1952 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की पहली बैठक में सांसदों ने छह महीने तक वेतन नहीं लेने का फैसला किया था.
वरुण गांधी अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते है। बीजेपी में उनकी छवि फायर ब्रांड नेता की है। लेकिन इस बार वरूण ने संसद के भीतर सांसदों की सैलरी बढ़ाने की मांग पर सवाल खड़ा कर दिया है। उनका कहना है कि पिछले एक दशक में सांसदों की सैलरी 400 प्रतिशत बढ़ी है इसके बावजूद सांसदों के काम का प्रदर्शन उनकी सैलरी के मुताबिक नहीं है।
लोकसभा में शून्यकाल के दौरान सांसदो की सैलरी का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब तमिलनाडु में किसान आत्महत्या कर रहे थे और राज्य के किसानों ने अपने साथी किसानों की खोपड़ियों के साथ दिल्ली में प्रदर्शन किया था। उसके बावजूद तमिलनाडु की विधानसभा ने 19 जुलाई को बेरहमी से असंवेदनशील अधिनियम के माध्यम से अपने विधायकों की सैलरी को दोगुना कर दिया है।
उन्होंने कहा कि 1952 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की पहली बैठक में सांसदों ने देश में आम आदमी की आर्थिक हालत को देखते हुए छह महीने तक वेतन नहीं लेने का फैसला किया था। वरुण गांधी ने महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि महात्मा न एक बार लिखा था कि ‘मेरी राय में सांसदों और विधायकों द्वारा लिए जा रहे भत्ते उनके द्वारा राष्ट्र के लिए दी गई सेवाओ के अनुपात में होना चाहिए।’
भाजपा के वरुण गांधी ने शून्यकाल में इस विषय को उठाते हुए कहा, ‘‘राजकोष से अपने स्वयं के वित्तीय संकलन को बढ़ाने का अधिकार हथियाना हमारी प्रजातान्त्रिक नैतिकता के अनुरूप नहीं है।’’
उन्होंने कहा कि इस देश की ज्यादा से ज्यादा अच्छाई के लिए, हमें वेतन निर्धारित करने के लिहाज से सदस्यों से स्वतंत्र एक बाहरी निकाय बनाना होगा। या यदि हम स्वयं को विनियमित करते हैं और देश के हालात तथा समाज में अंतिम व्यक्ति की आर्थिक स्थितियों पर विचार करते हैं, तो हमें कम से कम इस संसद की अवधि के लिए अपने विशेषाधिकारों को छोड़ देना चाहिए।
गैर सदस्यों का यह निकाय सरकार को सांसदों के वेतन और पेंशन के लिए सलाह देता है। जिसके लिए यह प्राधिकरण लाभार्थियों एवं जनता दोनों की सिफारिशों को संज्ञान में लेकर सिफारिशों की वैधता एव सरकार के सामर्थ्य की जांच करता है। इस तरह का तंत्र हमारे देश में नही है, यह दुखद है। वरुण गांधी के अनुसार महात्मा गांधी ने एक बार लिखा था कि, ‘‘मेरी राय में सांसदों और विधायकों द्वारा लिए जा रहे भत्ते उनके द्वारा राष्ट्र के लिए दी गयी सेवाओ के अनुपात में होना चाहिए।’’
भाजपा सदस्य ने कहा, ‘‘पिछले एक दशक में ब्रिटेन के 13 प्रतिशत की तुलना में हमने अपने वेतन 400 प्रतिशत बढ़ाये हैं ,क्या हमने सही में इतनी भारी उपलब्धि अर्जित की है?, जबकि हम अपने पिछले दो दशक के प्रदर्शन पर नजर डालें तो मात्र 50 प्रतिशत विधेयक संसदीय समितियों से जांच के बाद पारित किए गए हैं। जब विधेयक बिना किसी गंभीर विचार-विमर्श के पारित हो जाते हैं, तो यह संसद के होने के उद्देश्य को पराजित करता है। विधेयक को पारित करने की हड़बड़ी राजनीति के लिए प्राथमिकता दिखाती है, नीति के लिए नहीं। 41 प्रतिशत बिल सदन में चर्चा के बिना ही पारित किये गये।’’
वरुण ने ब्रिटेन के संसद से यहां के संसद की तुलना की
वरुण ने ब्रिटेन के संसद से यहां के सांसदों की सैलरी की तुलना की. उन्होंने कहा कि ‘पिछले एक दशक में ब्रिटेन के 13 प्रतिशत की तुलना में हमने अपने वेतन 400 प्रतिशत बढ़ाए हैं, क्या हमने वाकई इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है?
जबकि पिछले दो दशक के प्रदर्शन पर नजर डालें तो मात्र 50 प्रतिशत विधेयक संसदीय समितियों से जांच के बाद पारित किए गए हैं. जब विधेयक बिना किसी गंभीर विचार-विमर्श के पारित हो जाते हैं तो यह संसद के होने के उद्देश्य को पराजित करता है. विधेयक को पारित करने की हड़बड़ी राजनीति के लिए प्राथमिकता दिखाती है, नीति के लिए नहीं. 41 प्रतिशत बिल सदन में चर्चा के बिना ही पारित किए गए.’
सांसद देश की सेवा के लिए कार्यरत होते हैं
उन्होंने कहा कि जो लोग कहते हैं कि सांसदों का वेतन निजी क्षेत्र के अनुरूप होना चाहिए. वे लोग जो निजी क्षेत्र में काम करते हैं और वो प्राथमिक रूप से स्वयं के हित के लिए कार्यरत होते हैं. जबकि हम सांसद लोग देश सेवा के लिए कार्यरत होते हैं. यह हमारे सपनों का भारत बनाने का एक मिशन है. इन दो उद्देश्यों की तुलना करना सार्वजनिक जीवन के प्रति प्रतिबद्धता को गलत तरीके से समझना है.
वरुण गांधी ने कहा कि ब्रिटेन की संसद की तर्ज पर ही देश में भी एक तंत्र गठित होना चाहिए. ब्रिटेन में सांसदों के वेतन में बढ़ोतरी की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र प्राधिकरण है जिसमें गैर-सांसद सदस्य शामिल होते हैं. ऐसा ही तंत्र देश में भी गठित हो जिसमें सांसदों का हस्तक्षेप नहीं हो.
उन्होंने कहा कि सांसदों के वेतन बढ़ोतरी का कोई आधार होना चाहिए. निजी क्षेत्र का उद्देश्य सिर्फ अपना मुनाफा देखना होता है और इसलिए हम उसके अनुरूप वेतन में बढ़ोतरी नहीं कर सकते क्योंकि ये प्रजातांत्रिक नैतिकता के अनुरूप नहीं होगा. किसानों और देश के गरीब तबके के प्रति संवेदना दर्शाना भी सांसदों की जिम्मेदारी है.
वरुण पहले भी सांसदों की सैलरी बढ़ाए जाने का विरोध कर चुके हैं
इससे पहले भी वरूण गांधी सांसदों की सैलरी बढ़ाए जाने का विरोध कर चुके हैं. यूपीए कार्यकाल के वक्त उन्होंने तत्कालीन स्पीकर मीरा कुमार के सामने अपनी सैलरी न बढ़ाने की बात की थी.
दरअसल इस बार संसद के मानसून सत्र में राज्यसभा में सांसदों की वेतन बढ़ाने की मांग उठी थी. सांसदों का कहना था कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद उनका वेतन सरकार के सचिव से भी कम हो गया है.
समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने इसकी शुरुआत की और तो बाद में कांग्रेस के आनंद शर्मा ने उनके सवाल को सही ठहराते हुए उनका साथ दिया. आनंद शर्मा ने कहा था कि भारतीय सांसदों को दुनिया के जनप्रतिनिधियों के मुकाबले सबसे कम वेतन मिलता है.
भारत में कुल 4120 MLA और 462 MLC हैं अर्थात कुल 4,582 विधायक। प्रति विधायक वेतन भत्ता मिला कर प्रति माह 2 लाख का खर्च होता है। अर्थात श91 करोड़ 64 लाख रुपया प्रति माह। इस हिसाब से प्रति वर्ष लगभ 1100 करोड़ रूपये।
भारत में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर कुल 776 सांसद हैं। इन सांसदों को वेतन भत्ता मिला कर प्रति माह 5 लाख दिया जाता है। अर्थात कुल सांसदों का वेतन प्रति माह 38 करोड़ 80 लाख है। और हर वर्ष इन सांसदों को 465 करोड़ 60 लाख रुपया वेतन भत्ता में दिया जाता है।
अर्थात भारत के विधायकों और सांसदों के पीछे भारत का प्रति वर्ष 15 अरब 65 करोड़ 60 लाख रूपये खर्च होता है।
ये तो सिर्फ इनके मूल वेतन भत्ते की बात हुई। इनके आवास, रहने, खाने, यात्रा भत्ता, इलाज, विदेशी सैर सपाटा आदि का का खर्च भी लगभग इतना ही है। अर्थात लगभग 30 अरब रूपये खर्च होता है इन विधायकों और सांसदों पर।
अब गौर कीजिए इनके सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों के वेतन पर। एक विधायक को दो बॉडीगार्ड और एक सेक्शन हाउस गार्ड यानी कम से कम 5 पुलिसकर्मी और यानी कुल 7 पुलिसकर्मी की सुरक्षा मिलती है। 7 पुलिस का वेतन लगभग (25,000 रूपये प्रति माह की दर से) 1 लाख 75 हजार रूपये होता है। इस हिसाब से 4582 विधायकों की सुरक्षा का सालाना खर्च 9 अरब 62 करोड़ 22 लाख प्रति वर्ष है।
इसी प्रकार सांसदों के सुरक्षा पर प्रति वर्ष 164 करोड़ रूपये खर्च होते हैं। Z श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त नेता, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए लगभग 16000 जवान अलग से तैनात हैं। जिनपर सालाना कुल खर्च लगभग 776 करोड़ रुपया बैठता है। इस प्रकार सत्ताधीन नेताओं की सुरक्षा पर हर वर्ष लगभग 20 अरब रूपये खर्च होते हैं।
अर्थात हर वर्ष *नेताओं पर कम से कम 50 अरब रूपये खर्च होते हैं। इन खर्चों में राज्यपाल, भूतपूर्व नेताओं के पेंशन, पार्टी के नेता, पार्टी अध्यक्ष , उनकी सुरक्षा आदि का खर्च शामिल नहीं है। यदि उसे भी जोड़ा जाए तो कुल खर्च लगभग 100 अरब रुपया हो जायेगा।*
अब सोचिये हम प्रति वर्ष नेताओं पर 100 अरब रूपये से भी अधिक खर्च करते हैं, बदले में गरीब लोगों को क्या मिलता है ?
*क्या यही है लोकतंत्र ?* प्रत्येक भारतवासी को जागरूक होना ही पड़ेगा और इस फिजूल खर्ची के खिलाफ बोलना पड़ेगा ?
वरुण गांधी का कहना था कि विधायक और सांसद अधिकतर पहले से ही अमीर होते हैं और ऐसे में वेतन बढ़ाने की मांग जायज नहीं लगती है.
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