आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
असम भाजपा सरकार एक के बाद एक ताबड़तोड़ फैसलों को कानून में बदलती जा रही है, जिससे पूरी देश की नज़रें अब असम पर टिक गयी हैं। अब असम में भाजपा ने एक और शानदार कानून बना दिया है जिसे इतिहास का सबसे सुंदर कानून बताया जा रहा है।पिछली सरकारों में केवल दंगों में सुलगता रहा असम, लेकिन इस बार जनसँख्या पर लगाम लगाने वाले इस कानून की प्रशंसा तो दिल्ली तक हो रही है। अभी हाल ही में असम विधानसभा में विधेयक पास किया गया था कि कोई भी सरकारी कर्मचारी अपने माता-पिता या दिव्यांग भाई-बहनों की देखभाल नहीं करता है तो उसके मासिक वेतन से 10 फीसदी रकम काट कर पीड़ित को दे दी जाएगी।
हम दो हमारे दो
सबसे पहले ये उन लोगों पर लगाम है जो घर में बच्चों की क्रिकेट टीम खोल लेते है। आम जनता छोड़िये यहाँ तो कई नेताओं ने अपनी निजी बच्चों की फ़ौज बना ली है। ये विधेयक शुक्रवार 15 सितम्बर को असम भाजपा सरकार की नई जनसंख्या नीति के तहत लाया गया, जिसे असम विधानसभा में लंबी बहस के बाद इस कानून को पारित किया गया है। इस फैसले का कानून बनते ही जैसे सोशल मीडिया पर लोगों ने तारीफ की झड़ी सी लग गयी है। अभी मिल रही ताज़ा खबर के अनुसार अब भाजपा सरकार ने एक और कानून पारित कर दिया है जिसके मुताबिक जिनके भी दो से अधिक बच्चे हैं, वे स्थानीय निकाय चुनाव (नगर पालिका व क्षेत्र पंचायत) लड़ने और सरकारी नौकरी पाने के लिए मान्य नहीं होंगे साथ ही किसी भी सरकारी लाभ और सुविधाओं से वंचित होना पड़ेगा।
असम सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने इस कानून के बारे में बताया कि राज्य की नई जनसंख्या नीति जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाने को ध्यान में रखकर बनाई गई है। असम में सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली सरकारी है। यहां बीजेपी पहली बार सत्ता में आई है। इसके साथ ही लोगों के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जा सकेगा।
इसके साथ ही बड़ी खबर यह भी मिल रही है कि आम भाजपा सरकार अब केंद्र में मोदी सरकार से भी मांग करेगी कि विधान सभा चुनाव लड़ने के लिए भी ऐसा कानून बनाया जाए। असम सरकार द्वारा पास किए गए इस कानून में राज्य की जनसंख्या में 17.7 फीसदी की दर से हो रही वृद्धि को विकास की दिशा में एक गतिरोध बताया गया है। जिसके भी दो बच्चों से ज्यादा होंगे वह विधायक का चुनाव नहीं लड़ सके। गौरतलब है कि कुछ लोगों ने महिलाओं को बच्चे पैदा करने कि फैक्ट्री समझ लिया है। जिसका सबूत साल 2001 की जनसंख्या के अनुसार असम राज्य की जनसंख्या 2.66 करोड़ थी जो कि 2011 की जनगणना के दौरान बढ़कर 3.12 करोड़ दर्ज की गई है।
संजय गाँधी की तरह इस योजना का दुरूपयोग नहीं हो
संजय गाँधी ने इमरजेंसी के दौरान बढ़ती जनसँख्या को नियंत्रित करने परिवार नियोजन योजना लागू की थी, लेकिन कानून नहीं बनाया था। क्योकि उस समय संजय गाँधी के शब्द ही कानून मान लागू हो रहे थे, तत्कालीन प्रधानमन्त्री माँ इन्दिरा गाँधी भी संजय गाँधी के सामने असहाय थीं। लेकिन 1977 में हुए चुनावों में "नसबन्दी के तीन दलाल, इन्दिरा, संजय बंसी लाल" विपक्ष का यह नारा खूब रंग लाया था। वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति के लिए कम से कम दो नसबन्दी केस देने जरुरी थे। यदि इस योजना का यूथ कांग्रेस द्वारा दुरूपयोग नहीं किया जाता, यह योजना सार्थक सिद्ध होती। कानून बनाने की बजाए जबरदस्ती हॉस्पिटल में बच्चा होते ही महिला(जज्जा) का ऑपरेशन कर देना, मर्दों की नसबंदी कर देना आदि के कारण यह योजना बदनाम हुई। नसबन्दी करवाने वाले पुरुष या महिला द्वारा ऑपरेशन करवाए जाने पर 50 रूपए या 5 किलो घी का डिब्बा दिया जाने का नियम था, लेकिन यूथ कांग्रेस ने इस नियम का दुरूपयोग करते, केवल 10 रूपए ही देकर अपनी जेबें भरते रहे और बदनाम संजय गाँधी यानि इन्दिरा सरकार हो गयी। रिक्शा वालों, झल्ली ढोने वालों और भिखारियों तक की उस दौरान नसबन्दी कर दी गयी थी। हालत यह हो गयी थी कि कोई रिक्शावाला किसी मरीज को हॉस्पिटल के अंदर तक ले जाने से मना कर देते थे।
बस असम सरकार को इस बात पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है। अन्यथा संजय-इन्दिरा गाँधी की तरह यह योजना यानि कानून बदनाम हो जाएगा। सरकार को इस बात पर सतर्कता बरतनी होगी कि जो भी भी इस कानून का दुरूपयोग करते पाया जाए,-- चाहे वह किसी भी पार्टी, समुदाय या धर्म से हो-- उस पर सख्त कार्यवाही का प्रावधान रखा जाए।
असम सरकार का यह कदम सफल होने पर सम्भव है, केन्द्र सरकार से पूर्व अन्य राज्यों की सरकारें इन कानून को लागू करने में संकोच नहीं करेंगी।
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