भगत सिंह तो शहीद हुए, पर बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत में क्या-क्या झेलना पड़ा, जानकर शर्मिंदा होंगे आप!60 के दशक की बात है, पटना में बसों के परमिट दिए जाने थे, सैकड़ों लोगों ने आवेदन किया हुआ था। लाइन में एक पैंतालीस-पचास साला व्यक्ति भी था। जब वो पटना के कमिश्नर से मिला और उसने अपना नाम बताया और कहा कि वो एक स्वतंत्रता सेनानी है। पटना के कमिश्नर ने पूछा कि सर, आप स्वतंत्रता सेनानी हैं, मैं ये कैसे मान लूं, आपके पास तो स्वतंत्रता सेनानी वाला सर्टिफिकेट भी नहीं है, पहले लाइए, तब मानूंगा। उस समय उन्हें बहुत अफसोस हुआ कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के साथ उन्हें फांसी क्यों नहीं हुई। कम से कम देश याद तो करता। हालांकि बस परमिट वाली बात पता चलते ही देश के राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद ने बाद में उनसे माफी मांगी थी।
बटुकेश्वर को 1964 में अचानक बीमार होने के बाद गंभीर हालत में पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, क्या दत्त जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए? परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है।
इस लेख से सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया और अबुल कलाम आजाद केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर से मिले और 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया। दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था- मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा। बाद में पता चला कि दत्त बाबू को कैंसर है।11 दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती किया गया। पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए।
बटुकेश्वर की तरह न जाने कितने स्वतन्त्रता सैनानी हैं, जो स्वयं या आज उनके परिवार दो जून की रोटी के लिए मेहनत मजदूरी कर रहे हैं, किसी नेता या सरकार के आगे हाथ नहीं फैलाते। जबकि न जाने कितने छद्दम स्वतन्त्रता सैनानी सरकार से पेंशन खा रहे है। टूटे-फूटे मकानों में रह रहे हैं, जबकि हमारे नेता आलिशान बंगलो में राजशाही ज़िन्दगी जी रहे हैं। नौकर चाकर लगे हैं। किसी को इन शहीदों के परिवारों की चिन्ता नहीं। शहीद उद्दाम सिंह, जिसने ब्रिटेन जाकर डायर को मारकर जलिआंवालां बाग़ का बदला लिया था, का पोता ईंटें ढ़ोकर अपने परिवार का गुजारा कर रहा है।
बात ज्यादा पुरानी नहीं, उन दिनों की है जब दिल्ली में ब्लू और रेड लाइन बसें चल रही थीं। अजमेरी गेट से एक सज्जन चढ़े। कंडक्टर द्वारा टिकट लेने पर जवाब दिया "स्वतन्त्रता सैनानी हूँ", इतना कहना था कि कंडक्टर ने जवाब दिया "टिकट लो, और इस स्वतन्त्रता सैनानी कार्ड को जेब में रख टिकट लो। लाओ 600 रूपए दो कल ले लेना एक और कार्ड।" जिस देश में इस तरह से कार्ड बनवाकर सरकार से लूटने की इच्छा रखने वाले हो, उनमे देशभक्ति कहाँ से होगी? परिणाम सबके सामने है, आते जनसेवा के लिए है और देखिए कितने मकान और मोटे-मोटे बैंक खाते। इन्ही नेताओं के कारण वास्तविक स्वतन्त्रता सैनानी परिवार कष्टमय जीवन जी रहे हैं और छद्दम ऐश कर रहे हैं।
Comments