एक बड़े घटनाक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अभी अभी राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी से मिलकर अपना इस्तीफा सौंपा। कुछ ही देर पहले नीतीश कुमार राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी से मिलने पहुंचे थे। कुछ ही देर पहले ही जेडीयू विधायक दल की बैठक संपन्न हुई है। जहां से निकलने के बाद नीतीश राजभवन के लिए निकले। इससे पहले, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने बुधवार को कहा था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कभी उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद का इस्तीफा नहीं मांगा। उन्होंने कहा कि तेजस्वी इस्तीफा नहीं देंगे, यह राजद विधानमंडल की बैठक में तय हो चुका है। लालू ने कहा था, “महागठबंधन में कोई टूट वाली बात नहीं है। मैं रोज नीतीश कुमार से बात करता हूं। कल ही रात को हमारी बात हुई।” उन्होंने अपने खास अंदाज में कहा, “हमने ही महागठबंधन बनाया है और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया है और हम ही इसे ढाह देंगे। ऐसा कहीं होता है क्या? यह महागठबंधन पांच साल के लिए बना है।”
सीबीआई द्वारा भ्रष्टाचार के एक मामले में तेजस्वी को आरोपी बनाए जाने के बाद जद (यू) तेजस्वी से सभी आरोपों का तथ्यात्मक जवाब मांग रही है। राजद पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सही जगह और सही समय पर सभी आरोपों का जवाब दिया जाएगा। इसके बाद दोनों दल आमने-सामने आ गए है।
मॉल और मिट्टी घोटाले से शुरू हुई बात जमीन और पता नहीं किन-किन घोटालों तक पहुंची। नीतीश के बारे मेें कहा गया कि भ्रष्टाचार के आरोपी डिप्टी सीएम को वह कैसे अपनी सरकार में रख सकते हैं? नीतीश मौन साधे रहे। अचानक इस्तीफे का बम फोड़ दिया। और, इसका ठीकरा लालू प्रसाद यादव पर फोड़ा। कहा- मैंने इस्तीफा तो मांगा ही नहीं था। केवल सफाई मांगी थी। वह भी नहीं दी। देते कहां से। कुुुछ बोलने के लिए होता तब तो। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र लोक-लाज से चलता है। नीतीश ने लाज की फिक्र की, पर अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया। अगर उनके डिप्टी सीएम पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था तो उन्हें दो में से एक काम ही करना चाहिए था। या तो स्टैंड लेते कि जब तक आरोप साबित नहीं होता, तब तक वह इसकी चिंंता नहीं करेंगे। या फिर, वह तेजस्वी यादव का इस्तीफा लेते। नहीं मिलने पर बर्खास्त कर देते। लेकिन ऐसा करना राजनीतिक रूप से फायदेमंद नहीं होता।
इस्तीफा देकर नीतीश ने अपना राजनीतिक फायदा ही नहीं साधा है, बल्कि लालू के लिए संकट गहरा भी कर दिया है। लालू के लिए अब राजद को सत्ता मेें बनाए रखना लगभग नामुमकिन होगा। उनके बेटों का भविष्य भी चमकदार नहीं रह जाएगा। एक बेटा सरकार में उपमुख्यमंत्री और दूसरा मंत्री पद भोगता रहा है। अब बात शायद विधायकी तक ही सीमित रह जाएगी। आशंका इस बात की भी है कि कानूनी तौर पर भी पूरे लालू परिवार की मुसीबतें अभी और बढ़ेंगी।
मॉल और मिट्टी घोटाले से शुरू हुई बात जमीन और पता नहीं किन-किन घोटालों तक पहुंची। नीतीश के बारे मेें कहा गया कि भ्रष्टाचार के आरोपी डिप्टी सीएम को वह कैसे अपनी सरकार में रख सकते हैं? नीतीश मौन साधे रहे। अचानक इस्तीफे का बम फोड़ दिया। और, इसका ठीकरा लालू प्रसाद यादव पर फोड़ा। कहा- मैंने इस्तीफा तो मांगा ही नहीं था। केवल सफाई मांगी थी। वह भी नहीं दी। देते कहां से। कुुुछ बोलने के लिए होता तब तो। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र लोक-लाज से चलता है। नीतीश ने लाज की फिक्र की, पर अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया। अगर उनके डिप्टी सीएम पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था तो उन्हें दो में से एक काम ही करना चाहिए था। या तो स्टैंड लेते कि जब तक आरोप साबित नहीं होता, तब तक वह इसकी चिंंता नहीं करेंगे। या फिर, वह तेजस्वी यादव का इस्तीफा लेते। नहीं मिलने पर बर्खास्त कर देते। लेकिन ऐसा करना राजनीतिक रूप से फायदेमंद नहीं होता।
इस्तीफा देकर नीतीश ने अपना राजनीतिक फायदा ही नहीं साधा है, बल्कि लालू के लिए संकट गहरा भी कर दिया है। लालू के लिए अब राजद को सत्ता मेें बनाए रखना लगभग नामुमकिन होगा। उनके बेटों का भविष्य भी चमकदार नहीं रह जाएगा। एक बेटा सरकार में उपमुख्यमंत्री और दूसरा मंत्री पद भोगता रहा है। अब बात शायद विधायकी तक ही सीमित रह जाएगी। आशंका इस बात की भी है कि कानूनी तौर पर भी पूरे लालू परिवार की मुसीबतें अभी और बढ़ेंगी।
नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद एनडीए नेताओं की तरफ से बधाइयों का ताता लगा हुआ है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्वीट कर पीएम मोदी को बधाई दी. कहा कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में जुड़ने के लिए नीतीश कुमार जी को बहुत-बहुत बधाई. सवा सौ करोड़ नागरिक ईमानदारी का स्वागत और समर्थन कर रहे हैं. देश के, विशेष रूप से बिहार के उज्जवल भविष्य के लिए राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक होकर लड़ना, आज देश और समय की माँग है.
नीतीश कुमार ने कहा कि महागठबंधन सरकार को 20 माह तक चलाया है, हमने गठबंधन धर्म का पालन करते हुए काम किया है. हमने कभी किसी का इस्तीफा नहीं मांगा, मीडिया में कई तरह की खबरे आ रही थी कि इस्तीफा लेंगे या बर्खास्त करेंगे लेकिन हमने ऐसा कुछ भी नहीं कहा था. हमारी हमेशा से ही लालू प्रसाद यादव और राजद से संवाद होती रही हमने इस्तीफे से पहले भी लालू प्रसाद यादव से बातचीत किया और अपने फैसले से अवगत करा दिया था..
तेजस्वी इस्तीफे के लिए तैयार नहीं थे, हमको जवाब देना मुश्किल हो रहा था पर लालू कुछ नहीं करना चाहते थे इसलिए इस्तीफा दे दिया. उन्होंने बताया कि इस्तीफा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने मंजूर कर लिया है. इस्तीफे के लिए नीतीश कुमार ने लालू यादव पर ठीकरा फोड़ा, लालू गठबंधन संकट के लिए खुद जिम्मेदार है. गठबंधन धर्म का पालन करने का पूरा प्रयास किया, काम कुछ भी करता, चर्चा सिर्फ एक ही बात की थी, अब माहौल काम करने लायक नहीं बचा था.
बिहार के 243 सदस्यों की विधानसभा में अभी जनता दल यूनाइेटड के 71 विधायक हैं, जबकि राष्ट्रीय जनता दल के 80 विधायक हैं, विधानसभा में कांग्रेस के 27 एमएलए हैं, जबकि बीजेपी के 53 विधायक हैं।
राजद अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के बेटे और उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की छापेमारी के बाद उनके इस्तीफे की मांग उठी थी, जिसे लेकर महागठबंधन में दरारें पैदा हो गई थीं। तेजस्वी ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था, जिससे यह दरार चौड़ी होती गई और अंतत: नीतीश ने इस्तीफा दे दिया।
नीतीश को इस्तीफे से तात्कालिक फायदा उनकी छवि का भी हुआ है। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हैं। इसके लिए वह कुर्सी कुर्बान करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। कुछ उसी तरह जैसा उन्होंने नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए से संबंध तोड़ते वक्त यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वह सांप्रदायिकता से समझौता करने वाले नहीं हैं। पर लोकतंत्र में लोक-लाज की बााात करने वाले नीतीश कुमार को इस सवाल का जवाब भी देना चाहिए कि उन्होंने 20 महीने तक भ्रष्टाचार और जबरदस्ती को क्यों सहा। यह बात अलग है कि इन महीनों में भ्रष्टाचार या जबरदस्ती की बात इस तरह जगजाहिर नहीं हुई थी और न ही इस संबंध में किसी कानूनी कार्रवाई की बात सामने आई है।
नीतीश को इस्तीफे से तात्कालिक फायदा उनकी छवि का भी हुआ है। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हैं। इसके लिए वह कुर्सी कुर्बान करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। कुछ उसी तरह जैसा उन्होंने नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए से संबंध तोड़ते वक्त यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वह सांप्रदायिकता से समझौता करने वाले नहीं हैं। पर लोकतंत्र में लोक-लाज की बााात करने वाले नीतीश कुमार को इस सवाल का जवाब भी देना चाहिए कि उन्होंने 20 महीने तक भ्रष्टाचार और जबरदस्ती को क्यों सहा। यह बात अलग है कि इन महीनों में भ्रष्टाचार या जबरदस्ती की बात इस तरह जगजाहिर नहीं हुई थी और न ही इस संबंध में किसी कानूनी कार्रवाई की बात सामने आई है।
Comments