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बकरीद पर कुर्बानी को बताया “जानवरो का क़त्ल”

बकरीद पर कुर्बानी के खिलाफ खड़ा हुआ मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, बताया नाजायजबकरीद पर कुर्बानी के नाम पर जानवरों की दी जाने वाली बलि के विरोध में खुद मुस्लिम समाज खड़ा हो गया है।  अगस्त 29 को मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सदस्यों ने बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी का कड़ा विरोध जताया। 
लखनऊ स्थित विश्व संवाद केंद्र में आयोजित प्रेसवार्ता में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच यूपी के सह-संयोजक खुर्शीद आगा ने कहा, "बकरीद में कुर्बानी को लेकर समाज में अंधविश्वास फैला है, मुसलमान अपने आपको ईमान वाला तो कहता है, लेकिन वास्तव में अल्लाह की राह पर चलने से भ्रमित हो गया है।"
उन्होंने कुर्बानी का विरोध करते हुए प्रश्न उठाया कि कुर्बानी जायज नहीं है तो फिर जानवरों की कुर्बानी क्यों दी जा रही है? उन्होंने आयोध्या के विवादित ढांचे का जिक्र करते हुए कहा कि कुरान के अनुसार, जहां फसाद हो वहां नमाज अदा नहीं की जा सकती है, तो फिर विवादित ढांचे की जगह मस्जिद कैसे बनाई जा सकती है। 
वहीं पूर्वी यूपी के मंच संयोजक ठाकुर राजा रईस ने कहा, "जब हजरत इब्राहिम द्वारा किसी जानवर की कुर्बानी नहीं दी गई तो फिर मुस्लिम समाज में बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी क्यों दी जा रही है।बकरीद में जानवरों की कुर्बानी के नाम पर जानवरों का कत्ल हो रहा है, यह कुर्बानी नहीं है।"
वीडियो देखिये :--
https://www.facebook.com/sohrabgothgaimandi/videos/1700973149945417/
https://www.facebook.com/sohrabgothgaimandi/videos/1695314420511290/
उन्होंने कहा, "रसूल ने फरमाया है, "पेड़-पौधे, पशु-पक्षी अल्लाह की रहमत है, उन पर तुम रहम करोगे। अल्लाह की तुम पर रहमत बरसेगी।" संयोजक (अवध प्रांत) सैयद हसन कौसर ने गाय की कुर्बानी को हराम बताते हुए कहा, "'तीन तलाक' की तरह ही बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी एक कुरीति है। हम सब 21वीं सदी में प्रवेश करने जा रहे है। इसलिए समाज को बुरी कुरीतियों से निकालना होगा।"
बकरीद कुछ ही दिन बाद है, ऐसे में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की यह मुहिम एक सियासी मुद्दा बन सकती है। राजा रईस के मुताबिक जिस कुर्बानी का हवाला देकर बकरीद में जानवरों को काटा जाता है वो कभी हुआ ही नहीं। ये कुर्बानी तो रहमत का पर्व है, जहां कुर्बानी के बाद भी जिंदगी मिली है। खुद रसूल ने जब अपने बेटे की कुर्बानी देनी चाही तो अल्लाह ने उसे जिंदगी बख्शी। इसी प्रकार बकरीद के दिन बेजुबान पशुओं का बेहिसाब कत्ल कहीं से जायज नहीं है।मुस्लिम मंच ने गाय की कुर्बानी को इस्लाम के खिलाफ बताते हुए कहा कि कुरान में गाय काटने पर पाबंदी है। गाय पर तो हमारे हुजूर ने भी बंदि‍श लगा रखी है।
राष्ट्रीय मुस्लिम मंच चाहता है कि लोग बकरीद पर बेजुबान जानवरों के बेहिसाब कत्ल की बजाए दूध से बने केक आदि काटकर कुर्बानी दें। या अपनी सबसे अजीज चीजों की कुर्बानी दें। मंच ने कहा कि पिछले साल भी हमने केक काटकर बकरीद मनाई थी। इस साल भी हमारी अपील है कि किसी पशु की कुर्बानी न दें।
चलो माना पिछले साल साल केक काटकर मनाई ईद, अब इस बार भैंसा और ऊँट की ही बिक्री पर रोक लगवा दो। देखें कितने व्यापारी आपकी  बात मानते हैं। हो जाए दूध का दूध और पानी का पानी। 
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े मुस्लिम संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने बकरीद के दौरान जानवरो की कुर्बानी का विरोध किया है। इतना ही नहीं मुस्लिम मंच ने इसे जानवरो का कत्ल भी बताया है। बता दें कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अध्यक्ष इंद्रेश कुमार हैं जो स्वयं मुस्लिम न होने के बावजूद इस संगठन के अध्यक्ष बने बैठे हैं।
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बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी देने वाले मामले पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कुर्बानी न देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि पेड़-पौधे और जानवर अल्लाह ने बनाए हैं, उन पर रहम करना चाहिए। राष्ट्रीय मंच ने यह भी कहा कि गाय की कुर्बानी भी हराम है तथा मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने जानवरों की कुर्बानी की तुलना तीन तलाक से की। उन्होंने कहा कि तीन तलाक की तरह ही बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी देना भी कुरीति है।
इसके साथ ही इस्लाम के अनुयायियों से स्वच्छता बनाए रखने, धीरज रखने और किसी दूसरे समुदाय को शिकायत करने का मौका ना देने की अपील की है तथा केक काटकर बकरीद मनाने की अपील की है।
ज्वलन्त प्रश्न यह है कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच द्वारा जो बकरीद पर भ्रम फैलाया जा रहा है, क्या अब से पहले इन लोगों ने ईद पर कुर्बानी नहीं दी या वास्तव में अब क्या कुर्बानी नहीं देंगे? अख़बारों और न्यूज़ चैनलों पर केक काट फोटो खिचवाने की लालसा अलग बात है, लेकिन वास्तविकता में अमल करना अलग बात है। ज़मीन आसमान का फर्क है। फिल्म "उपकार" का एक बहुचर्चित सम्वाद है "राशन पर भाषण है, लेकिन भाषण पर कोई राशन नहीं", और यह सम्वाद मुस्लिम मंच पर सटीक बैठता है। 
इस बयान से मुस्लिम समाज में अब चर्चा हो रही है कि जो भाजपा को वोट नहीं दे सकते, भाजपा और संघ से मालपुए खाने के चक्कर में उल्टे-सीधे बयानों से गैर-मुस्लिम समाज में मुसलमानों के प्रति द्वेष भावना उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा है। इस तरह की बेसिर पैर की बातों से हिन्दू-मुसलमानों के बीच मन-मुटाव ज्यादा बढ़ेगा। जबकि यही लोग बकरा, मछली या मुर्गे की बजाए दूसरे मांस का अधिक करते हैं। आखिर ये लोग अपने स्वार्थ के चक्कर में मजहब को बदनाम कर रहे हैं। इनके प्रवचनों से गैर-मुस्लिम जरूर खुश होंगे, लेकिन मुस्लिम समाज पर इन दुष्प्रचारों का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ने वाला। उन्हें मालूम है कि ये लोग कितने दूध के धूले हैं। अगर इनका कहना सत्य है, ये लोग अपने घर, रिश्तेदार, एवं मौहल्ले में बकरीद पर क़ुरबानी रोक कर दिखाएं। इन्ही के पड़ोस में जाकर देखिए कितने बकरे पल रहे हैं। इन बिन पेंदी के लोटे एवं थाली के बैगन के नाम से सम्बोधित लोगों का मुस्लिम जगत में शून्य भी प्रभाव नहीं। यह कोई आरोप नहीं, कटु सत्य है। मुस्लिम मंच में सम्मिलित मुसलमानों को सर्वप्रथम अपने आपको अमलीजामा पहनना होगा।    

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