दिल्ली में बवाना सीट पर होने वाले उपचुनाव के बीच आम आदमी पार्टी के नेता इमरान हुसैन का एक पोस्टर सामने आया। पोस्टर में मुसलमानों से एक होकर वोट देने की अपील की गई। पोस्टर में यह भी लिखा गया कि मुसलमानों के बुजुर्गों ने हजारों सालों तक दिल्ली पर राज किया है और आगे भी ऐसा करने के लिए उन्हें एक होकर वोट देना होगा। पोस्टर में बार-बार कहा जा रहा है कि सभी मुसलमानों को एक होकर वोट देना है। वह पोस्टर कथित तौर पर इमरान हुसैन ने लगाए थे। पोस्टर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इमरान की जमकर आलोचना होने लगी। साथ में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी लोगों के निशाने पर आ गए क्योंकि पोस्टर में उनकी भी तस्वीर थी।
लोग लगातार यह दावा करते रहे कि पोस्टर इमरान ने ही लगवाएं है। लेकिन विवाद बढ़ने के बाद इमरान ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी सफाई दी। उन्होंने बताया कि ये पोस्टर उनके द्वारा नहीं लगाए गए हैं। इमरान ने लिखा बवाना उप चुनाव को लेकर मेरे नाम का फर्जी पोस्टर बनाया गया है। मैं इसके खिलाफ तुरंत पुलिस मे शिकायत दर्ज करा रहा हूं और पुलिस से कड़ी कार्यवाही की मांग करता हूँ।
वैसे बवाना कोई ऐसा इलाका नहीं है जहां पर मुस्लिम धर्म के लोग बहुत ज्यादा जनसंख्या में रहते हों। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, वहां 73 हजार लोग थे। जिनमें से 97 प्रतिशत हिंदू और 32 प्रतिशत मुसलमान थे।
इमरान की तस्वीर वाला यह पोस्टर सामने आया

प्रश्न यह है कि मतदान तिथि से पूर्व इस तरह के पोस्टर का आना और जनता से धर्म के नाम पर वोट मांगना क्या न्यायसंगत है? लाख इमरान हुसैन और आम आदमी पार्टी इस पोस्टर से इंकार करे, परन्तु इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि किसी भी चुनाव में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बाबरी मस्जिद, गोधरा आदि मुद्दों का ऐसे गुप्त मन्त्रा से प्रचार किया जाता है, जिसे सार्वजानिक करना लोहे के चने चबाने से कम नहीं। इस काम में गैर-भाजपाई पार्टियाँ ही सम्मिलित नहीं, इस प्रचार में भाजपा का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ एवं संघ का राष्ट्रीय मुस्लिम मंच भी किसी पार्टी से पीछे नहीं। प्रमाण जगजाहिर है। मुस्लिम मंच और अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कितने सदस्य और पदाधिकारी हैं और कितनी वोटें मिलती हैं? जहाँ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का नम्बर आते ही भाजपा की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। इस कटु सच्चाई से कोई इंकार कर भी नहीं सकता।
एक प्रमाण और, अभी दिल्ली में संपन्न हुए नगर निगम चुनाव मतदान से एक दिन पूर्व शाम को मुस्लिम बहुल क्षेत्र की भाजपा महिला प्रत्याक्षी के पति ने मुस्लिम बहुल मतदान केंद्रों के प्रभारी को बहुत ही विश्वास से कहा कि "अभी-अभी आपके क्षेत्र में 350 वोट पक्के करके आ रहे हैं", लेकिन मिला क्या "बाबा जी का ढुल्लु"; दूसरा पहलु इस चुनाव में यह भी रहा है कि मण्डल ने चुनाव में गंभीर भी नहीं था। रात 8 बजे कहा जाता है "मेजों का प्रबन्ध अपने आप करिए", अब कोई बताए कि "इस समय कौन से टेन्ट वाले के पास मेज बची होगी?" मतदान वाले दिन वही उम्मीदवार मतदान केन्द्र पर मेज-कुर्सी न होने पर चीखकर बोली "इतने वरिष्ठ होकर आपको नहीं मालूम कि मेज की जरुरत होती है, क्यों नहीं किया इंतज़ाम आपने?" लेकिन चुनाव संचालन करने वालों से नहीं पूछा कि "जब हमेशा मंडल ही मेज कुर्सी की व्यवस्था करता है, क्यों नहीं की गयी?" यानि चुनाव हारने की रणनीति पहले ही लिखी जा चुकी थी। चुनाव में होने वाले अन्य खर्चों के साथ क्या मेज-कुर्सी का खर्चा किस मद में दिखाया है, इसे उच्च पदाधिकारियों को देखना है। चुनावों लोगों से चंदा लो अपनी जेबों में डाल, कार्यकर्ताओं को मूर्ख बनाओ।
अब बवाना के इस उपचुनाव में वहाँ का मंडल किस नीति पर चुनाव का संचालन कर रहा है, यह अधिकारीयों को देखना है। किन्तु मुस्लिम समुदाय से अपील के इस पोस्टर पर चुनाव आयोग को संज्ञान जरूर लेना चाहिए।
अब बवाना के इस उपचुनाव में वहाँ का मंडल किस नीति पर चुनाव का संचालन कर रहा है, यह अधिकारीयों को देखना है। किन्तु मुस्लिम समुदाय से अपील के इस पोस्टर पर चुनाव आयोग को संज्ञान जरूर लेना चाहिए।
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