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अरुण जेटली भारतीयों को करीब से गरीबी दिखाना चाहते हैं-- यशवन्त सिन्हा, पूर्व वित्त मन्त्री

एक व्यापारी ने सरकार की नीतियों से
परेशान होकर अपने बिल पर छपवा दिया
"कमल का फूल हमारी भूल"
मुजफ्फरनगर शहर के मुख्य बाजार एसडी मार्केट में दुकानदार छाती पीट-पीट कर मोदी सरकार, हाय-हाय के नारे लगा रहे थे। साड़ी के एक शो-रूम पर इनकम टैक्स के छापे से दुकानदार भड़क गये। नारेबाजी करने वाले दुकानदार भाजपा के कट्टर समर्थक हैं।इन दिनों शहर में आयकर के ताबड़तोड़ छापे पड़ रहे हैं। बैंक से करोड़ों रूपये कर्ज लेकर डेढ साल पहले बने एक निजी अस्पताल पर छापा पडा़। यह अस्पताल पूरी क्षमता से चल भी नहीं रहा है। प्रबंधकों को बैंक कर्ज की किश्त चुकाने में भी पसीने छूट रहे हैं। छापे के समय भी मात्र 15 मरीज भर्ती थे। बाकी बेड खाली पडे थे। इन हालात में आयकर छापे का औचित्य समझ से परे है। आयकर छापों को लोग "कोढ में खाज" जैसी स्थिति मान रहे हैं। एक ओर तो बाजार में सुस्ती के चलते दुकानदार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं तो दूसरी तरह छापों की तलवार ।
मोदी सरकार नोटबंदी का औचित्य सिद्ध नहीं कर पाई। नोटबंदी से लडखडाई बाजार अभी संभल भी नहीं पाई थी कि जीएसटी लागू हो गई। श्राद्ध पक्ष के बाद नवरात्रि से त्यौहारी सीजन के चलते बाजारों में जिस तरह की रौनक रहती थी, इस बार दिखाई नहीं दे रही है। जमीनों की खरीद-फरोख्त बंद है। कडे कायदे कानून में वित्तीय लेनदेन जटिल हुआ है। जिनकी क्रय क्षमता है वह भी पच्चीस -पचास हजार खर्च करने से डर रहे हैं। आयकर के निशाने पर आने की आशंका लोगों को बुरी तरह सता रही है।
अरुण जेटली जी का अर्थ ज्ञान लोगों पर भारी पड़ रहा है। मोदी सरकार को तत्काल ऐसे उपाय करने होंगे कि कारोबारियों में भय का माहौल समाप्त हो। निवेशक फिर से निवेश शुरू करें और ग्राहक बाजारों का सन्नाटा तोडे। मंदी के माहौल से बाजार को उबारे बिना लोग खुशहाल नहीं हो सकते।
जो भुगत रहा है वो सरकार को गाली दे रहा है और जिसने अब तक नही भुगता वो तारीफ कर रहा हैं लेकिन जब उसका नंबर आएगा भुगतने का तो वो भी गाली देने में देर नही लगाएगा जिस प्रकार ये कपडा व्यापारी लगा रहे है।
नोटबंदी व जी एस टी के बाद जी डी पी की गिरावट ने छोटे व मंछले व्यापारी की कमर तोड दी हैं , पढे लिखे नौजवानों के लिये नौकरी के अवसर भी समाप्त हो गए हैं अब इंस्पैक्टर राज आ गया हैं , रिश्वत खोरी भी उच्चतम स्तर पर हैं ।
दैनिक जनसत्ता में प्रकाशित पूर्व वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा ने भी जनता को हो रही परेशानियों को उजागर करते हुए लिखा है:पूर्व वित्‍त मंत्री यशवंत सिन्‍हा ने अपनी ही पार्टी के नेतृत्‍च वाली केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्‍ठ नेता ने हमारे सहयोगी अखबार ‘द इंडियन एक्‍सप्रेस’ में I need to speak up now (मुझे अब बोलना ही होगा) शीर्षक से लिखे संपादकीय में वित्‍त मंत्री अरुण जेटली को आड़े हाथों लिया है। सिन्‍हा ने लिखा है:
‘मैं अपने राष्‍ट्रीय कर्तव्य के पालन करने में असफल होऊंगा अगर मैंने अब वित्‍त मंत्री द्वारा अर्थव्यवस्‍था की दुर्गति के बारे में नहीं बोला। मैं निश्चितं हूं कि मैं जो भी कहने जा रहा हूं वह बड़ी संख्‍या में भाजपा के लोगों की भावनाएं हैं, जो डर की वजह से बोल नहीं रहे। इस सरकार में अरुण जेटली सर्वोत्‍तम और सबसे माहिर समझे जाते हैं। यह 2014 लोकसभा चुनावों से पहले तय था कि वह नई सरकार में वित्‍त मंत्री होंगे। अमृतसर से लोकसभा चुनाव हारना भी उनकी राह का रोड़ा नहीं बना। याद होगा कि ऐसी ही परिस्थितियों में अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन को मंत्री बनाने से इनकार कर दिया था, जबकि वे दोनों उनके बेहद करीबी थे। जेटली की अपरिहार्यता उस समय लक्षित हुई जब प्रधानमंत्री ने उन्‍हें न सिर्फ वित्‍त मंत्रालय, बल्कि रक्षा और कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय भी सौंप दिया। एक बार में चार मंत्रालय, जिनमें से तीन उनके पास अभी भी हैं। मैंने वित्‍त मंत्रालय संभाला है और मैं जानता हूं कि अकेले उसी मंत्रालय में कितना काम होता है। इस मंत्रालय को अपने प्रमुख के पूरे ध्‍यान की आवश्‍यकता होती है। कठिन समय में यह 24×7 की नौकरी हो जाती है, यहां तक कि जेटली जैसा सुपरमैन भी काम के साथ न्‍याय नहीं कर सकता।”
Image result for arun jaitleyसिन्‍हा ने अपने लेख में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के सामने आई चुनौतियों का जिक्र करते हुए लिखा है, ”प्रधानमंत्री चिंतित हैं। प्रधानमंत्री द्वारा वित्‍त मंत्री और उनके अधिकारियों की बुलाई गई बैठक अनिश्चितकाल के लिए स्‍थगित कर दी गई है। वित्‍त मंत्री ने ग्रोथ बढ़ाने के लिए एक पैकेज की घोषणा की है। हम सभी सांस रोके इस पैकेज का इंतजार कर रहे हैं। अभी तक तो यह आया नहीं। एक नई चीज यह है कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहर समिति का पुर्नगठन किया गया है। पांच पांडवों की तरह, उन्‍हीं से नये महाभारत का युद्ध जीतने की उम्‍मीद है।”
लेख के अंत में सिन्‍हा लिखते हैं, ”प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्‍होंने बेहद करीब से गरीबी देखी है। उनके वित्‍त मंत्री दिन-रात लगकर इस दिशा में काम कर रहे है कि सभी भारतीय भी उतनी ही करीबी से गरीबी देख लें।”
भाजपा के सीनियर लीडर और पूर्व फाइनेंस मिनिस्‍टर यशवंत सिन्‍हा ने मोदी सरकार के आर्थिक फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे सिन्‍हा ने फाइनेंस मिनिस्‍टर अरुण जेटली पर तगड़ा कटाक्ष करते हुए कहा, ''मैं फाइनेंस मिनिस्टर रहा हूं, जानता हूं कि वहां कितना काम होता है। वहां कोई भी शख्स एक ही काम देख सकता है। बदलते दौर में वहां 24 घंटे काम की दरकार होती है। जेटली जैसे 'सुपरमैन' ताकत वाले भी उसके साथ न्याय नहीं कर सकते।'' दो दिन में ये दूसरा मौका है जब बीजेपी नेताओं ने सरकार की नीतियों की आलोचना की है। पहले वरुण गांधी ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने की बात कही थी।
इकोनॉमी की हालत खराब है। पिछले दो दशक में प्राइवेट क्षेत्र में इन्वेस्टमेंट सबसे कम रहा है। जीएसटी को गलत तरीके से लागू किया गया, जिससे लाखों लोग बेरोजगार हो गए। इकोनॉमी में तो पहले से ही गिरावट आ रही थी, नोटबंदी ने तो सिर्फ आग में घी का काम किया।
इन पर यशवंत सिन्‍हा ने उठाए सवाल: 5प्‍वाइंट
1.नोटबंदी
Image result for demonetisation in india यशवंत सिन्‍हा ने कहा कि नोटबंदी एक बड़ी आर्थिक आपदा (इकोनॉमिक डिजास्टर) साबित हुई है। सिन्हा ने कहा, सरकार के स्‍पोक्‍सपर्सन कह रहे हैं कि इस मंदी के लिए नोटबंदी जिम्मेदार नहीं है। वे सही हैं। मंदी काफी पहले से शुरू हो गई थी, नोटबंदी ने केवल आग में घी डालने का काम किया है।'
2.आर्थिक मंदी 
यशवंत सिन्‍हा ने कहा कि एक के बाद दूसरे क्वॉर्टर में इकोनॉमी की ग्रोथ रेट में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर 2017-18 के पहले क्वॉर्टर में जीडीपी ग्रोथ रेट 5.7 फीसदी पर आ गई, जो तीन साल में सबसे कम है। प्राइवेट सेक्‍टर में इन्‍वेस्‍टमेंट लगातार कम हो रहा है। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन करीब-करीब खत्म हो चुका है। एग्रीकल्चर-कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री की हालत भी ठीक नहीं कही जा सकती। सर्विस सेक्टर में धीमा ग्रोथ रेट है। एक्सपोर्ट कम होने का असर इकोनॉमी पर साफ देखा जा सकता सकता है। 
3. GST 
Image result for gst bill format सिन्‍हा ने कहा कि जीएसटी को गलत तरीके से लागू किया गया। इसका बिजनेस पर काफी बुरा असर पड़ा। लाखों लोग बेरोजगार हो गए। बाजार में नौकरियों के नए मौके नहीं हैं। जीएसटी ने इंडस्‍ट्री में उथल-पुथल मचा दी है। एसएमई सेक्टर संकट में है। सरकार ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से उनकी जांच करने को कहा है जिन्होंने बड़े क्लेम किए हैं। कई कंपनियों खासतौर से एसएमई सेक्टर में कैश फ्लो की समस्या बनी हुई है लेकिन अब फाइनेंस मिनिस्‍ट्री इसी तरीके से काम कर रहा है। जब हम विपक्ष में थे तो रेड राज का हमने विरोध किया था। आज यह सब ऑर्डर ऑफ डे हो गया है।
4.राहत पैकेज 
सिन्‍हा ने लिखा, प्रधानमंत्री चिंतित हैं। विकास को रफ्तार देने के लिए फाइनेंस मिनिस्‍टर ने पैकेज देने का वादा किया है। हम सभी बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। नई चीज इतनी हुई है कि प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल (आर्थिक सलाहकार परिषद) का फिर से गठन हुआ है। पांच पांडवों की तरह वे हमारे लिए नई महाभारत को जीतने की उम्मीद लगाएं हैं।
5.हारने के बावजूद बने मंत्री 
सिन्हा ने कहा, अरुण जेटली को तो सरकार में सबसे बेहतर माना जाता है। 2014 में चुनाव के पहले ही ये तय हो गया था कि वे नई सरकार के फाइनेंस मिनिस्‍टर होंगे। जब वे अमृतसर से लोकसभा चुनाव हार चुके थे, उस लिहाज से तो उन्हें मंत्री बनाया जाना ही नहीं था। अगर मैं पुरानी बातें याद करूं तो 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी ने जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन को मंत्री बनाए जाने से मना कर दिया था। वैसे स्मृति ईरानी और अरुण जेतली ऐसे मंत्री हैं, जो एक बार भी चुनाव जीते। जो इतनी जबरदस्त मोदी लहर में जीत पाए, फिर कब जीतेंगे !!
व्यापारी भाजपा को दुबारा वोट देने से पहले सोंचेगा 
वास्तव में यशवन्त सिन्हा का गलत कहना नहीं है। अभी दो दिन पूर्व भाजपा जिला चाँदनी चौक के एक पदाधिकारी से बात हो रही थी। बात अन्य मुद्दों पर चल रही थी कि अचानक दिल का दर्द बाहर आ गया। बोले "यार अरुण जेटली के विरुद्ध कुछ लिखो, ...व्यापार करना मुश्किल हो गया है। अगर मोदी ने जेटली को नहीं हटाया, व्यापारी भाजपा के विरुद्ध हो जाएगा। देखना व्यापारी का वही हाल होगा, जिस तरह अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और भारतीय मुस्लिम मंच के 90 प्रतिशत कार्यकर्ता/पदाधिकारी भाजपा को वोट नहीं देते, ठीक वही स्थिति व्यापार जगत की होने वाली है। व्यापारी कहने को तो भाजपा के साथ होगा, लेकिन वोट नहीं देगा।" लिखना तो काफी समय से चाहा रहा था, लेकिन जब एक पदाधिकारी का दर्द सुना, फिर वरिष्ठ नेता का भी वही दर्द।
मोदी सरकार का काला धन खोजने का अभियान तो अच्छा है पर भ्रष्ट तंत्र के चलते आयकर अधिकारी मनमानी पर उतर आए है और इसकी गाज छोटे कारोबारियों पर पड रही है। छोटे दुकानदारों और कारोबारियों से लोगों को जो रोजगार व नौकरी मिल रहीं थीं वह भी ठप हो रहीं हैं। ऐसे माहौल में बाजारों का मंदी की चपेट में आना स्वाभाविक है।
Image result for indian hawker आपातकाल में आयकर अधिकारीयों को छोले-कुलचे, चाट-पकौड़ी वालों की टोकडियों में झूठे पत्ते गिनते देखा है, आयकर की सीमा से अधिक आय होने की स्थिति में उनसे आयकर वसूला गया। अब त्यौहारों पर चाट-पकौड़ी का पत्ता कितना महंगा है। जिस तरह एक दर्जी पैंट सीने से पहले मूत्र त्यागने की जगह बनाता है, ठीक इसी तरह कानून बनने से पूर्व उसके तोड़ने का रास्ता भी निकाल लिया जाता है। अब पत्ते/दोने की जगह ले ली है प्लेट ने। गिन लो। किसी वेतनभोगी से अधिक आय तो इन लोगों की है, जिन्हे हम कहते हैं "गरीब"
मोदी जी इस पदाधिकारी की न सुन पूर्व केंद्रीय मन्त्री की बात पर मंथन कर अरुण जेटली से वित्त मंत्रालय किसी अनुभवी को देंगे। जेटली एक सुलझे वकील हो सकते हैं, लेकिन एक वित्त मंत्री नहीं।हकीकत यह है कि वित्त मंत्री की नीतियों से केवल व्यापारी ही नहीं, हर वर्ग परेशान है। अब देखिए बैंक निर्देश मानते है रिज़र्व बैंक का, और रिज़र्व बैंक किसके निर्देश पर चलता है, वित्त मंत्रालय के। अब मिनिमम बैलेंस की राशि बढ़ाने से रिज़र्व बैंक या वित्तमन्त्री ने विचार किया। इन्हे शायद यह नहीं मालूम कि इस तरह की नीतियों का प्रहार वेतनभोगी और पेंशनभोगी पर पड़ता है, किसी निर्धन या व्यापारी पर नहीं। वित्त मंत्री जब वकालत करेंगे तो क्या अपनी मोटी फीस किसी कार्ड/paytm  से लेंगे?
गुंजन अग्रवाल is feeling angry.
गुंजन अग्रवाल's Profile Photo, Image may contain: 1 person, selfie and closeup24 minsNew Delhi
मोदी-सरकार ने सत्ता संभालते ही सभी लोगों को आर्थिक सब्जबाग़ दिखाते हुए बैंकों में जीरो बैलेन्स पर खाता खुलवाने को कहा। फलस्वरूप आनन-फानन में 30 लाख गरीब लोगों ने जीरो बैलेन्स पर बचत खाते खुलवाये। लेकिन फिर इसके कुछ दिन बाद स्टेट बैंक ने खाते में मिनिमम बैलेंस (क्षेत्र आधार पर 1,000/- से लेकर 5,000/- तक) रखना अनिवार्य कर दिया।
दो महीने पूर्व एक आरटीआई में स्टेट बैंक ने खुलासा किया कि उसने पहली तिमाही में ‘मिनिमम बैलेन्स’ नहीं रखने पर 388.74 लाख खातों से 235 करोड़ रुपये जुर्माना वसूला है। यह जानकारी स्टेट बैंक की मुम्बई शाखा के डिप्टी जेनरल मैनेजर ने दी। उल्लेखनीय है कि ये 235 करोड़ रुपये उन करोड़ों गरीब खाताधारकों के थे जो अपनी कमज़ोर आर्थिक परिस्थितियों के कारण बैंक में पैसे नहीं रख पाते हैं।
इतनी बड़ी राशि बेहद कमज़ोर आर्थिक पृष्ठभूमि (एक हज़ार रुपये भी नहीं रख पाने का मतलब साफ़ समझा जा सकता है) से आनेवाले लोगों के खाते से इस प्रकार निकाल ली गई जैसे यह पैसे स्टेट बैंक या स्वयं वित्तमंत्री का है। यदि किसी के खाते में 950 रुपये हैं, और वह व्यक्ति यदि दिल्ली में रहता है, तो 15 दिनों में उसके खाते में मात्र 500/- शेष रह जायेंगे और अगले 15 दिन में 300/- और उसके अगले 15 दिन के अन्दर जीरो बैलेन्स। उसके बाद उस खाते में कोई राशि डालते ही उसमें से भी पैसे कटेंगे। कुल मिलाकर इतनी बड़ी लूट मची हुई है कि एसएमएस-सेवा के नाम पर 150/- हर महीने बैंक काट रहा है। उक्त घटनाएँ मेरे साथ घटी हैं और इसके लिए मैं प्रमाण दे सकता हूँ। बैंक में रखे पैसे पेट्रोल और कर्पूर की तरह गायब हो रहे हैं, उसके बाद भी भक्तलोग ‘मोदी-मोदी’ का नारा लगा रहे हैं। कोई बहुत बड़ा सूदखोर भी इतने ब्याज नहीं लेगा, जितना पैसा स्टेट बैंक गरीब के खाते से चूस रहा है।
महानगरों में रहनेवाले लोगों को अपने बचत-खाते में 5,000/- मिनिमम रखना ही होगा। क्या महानगरों में कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमिवाले लोग नहीं रहते? क्या यही मोदी-सरकार की योजना थी कि गरीबों के मेहनत के पैसे लूटे जायें?
इसी मोदी-सरकार ने कालेधन के नाम पर देश की सौ करोड़ जनता को साठ दिनों के लिए आठ-आठ घंटे भूखे-प्यासे कतार में खड़ा करवाया। मोदी-सरकार की दृष्टि में इस देश का सबसे गरीब तबका ही सबसे बड़ा कालेधन का सौदागर है और खरबों में खेलनेवाले बड़े-बड़े उद्योगपति ईमानदारी के साक्षात् अवतार हैं। 
        

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