी प्रतिभागियों ने सरकार द्वारा पिछले साल 8 नवंबर को एकाएक की गई नोटबंदी के कारण ‘गंभीर परेशानियां’ उठाने की बात कही, जबकि 65 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने नोटबंदी के कारण शादियां स्थगित होते देखीं। ‘अनहद’ समेत 32 अन्य नागरिक संगठनों द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में उन लोगों के नाम भी शामिल हैं, जो बैंकों की कतार में व नोटबंदी से जुड़े अन्य कारणों से मारे गए। इस सर्वेक्षण में ज्यादातर प्रतिभागियों (55 फीसदी बनाम 26.6 फीसदी) ने इस बात से असहमति जताई कि इस कदम से काला धन हमेशा के लिए मिट सकता है। इसके साथ ही 48.2 फीसदी लोगों ने इस पर भरोसा नहीं किया कि नोटबंदी के कारण आंतकवादियों के वित्त पोषण में किसी प्रकार की कमी आई है। 20 फीसदी लोगों का यह मानना था कि इस कदम से आम आदमी को फायदा होगा। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में 71.8 फीसदी प्रतिभागियों ने कहा कि उन्होंने लोगों को नोटबंदी के कारण ‘भारी परेशानी’ का सामना करते देखा। यहां तक कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को इलाज नहीं मिल रहा था, क्योंकि वे ‘नोटबंदी’ के बाद नई मुद्रा में भुगतान करने में असमर्थ थे।
सर्वेक्षण में शामिल 50 फीसदी लोगों ने कहा कि उनके जानने वालों में से किसी ना किसी की नौकरी नोटबंदी की वजह से चली गई। 65 फीसदी प्रतिभागियों का कहना था कि उन्होंने किसी नेता या अमीर आदमी को किसी बैंक की लाइन में या एटीएम की लाइन में खड़े नहीं देखा। उनका कहना था कि उन्हें ऐसा नहीं लगा कि नोटबंदी के कारण अमीरों को कोई परेशानी हुई हो। सर्वेक्षण में 96 प्रश्न शामिल किए गए थे और यह 2016 के दिसंबर से 2017 के जनवरी के बीच 21 प्रमुख राज्यों में किया गया, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
सर्वेक्षण के इन नतीजों को सामाजिक कार्यकर्ता जॉन दयाल, गौहर रजा, पी.वी.एस. कुमार और सुबोध मोहंते ने नोटबंदी के एक वर्ष पूरे होने के मौके पर जारी किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा की थी। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक और इस रिपोर्ट के लेखकों में से एक गौहर रजा ने कहा, “इन आंकड़ों को 2016 के दिसंबर और 2017 के जनवरी के बीच संग्रहित किया गया था, जब लोगों की भावनाएं नियंत्रित मीडिया चैनलों द्वारा की जा रही चारों तरफ की बमबारी से अत्यधिक प्रभावित थीं।”
इतना ही नहीं, जनता यह भी जानना चाहती है कि क्या नेताओं के नोट सदन में ही बदले गए? दूसरे, आधार कार्ड पर नोट बदली में घरों/दुकानों पर काम करने वाले/वालियों ने 8000 से 10000 रूपये कमीशन कमाई, क्या इनके आधार कार्डों की जाँच की गयी? और इस तरह काले धन को सफ़ेद किया गया था। इन कमीशनखोरों के कारण ही आम जनता को ज्यादा कठिनाई हुई थी। जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है, आम जनता को इसमें कोई राहत नहीं मिली। पार्टी के कार्यकर्ताओं का पहले भी काम होता था, आज भी हो रहा है,लेकिन आम जनता के लिए तो न सावन हरे न भादों सूखे।
बहुत शोर सुन रहे थे, कि चुनाव जीतने/हारने पर नेताओं के खजाने तेजी से बढ़ते हैं, कोई नेता लपेटे नहीं आया। जिन नेताओं पर पिछली सरकारों के समय से घोटाले केस चल रहे हैं, पहले भी मौज कर रहे थे और आज भी। विदेशों में जमा काला धन लाने में माना कुछ अड़चने हो सकती हैं, लेकिन भारत में ही जो काला धन है, कितने नेता लपेटे में आए।
जबकि दूसरा पक्ष कुछ और कहानी बता रहा है। नोटबंदी के एक साल पूरा होने की पूर्व संध्या पर नवम्बर 7 को जारी किए गए एक देशव्यापी सर्वेक्षण में 63 फीसदी प्रतिभागियों ने सरकार द्वारा पिछले साल 8 नवंबर को एकाएक की गई नोटबंदी के कारण ‘गंभीर परेशानियां’ उठाने की बात कही, जबकि 65 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने नोटबंदी के कारण शादियां स्थगित होते देखीं। ‘अनहद’ समेत 32 अन्य नागरिक संगठनों द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में उन लोगों के नाम भी शामिल हैं, जो बैंकों की कतार में व नोटबंदी से जुड़े अन्य कारणों से मारे गए। इस सर्वेक्षण में ज्यादातर प्रतिभागियों (55 फीसदी बनाम 26.6 फीसदी) ने इस बात से असहमति जताई कि इस कदम से काला धन हमेशा के लिए मिट सकता है। इसके साथ ही 48.2 फीसदी लोगों ने इस पर भरोसा नहीं किया कि नोटबंदी के कारण आंतकवादियों के वित्त पोषण में किसी प्रकार की कमी आई है। 20 फीसदी लोगों का यह मानना था कि इस कदम से आम आदमी को फायदा होगा। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में 71.8 फीसदी प्रतिभागियों ने कहा कि उन्होंने लोगों को नोटबंदी के कारण ‘भारी परेशानी’ का सामना करते देखा। यहां तक कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को इलाज नहीं मिल रहा था, क्योंकि वे ‘नोटबंदी’ के बाद नई मुद्रा में भुगतान करने में असमर्थ थे।
सर्वेक्षण में शामिल 50 फीसदी लोगों ने कहा कि उनके जानने वालों में से किसी ना किसी की नौकरी नोटबंदी की वजह से चली गई। 65 फीसदी प्रतिभागियों का कहना था कि उन्होंने किसी नेता या अमीर आदमी को किसी बैंक की लाइन में या एटीएम की लाइन में खड़े नहीं देखा। उनका कहना था कि उन्हें ऐसा नहीं लगा कि नोटबंदी के कारण अमीरों को कोई परेशानी हुई हो। सर्वेक्षण में 96 प्रश्न शामिल किए गए थे और यह 2016 के दिसंबर से 2017 के जनवरी के बीच 21 प्रमुख राज्यों में किया गया, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
सर्वेक्षण के इन नतीजों को सामाजिक कार्यकर्ता जॉन दयाल, गौहर रजा, पी.वी.एस. कुमार और सुबोध मोहंते ने नोटबंदी के एक वर्ष पूरे होने के मौके पर जारी किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा की थी। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक और इस रिपोर्ट के लेखकों में से एक गौहर रजा ने कहा, “इन आंकड़ों को 2016 के दिसंबर और 2017 के जनवरी के बीच संग्रहित किया गया था, जब लोगों की भावनाएं नियंत्रित मीडिया चैनलों द्वारा की जा रही चारों तरफ की बमबारी से अत्यधिक प्रभावित थीं।”
इतना ही नहीं, जनता यह भी जानना चाहती है कि क्या नेताओं के नोट सदन में ही बदले गए? दूसरे, आधार कार्ड पर नोट बदली में घरों/दुकानों पर काम करने वाले/वालियों ने 8000 से 10000 रूपये कमीशन कमाई, क्या इनके आधार कार्डों की जाँच की गयी? और इस तरह काले धन को सफ़ेद किया गया था। इन कमीशनखोरों के कारण ही आम जनता को ज्यादा कठिनाई हुई थी। जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है, आम जनता को इसमें कोई राहत नहीं मिली। पार्टी के कार्यकर्ताओं का पहले भी काम होता था, आज भी हो रहा है,लेकिन आम जनता के लिए तो न सावन हरे न भादों सूखे।
बहुत शोर सुन रहे थे, कि चुनाव जीतने/हारने पर नेताओं के खजाने तेजी से बढ़ते हैं, कोई नेता लपेटे नहीं आया। जिन नेताओं पर पिछली सरकारों के समय से घोटाले केस चल रहे हैं, पहले भी मौज कर रहे थे और आज भी। विदेशों में जमा काला धन लाने में माना कुछ अड़चने हो सकती हैं, लेकिन भारत में ही जो काला धन है, कितने नेता लपेटे में आए।
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