दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा और हनुमान जयंती जैसे हिंदू पर्वों पर बंदिशें लगाने के बाद पश्चिम बंगाल में इस साल से छठ मनाना भी आसान नहीं रहेगा। शुरुआत हुई है सिलिगुड़ी से जहां महानंदा नदी में छठ पूजा करने पर रोक लगा दी गई है। दार्जिलिंग की जिलाधिकारी ने नदी में छठ के लिए अस्थायी घाट बनवाने से भी इनकार कर दिया है और कहा है कि जो कोई भी यहां छट मनाते देखा गया उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बहुत दबाव के बाद नदी के किनारे से कुछ दूरी पर गड्ढे बनाकर उनमें छठ मनाने को कहा गया है। बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने ये आदेश नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश का हवाला देते हुए दिया है। जबकि बंगाल में ही पर्यावरण को लेकर एनजीटी के कई आदेशों पर अमल नहीं हो रहा है। लेकिन हिंदू पर्व होने के नाते छठ पर पाबंदी फौरन लगा दी गई।
फूल-पत्तों से प्रदूषण का खतरा!
एनजीटी ने एक अजीबोगरीब तर्क दिया है कि छठ के कारण नदी में प्रदूषण हो रहा है। जबकि छठ में ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे नदी प्रदूषित हो। भगवान सूर्य को अर्घ्य के रूप में नदी का ही पानी अर्पित किया जाता है उसमें थोड़े से फूल और पत्ते और चावल के दाने होते हैं। ये सब प्राकृतिक चीजे हैं जिन्हें नदी में पलने वाली मछलियां और दूसरे जीव खाते हैं। ये सारी चीजें सूप में रखकर चढ़ाई जाती हैं, यानी पॉलीथिन फेंके जाने की भी आशंका नहीं होती। इसके बावजूद बंगाल सरकार ने जिस फुर्ती के साथ छठ पर रोक लगाई उससे हर कोई हैरान है। स्थानीय लोगों की कई अपील के बावजूद राज्य सरकार इस मामले में पीछे हटने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं, लोगों की सुविधा के लिए बनने वाले एक अस्थायी पुल का काम भी रोक दिया गया है। लोगों को लग रहा है कि आने वाले दिनों में ये पाबंदी बंगाल की दूसरी नदियों पर भी लागू की जाएगी।
छठ पर पाबंदी से भारी नाराजगी
सिलीगुड़ी में बिहार, उत्तर प्रदेश से आए लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। ये लोग सालों से यहां महानंदा नदी के तट पर छठ पूजा करते आए है। छठ पूजा के मौके पर यहां छठ घाटों की आकर्षक सजावट की जाती है। यहां छठ के दो दिनों में 2 लाख लोगों की भीड़ उमड़ती है। प्रशासन के आदेश के बाद लोगों ने कहा कि आदिकाल से नदियों के तटों पर छठ पूजा करने की परंपरा रही है, और इस दौरान लोग नदियों और तालाब की स्वच्छता का भी ख्याल रखते हैं। अब छठ पूजा पर लगी इस पाबंदी से हर कोई हैरान है। स्थानीय लोगों ने पिछले दिनों इसके विरोध में दीया यात्रा भी निकाली थी। ज्यादातर लोग मान रहे हैं कि एनजीटी के आदेश की आड़ में ममता बनर्जी अपने हिंदू विरोधी एजेंडे में जुटी हैं। जिस तेजी से वो बंगाल के इस्लामीकरण में जुटी हैं उसमें दुर्गा पूजा और छठ को रोकना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
क्या बंगाल में ‘बगदादी की सरकार’ चला रही हैं ममता?
मुसलमानों के वोट पक्के रखने के लिए ममता बनर्जी लगता है बंगाल में इस्लामी कानून चलाने लगी हैं। यहां तारक बिस्वास नाम के एक ब्लॉगर को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार करके हवालात में ठूंस दिया गया, क्योंकि उसने सोशल मीडिया पर इस्लाम की आलोचना की थी। ममता की पार्टी तृणमूल के ही एक छुटभैये नेता सनाउल्ला खान ने तारक के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने आधी रात के बाद तारक बिस्वास को उनके घर से कुछ इस तरह से उठाया जैसे किसी खतरनाक आतंकवादी को गिरफ्तार किया जाता है।
अब कहां गई अभिव्यक्ति की आजादी?
जिस देश में हिंदू धर्म, इसकी परंपराओं और देवी-देवताओं का खुलेआम आम बात है, वहां इस्लाम के खिलाफ सोशल मीडिया पर 2-3 लाइनें भर लिख देने से ये कार्रवाई वाकई चौंकाने वाली है। तारक विश्वास पर बंगाल पुलिस ने सारी गैर-जमानती धाराएं लगाई थीं। लिहाजा कोर्ट ने उन्हें 7 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया। उन पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया गया है। बात-बात पर अभिव्यक्ति की आजादी के नारे लगाने वाले वामपंथी पत्रकार और नेता इस गिरफ्तारी पर चुप्पी साधे हुए हैं। इस तबके ने पिछले दिनों जेएनयू में जब देशद्रोही नारे लगाए गए थे तो इसी तबके ने इसे बोलने की आजादी करार दिया था और पूरे देश में इसे मामले पर कोहराम मचा दिया गया था। यहां तक कि कन्हैया और उमर खालिद जैसे गद्दारों के लिए कोहराम मचाने वाली मीडिया तारक बिस्वास की गिरफ्तारी की खबर को दबाने में जुटी है। कुछ अखबारों की वेबसाइट्स पर यह खबर जरूर आई है, लेकिन न्यूज चैनलों ने इसे बिल्कुल भी नहीं दिखाया।
जिहाद के रास्ते पर चल रही हैं ममता दीदी!
देश में जिन राज्यों में ISIS का जाल सबसे ज्यादा तेजी से फैल रहा है, बंगाल में उनमें से एक है। इसके पीछे कहीं न कहीं ममता बनर्जी की नीतियों को जिम्मेदार माना जाता है। राज्य विधानसभा चुनाव से पहले यहां कई जगहों पर इस्लामी कट्टरपंथियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद भी बरामद किए गए थे। इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की साइबर सेल के सर्वे में यह बात सामने आई है कि श्रीनगर, गुवाहाटी और पुणे के चिंचवाड़ के बाद कोलकाता से सटा हावड़ा देश का चौथा ऐसा शहर है जहां 16 से 30 साल के युवक आईएस की वेबसाइट में खासी दिलचस्पी ले रहे हैं। यहां नादिया और मुर्शिदाबाद जिलों में तो बाकायदा आईएसआईएस में भर्ती के लिए हजारों की तादाद में पोस्टर चिपकाए गए थे। इसके बावजूद ममता बनर्जी सरकार ने कभी भी इस्लामी कट्टरपंथियों पर लगाम कसने की कोशिश नहीं की।
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