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| ये हैं पर्दानशीं की बेशर्मायी |

क्या कहा मौलवी ने?
जिस मौलवी की हम यहाँ बात कर रहे हैं उनका नाम है सैय्यद अथर हुसैन देहलवी. मौलवी सैय्यद ने हाल ही में एक ट्वीट किया जिसमे उन्होंने लिखा कि “जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर आतंकियों को शय देने वाले मुल्क पाकिस्तान से या फिर दुनिया के किसी भी अन्य देश से बात कर भारत की ही संप्रभुता के खिलाफ होगा.”
क्या थी लोगों की प्रतिक्रिया?
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| पत्थरबाज़ी करते वक़्त मुँह पर बेशर्मी का पर्दा , सुरक्षाकर्मियों की चोट पड़ते ही हसीनाओं के खुल गए चेहरे |
कुछ मौलवी मुसलमान कौम को बदनाम करने पर तुले हैं
तो वहीँ एक दूसरे यूजर दिनेश चावला ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुये कहा कि, “आपकी ट्वीट पढ़कर ऐसा लगा कि मानो शुक्र है. किसी को तो इतनी समझ है कि देश में क्या सही है क्या गलत. वरना तो कुछ मौलाना आये दिन कुछ ना कुछ ज़हर उगल कर पूरी मुस्लिम कौम को ही बदनाम करने पर तुले हुए हैं.”
कोई तो है जो सीधा सोचता है
मौलाना साहब के इसी ट्वीट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए एक यूजर अविनाश त्रिपाठी ने कहा कि, “धन्यवाद सर ऐसा लिखने और बोलने के लिए. अच्छा लगा ये देखकर कि कोई तो सीधा बोलता और सोचता है।”
ऐसी सोच वाले हर मुसलमान भाई को प्यार और आदर
सैय्यद अथर की ट्वीट के जवाब नें ही एक ट्विटर यूजर जस्ट ऐन इंडियन, लिखते हैं कि, “बढियां सोच है आपकी सर. आशा करता हूँ देश के सभी मौलाना इसी तरह की सोच रखें. ऐसी सोच रखने वाले हर भारतीय मुसलमान भाइयों को वो सारा प्यार और इज्ज़त मिलनी चाहिए जिसके वो हकदार हैं।
वाकई सैय्यद अथर देहलवी की इस सोच से ये तो पता चलता है कि सचमुच देश का हर मौलवी देश के बंटवारे की ही नहीं बल्कि कुछ ऐसे भी मौलवी हैं जिन्हें यकीन है कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का हस्तक्षेप बिलकुल बेवजह और बेबुनियाद है। यकीनन अगर सैय्यद अथर जैसी ही सोच के कुछ और मुसलमान भाई देश में हो जायें तो शायद कश्मीर मुद्दा उतना बड़ा ना हो जितना आज के समय में वो बन चुका है।
बार बार आप कश्मीर समस्या, कश्मीर समस्या ये शब्द सुनते रहते है। जिहादी सेक्युलर और वामपंथी बताते है की कश्मीर में समस्या है ये है वो है, पर असल में कश्मीर में समस्या क्या है जम्मू कश्मीर के मुख्यतः 3 हिस्से है, पहला कश्मीर, दूसरा जम्मू और तीसरा लद्दाख वाला इलाका; अब इन तीनो में और पुरे देश को भी ले ले, तो समस्या समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। लेकिन कश्मीर की वास्तविक समस्या है, मुसलमानों का बहुसंख्यक होना। इतिहास गवाह है। जब जब और जहाँ जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हुआ नहीं कि समस्याएँ शुरू। और कुर्सी के भूखे नेता और पार्टियाँ तुष्टिकरण अपनाते हुए इन्हे सिर माथे बैठा इनकी हर अनुचित माँग को उचित मान संविधान को ताक पर रख सियासत खेलने लगते हैं।
कश्मीर में बस यही समस्या है की यहाँ मुसलमान बहुसंख्यक है, जब तक 1990 तक हिन्दू यहाँ था, हालाँकि उस समय भी हिन्दू अलपसंख्यक ही था, फिर भी हालत थोड़े ठीक थे फिर मुसलमानो ने हिन्दुओ को भगा दिया उसी के बाद में कश्मीर में समस्या है और कोई रोजगार, भुखमरी की ऐसी कोई समस्या नहीं है, समस्या बस ये है की यहाँ मुसलमान अधिक है, अन्यथा जम्मू और लद्दाख में समस्या क्यों नहीं है। जहाँ भी मुस्लिम जनसँख्या अधिक हो रही है वहां समस्या भी बड़ी हो रही है, और ये तो तथ्य है। जब कोई गैर-कश्मीरी कश्मीर में एक इंच जगह नहीं खरीद सकता, फिर कश्मीरिओं को कश्मीर से बाहर जगह खरीदने की इजाजत क्यों?
पाकिस्तान ने भारत की "अग्नि मिसाइल" के उत्तर में जो मिसाइल बनाई तो नाम रखा "बाबर", जब पाकिस्तान से पूछा गया "बाबर" नाम ही क्यों रखा तो पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने बोला "जिस बाबर ने हिंदुस्तान में जिहाद और कत्लेआम मचा दिया, उसके नाम से अच्छा नाम भला क्या होगा ?" अब जनता खुद सोचे "बाबर" को भारत में प्रमोट किस मानसिकता से किया जा रहा? और हिन्दुस्तानी मुसलमान जिनके पूर्वजों को बाबर, बाबर की संतानों ने घोर अत्याचार से मुसलमान बना दिया, वो ही आज उस बाबर की स्तुति गा रहे है ! ये होती है मानसिक ग़ुलामी।
भारतीयों को जागना होगा, और खासकर इन सेक्युलर और वामपंथी तत्वों को मार भगाना होगा। आज भारत तो क्या विश्व के किसी भी भाग में इन मुग़ल आतताइयों का कोई नाम लेवा नहीं, केवल भारत में ही जयचंद उनका नाम जीवित रखे हुए हैं।
| कश्मीरी पंडितों का नरसंहार |
ये Not In My Name के समर्थक भी हैं, जिन विरोधियों ने तभी अपना मुंह खोला है जब नाम जुनैद, आमिर इत्यादि हो लेकिन वहीं अगर नाम राम और विष्णु होगा तो ये पूरा गैंग अपने मुंह पर ताला लगा लेगा. मुझे आश्चर्य इस बात पर होता है जिस दिन Not In My Name हो रहा था और जुनैद की हत्या का कारण बीफ बताया गया था तब सारे कैमरा इनसे गुफ्तगू करने पहुंच गए, सबसे आगे खड़ी शबाना आज़मी का कॉन्फिडेंस कमाल का लग रहा था उन्हें अपने ट्विटर के लिए काफी अच्छी तस्वीरें भी नसीब हुईं पर अब जुनैद किस कारण से मारा गया उसका खुलासा हो गया तो कोई कैमरा या कोई ऐसा साक्षात्कार क्यों नहीं किया गया इन लोगों से ये पूछने के लिए कि आप किसी भी विरोध से पहले तथ्य को क्यों नहीं जानना चाहते? किसी ने शबाना आज़मी से उनका सड़ा हुआ पोस्टर फेंकने को क्यों नहीं कहा?
सभी बुद्धिजीवियों ने अमरनाथ यात्रियों को लेकर अपना दुख जताया है पर एक भी पोस्टर छापकर उसका विरोध नहीं किया। ट्विटर पर ट्वीट कर ये लिखा है कि हम इसके खिलाफ है, हां और कई लोगों ने इसमें भी प्रधानमंत्री को जोड़कर सवाल भी किया है और ये वही लोग हैं जो हिन्दू आतंकवाद, जो पाकिस्तान से बातचीत के नारे की उल्टियां कैमरों पर करते हैं, ये वही लोग हैं जो JNU जाकर भारत विरोधी नारों का समर्थन भी करते हैं, ये वही लोग हैं जो सर्जिकल स्ट्राइक पर उंगली उठाते है। शायद अगर यहां भाजपा की सरकार नहीं होती तो इनके ट्वीट ‘कड़ी निंदा’ वाले ना होते। जो लोग ‘हिन्दू’ आतंकवाद कहते हैं वो आज ‘इस्लाम’ को आतंकवाद के साथ क्यों नहीं जोड़ रहे?? उनका एक भी ट्वीट ‘इस्लाम’ के खिलाफ क्यों नहीं?



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