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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में कांग्रेस और भाजपा को दो दो सीटें

देशभर में मोदी लहर के बाद भी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुए छात्रसंघ चुनावों (दिल्ली विश्वविद्यालय) के नतीजों ने सभी को चौंका दिया है। चुनावों में ABVP को करारी हार का सामना पड़ा है। जबकि कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI ने चार साल बाद वापसी करते हुए अध्यक्ष पद पर कब्जा किया है। अध्यक्ष पद पर NSUI के रॉकी तुशीद ने जीत दर्ज की है। उन्हें 16299 वोट मिले हैं जबकि ABVP उम्मीदवार को 14709 वोट मिले हैं। दूसरी तरफ उपाध्यक्ष पद भी NSUI ने जीत हासिल की है। वहीं ABVP को सचिव और सह सचिव पद से संतोष करना पड़ा है। हालांकि सह सचिव पद पर वोटों की गिनती दोबारा की जा रही है। NSUI की इस जीत पर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। छात्रसंघ चुनाव में लोगों ने ABVP को हार का भाजपा का नीतियों को ठहराया है। कुछ लोगों ने रामजस कॉलेज विवाद को भी ABVP की हार से जोड़कर देखा है। ट्विटर पर यूजर्स ने छात्र संघ चुनाव में ABVP की हार पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को मिली हार मेरे जैसे विचारधारा से जुड़े व्यक्ति को कचोट गया।क्या इस हार का कारण कहीं सत्ता का गुमान तो नहीं? जमीनी स्तर पर कुछ करेंगे नहीं,सत्ता अपनी है तो अपने आगे किसी को कुछ समझेंगे नहीं। कार्यकर्ता जाए भाड़ में,तो हार फिर कोई रोक नहीं सकता।अकेले मोदी जी भी क्या कर लेंगे। संगठन में सत्ता का घमंड कैसे सर चढ़कर बोल रहा ,अब तो ये न्यायालय को भी धत्ता बता रहे है। भारत प्रकाशन जो आर. एस. एस. की प्रतिष्ठित पत्रिका पान्चजन्य प्रकाशित करती है ने पिछले वर्ष अपने बीस से पच्चीस साल पुराने कर्मचारी को मजीठिया वेज का वेतन न देना पड़े इसलिए जबरन टर्मीनेट कर दिया ।सभी कर्मचारी और उनका परिवार दर दर ठोकरें खा रहा है । संघ के सभी वरिष्ठ अधिकारी को कई बार पत्र के माध्यम से अवगत कराया किसी ने एक बार भी हालचाल नहीं पूछा। थक हार कर लेबर कमिश्नर के यहाँ गुहार लगाई। कमिश्नर ने सभी कर्मचारियों का टर्मीनेशन गलत ठहराते हुए मामला लेबर कोर्ट को भेज दिया। कोर्ट की सुनवाई अंतिम चरण में है।कोर्ट ने प्रबंधन को समझौते कर लेने का कल एक मौका दिया लेकिन ये आये नहीं । कोर्ट ने दो बजे तक फिर से प्रबंधन को आने का समय दिया लेकिन ये तब भी नहीं आये।आज तक प्रबंधन का कोई अधिकारी न्यायालय में आया ही नहीं। इसे ही तो कहते हैं सत्ता का घमंड। इन्हे लगता न्यायालय हमारा क्या कर लेगा।सत्ता अपनी है जो चाहे कर लेंगे,इन तुच्छ कर्मचारीयों की क्या औकात। मित्रों जीत तो सत्य की ही होगी। दुःख सिर्फ इतना जिससंगठन की विचारधारा को होश सभालने से आज तक जिए जा रहा हूँ । और जिस संगठन को हम सभी कर्मचारी ने जीवन का बहुमूल्य 20 से 25 वर्ष दिया आज इनके पास सत्ता आई तो हम लोगों को कहीं का न छोड़ा। आखिर किस मुंह से अच्छे दिन की बात करूँ ?

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Sunder Lal न्यायालय तो सबकी बैंड बजाने वाला है।भगवान के घर देर हे अंधेर नहीं है। * सबर कर बन्दे दुख : के दिन भी टल जायगे।*तुम पर हंसने वालो के एक दिन चेहरे उतर जायगे।


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Rajendra Nigam जब केंद्र में अटल सरकार आयी थी,तब भी कम से कम 15 कर्मचारियों को नौकरी से निकाला था। और अब मजीठिया वेतन मान लागू होने पर भी कर्मचारियों को नहीं के बराबर arrear दिया,इतना ही नहीं एक सेवानिर्वित  कर्मचारी का 40000 रूपए minus में बना दिया,क्या कभी ऐसा हुआ है?तब भी प्रधानमंत्री मोदी जी को लिखने पर लेबर कमिश्नर द्वारा उसी कर्मचारी को लगभग145000 रूपए दिए।

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माधुरी लिखती हैं, ‘ABVP को अब नए नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरने की जरूरत है। हिंदू खतरे में हैं, सैनिक बॉर्डर पर मर रहे हैं।’ रिचा सिंह लिखती हैं, ‘ABVP की गुंडागर्दी में शायद एफआईआर दर्ज नहीं होती लेकिन वोटों से उन्हें जवाब मिल गया।’ वहीं एक यूजर्स एक विशेष चैनल का नाम लेकर लिखते हैं, ‘#### ने तो बताया है कि चारों सीटों पर ABVP के उम्मीदवार जीते हैं।’ यूथ कांग्रेस के अकांउट से ट्वीट किया गया, ‘हाल में NSUI के अध्यक्ष चुने गए फिरोज खान की इस जीत मैं मुख्य भूमिका रही है।’
दूसरे, यह कि दिल्ली भाजपा और विद्यार्थी परिषद् ने अपने कार्यकर्ताओं एवं समस्याओं पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया, हाथों में झाड़ू लेकर सड़क पर आने से किसी समस्या का निवारण न हुआ है और न ही होगा। 1967 में जब दिल्ली में जनसंघ महानगर परिषद्(वर्तमान में जिसे विधान सभा कहते है) में सत्ता प्राप्त कर मुख्य कार्यकारी पार्षद (जिसे आज मुख्यमंत्री कहा जाता है) विजय कुमार मल्होत्रा ने क्या नहीं किया, लेकिन मुख्य ध्यान सफाई पर ही केन्द्रित रहा, परिणाम 1972 चुनाव में मिली केवल 5 सीट। सत्ता में आने पर मूल कार्यकर्ताओं को नज़र अंदाज़ करना, तब ही आज तक चल रहा है। और यही बनता है इनकी हार का कारण।    
वहीं रागिनी नायक लिखती हैं, ‘खराब राजनीतिक हिंसा, डर, सांप्रदायिकता नहीं चला। ABVP आउट।’ सुप्रिया लिखती हैं, ‘असम, राजस्थान, पंजाब के बाद अब दिल्ली में भी NSUI’ कीर्ति लिखती हैं, ‘ABVP आप कहां हो?’ शहजाद पूनावाला लिखते हैं, ‘केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू का धन्यवाद जिन्होंने इस जीत के लिए मदद की।’
Congratulations @nsui on an outstanding performance in . A triumph for liberal values on campus.  Proud of you!
Congratulations @nsui & @INCIndia for incredible victory in  conducted on ever-dependable without any paper ballot.🙃😊
दिल्ली की तर्ज़ पर राजस्थान में भी हार
राजस्थान के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्रसंघ चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को इस बार कोई बढ़ी कामयाबी हासिल नहीं हो पाई। प्रदेश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में तो छात्रों ने इस साल परिषद को अब तक की सबसे करारी हार दी। विश्वविद्यालय में इस बार अध्यक्ष पद पर परिषद के बागी पवन यादव ने एबीवीपी के संजय माचेडी को ढाई हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया। इसी तरह से राज्य के दूसरे बड़े विश्वविद्यालयों जोधपुर और अजमेर में भी विद्यार्थी परिषद को हार का सामना करना पड़ा। छात्रों ने सत्ता से जुड़े छात्र संगठन एबीवीपी को नकारते हुए अपना संदेश दे दिया। राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के छात्रसंघ चुनाव के नतीजों पर राजनीतिक दलों की निगाहें लगी हुई थीं। भाजपा समर्थित विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवारों के लिए तो उसके युवा मोर्चा और अन्य संगठनों के नेताओं ने भी भागदौड़ की थी। इसके बावजूद परिषद का उम्मीदवार कैंपस में बुरी तरह से हार गया। विश्वविद्यालय के अन्य पदों पर भी परिषद के उम्मीदवारों को युवा मतदाताओं ने धूल चटा दी। परिषद को सिर्फ संयुक्त सचिव पद मिला। महासचिव और उपाध्यक्ष के पदों पर एनएसयूआई के उम्मीदवारों को जीत मिली।
राजस्थान विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद पर विद्यार्थी परिषद की यह लगातार चौथी हार है। इस साल छात्रसंघ चुनाव के लिए परिषद के साथ ही सत्ताधारी दल के युवा संगठन ने भी जमकर मेहनत की थी। परिषद को उम्मीद थी कि छात्रों के बीच उसकी मजबूत पकड़ का अच्छा नतीजा आएगा। छात्रसंघ अध्यक्ष बने पवन यादव परिषद के ही निष्ठावान कार्यकर्ता थे। उनके टिकट को नकार कर संजय माचेडी को उम्मीदवार बनाने से वे नाराज हो गए। पवन ने बागी होकर चुनाव लड़ा और परिषद में हो रहे भेदभाव को उजागर कर दिया। पवन का कहना है कि उनकी टिकट दावेदारी को नकारने में परिषद के कुछ पदाधिकारी जिम्मेदार हैं। परिषद पर ऐसे पदाधिकारियों का कब्जा हो गया है जिन्हें असलियत का पता ही नहीं है। यादव का कहना है कि उन्होंने साल भर छात्रों के बीच रह कर अपनी पकड़ बनाई थी।
राजस्थान विश्वविद्यालय के संघटक कॉलेजों के छात्र संघ चुनावों में एबीवीपी को मुंह की खानी पड़ी। इसके अलावा प्रदेश के दूसरे बड़े जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय में भी परिषद को एनएसयूआइ की कांता ग्वाला ने शिकस्त दी। इस विश्वविद्यालय में पहली बार कोई छात्रा अध्यक्ष बनी। इसी तरह अजमेर के प्रतिष्ठित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में निर्दर्लीय मनीष पूनिया ने एबीवीपी के उम्मीदवार को हराया।भाजपा समर्थित और देश में सबसे बडा छात्र संगठन होने का दावा करने वाले विद्यार्थी परिषद की राज्य में हुई फजीहत ने सबको चौंकाया है। संगठन के कर्ताधर्ता अब हार को लेकर चिंतन मनन में जुट गए हैं। हालांकि परिषद का दावा है कि ज्यादातर शहरों में उसे जीत मिली है। एबीवीपी के प्रदेश संगठन मंत्री अर्जुन तिवाड़ी का कहना है कि सरकारी कॉलेजों में से ज्यादातर में उन्हें जीत मिली है। प्रदेश के बड़े विश्वविद्यालयों में मिली हार जरूर चिंताजनक है। इस पर संगठन के प्रमुख पदाधिकारी चिंतन कर रहे है। परिषद जोधपुर और अजमेर की हार को भी बड़ा झटका मानती है। एनएसयूआइ के प्रदेश अध्यक्ष अभिमन्यु पूनिया का कहना है कि एबीवीपी को इस बार प्रदेश के छात्रों ने पूरी तरह से नकार दिया है।
ABVP lost DUSU & JNU election
due to technical reason : Chanakya Amit Shah 

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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