मीडिया में यहाँ तक खबर चल रही है कि अमित शाह को रक्षा मंत्री बनाया जा सकता है। मार्च 2017 में मनोहर पर्रीकर के रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद से ही यह महत्वपूर्ण पद खाली पड़ा है। पर्रिकर केंद्रीय कैबिनेट छोड़कर गोवा के मुख्यमंत्री बन गए थे। पर्रिकर के इस्तीफे के बाद रक्षा मंत्रालय का दायित्व वित्त मंत्री अरुण जेटली को सौंप दिया गया। हालांकि जेटली के स्वास्थ्य और वित्त मंत्रालय के भार को देखते हुए उम्मीद की जा रही थी कि जल्द ही किसी बड़े नेता को रक्षा मंत्रालय का जिम्मा सौंपा जाएगा। लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। भारत और चीन के बीच जारी सिक्किम में सीमा विवाद के बीच नरेंद्र मोदी सरकार की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि देश के पास एक पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नहीं है। रक्षा मंत्रालय देश के प्रमुख मंत्रालयों में शुमार होता है इसलिए इस पर किसी बड़े नेता की तैनाती होनी है। माना जा रहा है कि अमित शाह को रक्षा मंत्री बनाकर बीजेपी ये संदेश देना चाहेगी कि वो देश की सुरक्षा को बहुत ज्यादा गंभीरता से लेती है।
वैसे बिहार में महागठबन्धन को ध्वस्त करने उपरांत सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि शरद यादव को देश का रक्षा मंत्री का भार दिया जा सकता है। यह बात भी सही है कि इस पद पर कोई भरोसे के ही हाथ दिया जा सकता है, किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ नहीं जो किसी लालच में ईमान ही बदल जाए।
ये बात आज किसी से नहीं छिपी है कि नरेंद्र मोदी के बाद बीजेपी में दूसरे सबसे ताकतवर नेता अमित शाह हैं। कुछ राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि राज्य सभा में अमित शाह को लाने के पीछे उन्हें कैबिनेट में लाना की मंशा हो सकती है लेकिन जरूरी नहीं कि उन्हें रक्षा मंत्री ही बनाया जाए। कुछ लोगों को कहना है कि बीजेपी के शीर्ष मंत्रालयों में फेरबदल संभव है। जदयू ने बीजेपी से हाथ मिला लिया है तो उसके कुछ नेता भी केंद्रीय कैबिनेट में शामिल हो सकते हैं। लेकिन जिस तरह से बीजेपी में पिछले कुछ सालों में सभी बड़े फैसले चौंकाने वाले रहे हैं उसी तरह इस बार भी पार्टी सभी को हैरान कर दे तो बड़ी बात नहीं होगी।
कांग्रेस का अस्तित्व खतरे में
कांग्रेस विधायक मान सिंह चौहान और छानाभाई चौधरी ने शुक्रवार (28 जुलाई) को विधान सभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा सौंप दिया। साल 1990 से 1995 के बीच कांग्रेस की सरकार में चौहान परिवहन मंत्री थे। दोपहर होते-होते गोधरा के विधायक सी के रौली और थासरा के विधायक राम सिंह परमार ने भी अपना इस्तीफा विधान सभा स्पीकर को सौंप दिया। परमार खेड़ा की अमूल डेयरी के चेयरमैन हैं।
कांग्रेस के इन विधायकों के इस्तीफे से सोनिया गांधी के करीबी अहमद पटेल के राज्य सभा में पहुंचने की कोशिश को झटका लग सकता है। राज्य में आठ अगस्त को संसद के ऊपरी सदन के लिए चुनाव होना है। 182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या अब 50 रह गई है। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए 47 विधायकों के वोट की जरूरत होगी। अगर चार और विधायकों ने पार्टी छोड़ी तो अहमद पटेल का संसद पहुंचना मुश्किल होगा। हालांकि, राहत की बात यह है कि कांग्रेस विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को एनसीपी के दो और जदयू के एक विधायक का समर्थन हासिल है। बावजूद इसके क्रॉस वोटिंग का भी खतरा है। हाल ही में राष्ट्रपति चुनाव में ऐसा हो चुका है। कांग्रेस के 57 विधायक होने के बावजूद मीरा कुमार के समर्थन में सिर्फ 49 वोट पड़े थे।
लगता है कि कांग्रेस को अब अपने अस्तित्व को बचाना ही अपने आपमें एक समस्या बन गयी है, कि देश सर्वाधिक पुरानी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने अस्तित्व को बचाने एक दूसरी बैसाखी का सहारा लेने को मजबूर हैं।
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