पत्रकारों ने यह भी बताया कि एनएचएआइ के अधिकारियों द्वारा ये मीडिया किट बांटी गईं थीं। हालांकि मीडियाकर्मियों ने इसका कड़ा विरोध किया। वहीं एक पत्रकार ने अंगुल थाने में शिकायत दर्ज भी कराई है। अंगुल के एसपी ब्रिजेश के राई ने बताया कि पुलिस को शिकायत मिली है और हम इसकी जांच कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस कार्यक्रम में नितिन गडकरी मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे और उनके साथ केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, राज्य बीजेपी के अध्यक्ष भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे। नितिन गडकरी यहां राजमार्ग परियोजना की आधारशिला रखने आये थे। इसी कार्यक्रम को कवर करने के लिए ओडिशा के विभिन्न अख़बार और न्यूज़ चैनल के पत्रकार भी आये थेl
ख़बरों के मुताबिक, उनके कार्यक्रम में पत्रकारों को जो मीडिया किट दिया गया उसमें अन्य कागजातों के साथ 500 रुपये का नोट भी रखा हुआ था। इसे देखकर पत्रकारों ने खासी नाराजगी जताई और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारियों से पूछा कि किट में यह रकम क्यों रखी गयी। पत्रकारों की नाराजगी के कारण आयोजन स्थल पर कुछ देर के लिए शोरगुल का माहौल पैदा हो गया। वहीं दूसरी और घटना के समय गडकरी और और उनके साथ मौजूद अन्य केंद्रीय मंत्री कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए मंच की और बढ़ रहे थे।
इससे पहले नवंबर 2014 में बीजू जनता दल के सांद पिनाकी मिश्रा की मौजूदगी में एक सरकारी बैंक के संवाददाता सम्मेलन में भी इस तरह की घटना हुई थी।
संत कबीर दास का दोहा है :-
बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन झाँका आपना, मुझसे बुरा न कोय।।
जिन पत्रकारों ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है, वास्तव में मैं व्यक्तिगत रूप से उनको कोटि-कोटि बधाई देता हूँ। अब बात करते हैं, कार्यक्रम को प्रसारित एवं प्रचारित करने की। नितिन गडकरी का यह मुद्दा तो ऊँट के मुँह में एक जीरे के समान भी नहीं। दूसरे अर्थों में कहा जाए कि इन पत्रकारों ने वास्तव में उस मुद्दे को उछाला है, जिसकी देश में विकास से ज्यादा बिकाऊ मीडिया को देश के सम्मुख प्रस्तुत करने की मंशा है या उम्मीद से कम रूपए मिलने की या सरकार को बदनाम करने की? सत्ता के गलियारों में बैठ मालपुए खाने वाले इन पत्रकारों की यदि पार्टी के प्रति कार्यनिष्ठा एवं गतिविधियों का अवलोकन किया जाये तो वास्तविकता एकदम विपरीत ही मिलेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि इस मुद्दे की अति गम्भीरता से जाँच की गयी, न जाने कितने पत्र-पत्रिकाओं, चैनेल और पत्रकारों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। अपनी युवा अवस्था में जब पत्रकारिता प्रारम्भ की थी, उस समय फिल्म पत्रकारिता "Yellow Journalism" के नाम से चर्चित थी, परन्तु आज तो समस्त पत्रकारिता ही Yellow दिखाई देती है। यह आरोप नहीं, कुनीन की गोली से कहीं अधिक कड़वा सच है।
https://www.facebook.com/100006925755100/videos/2153360868238084/
वीडियो में बीजेपी के एक विधायक ने पत्रकारों को कहा दलाल और पत्रकारों से पुछने पर बीजेपी विधायक ने बदसलूकी
मीडिया का जनता पर प्रभाव
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वीडियो में बीजेपी के एक विधायक ने पत्रकारों को कहा दलाल और पत्रकारों से पुछने पर बीजेपी विधायक ने बदसलूकी
मीडिया का जनता पर प्रभाव
सत्तर के दशक में वहीदा रहमान और राजेश खन्ना अभिनीत फिल्म "ख़ामोशी" प्रदर्शित हुई थी। सिनेमा हॉल रविवार तक खाली, फिल्म वितरक ने रविवार तक फिल्म के टिकट न बिकने की सूचना मिलते ही दरिया गंज, दिल्ली स्थित मोती महल में फिल्म पत्रकारों को निमन्त्रित किया, क्योकि फिल्म की कास्ट और बैनर को देखते हुए, इस फिल्म के वितरक ने प्रेस को लेशमात्र भी महत्व नहीं दिया था। परिणामस्वरुप अखबारों में फिल्म समीक्षा छपना था कि सिनेमा हॉलों कर भीड़ जमा होनी शुरू हो गयी, और असफल होती फिल्म एक चर्चित फिल्म बन गयी। फिर निर्माता-निर्देशक बी.के.आदर्श की सेक्स शिक्षा पर आधारित भारत की पहली फिल्म आई "गुप्त ज्ञान", जिसे शुरू में सेंसर बोर्ड ने प्रतिबंधित कर दिया था, जिसे तत्कालीन भारतीय जनसंघ अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी एवं चंद्रशेखर आदि अनेकों विभिन्न पार्टियों के नेताओं के हस्तक्षेप उपरान्त फिल्म को पास किया गया था। इस फिल्म में भी निर्माता एवं वितरकों द्वारा प्रेस को खुश किया गया था, परिणाम यह हुआ कि फिल्म के प्रदर्शन के एक सप्ताह उपरान्त, शायद तीन सप्ताह तक दिल्ली के शीला सिनेमा पर दोपहर का शो केवल महिलाओं के लिए रखा गया था। इतना ही नहीं, उस समय के जितने भी महिला कॉलेज थे, सभी में इस फिल्म के स्पेशल शो आयोजित किये गए थे। इस फिल्म का वैश्या बाजार पर भी बहुत बुरा असर पड़ा था, जबतक जनता के दिमाग में इस फिल्म का असर रहा, विवाहित भी आपस में मिलने से डरते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के निकट पार्क, बुद्धा जयंती पार्क आदि में सन्नाटा छा गया था। इन फिल्मों को चर्चित करने में मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है।
मीडिया को दलाल क्यों कहा जाता है?
http://nigamrajendra28.blogspot.in/2017/06/blog-post_57.html
गिरगिट की तरह रंग बदलती मीडिया
मीडिया जिसे लोकतन्त्र का शक्तिशाली चौथा स्तम्भ कहा जाता था, आज उसी मीडिया को दलाल के नाम से सम्बोधित किया जाए, अत्यन्त ही खेद का विषय है। जब दीपावली के शुभ दिन को शंकराचार्य को गिरफ्तार किया गया था, शायद ही कोई मीडिया ऐसा होगा, जिसने इस षड्यंत्र को उजागर किया हो। और जब वही शंकराचार्य कोर्ट द्वारा अपराध मुक्त हुए इस समाचार को उस प्रमुखता से प्रसारित नहीं किया, जिस प्रमुखता से इनकी गिरफ़्तारी और लांझनों को प्रसारित किया गया था। क्या इसको बिकाऊ नाम न दिया जाए तो क्या नाम दिया जाए?
पिछली सरकार के कार्यकाल में जिस तरह हिन्दू साधु, संत और साध्वियों को लांझित किया जा रहा था, उसमे इसी मीडिया ने क्षण भर की भी देरी नहीं कर रही थी। जिसको देखो अपनी TRP से अधिक सरकार की निगाहों में वफादार बनने में प्रयत्नशील थे। सेवानिर्वित होने उपरान्त, एक हिन्दी पाक्षिक का संपादन करते बापू आसाराम की गिरफ़्तारी को षड्यंत्र लिखने वाला केवल मै अकेला पत्रकार था। अपने पुराने कार्यालय से लौटते कमला मार्केट थाने पर मीडिया के जमावड़े को देख, अपने पत्रकार मित्रों से जानकारी लेने पर जब पूछा "बलात्कार हुआ जोधपुर में, FIR दिल्ली में , और अभी पीड़िता के माँ-बाप ने आना है, मुझे कोई षड्यंत्र दिख रहा है।" मेरे पत्रकार मित्रों ने मजाक बनाते कहा "असली पत्रकार तो तुम ही हो, हम तो मक्खनबाजी से पत्रकार बन गए हैं, जाओ भाई जाओ।"
मीडिया का काम है जनता को वास्तविकता से अवगत करवाना न की नेताओं की जी-हज़ूरी से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर जनता को गुमराह या भ्रमित करना। बाबरी कांड को मीडिया ने कितना उछाला, लेकिन उसी मीडिया द्वारा रामसेतू को तोडे जाने के प्रयासों पर चुप्पी साधने को क्या नाम दिया जाए? और इस कड़ी में बड़े मीडिया ग्रुप के अतिरिक्त इतने पत्र-पत्रिकाएं हैं, जिनका नाम भी नहीं सुना होगा जनता ने, लेकिन सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं, क्यों और कैसे? हालाँकि कुछ पर तो सरकारी लगाम लग चुकी है, लेकिन अभी भी बहुत हैं।
यदि सेवानिर्वित एवं वर्तमान पत्रकारों के बैंक खातों की जाँच की जाने पर वेतन से अधिक उनकी चल-अचल संपत्ति मिलेगी। जबकि ईमानदारी की रोटी खाने वाले पत्रकार अपनी संतानों पर आश्रित मिलेंगे।
मीडिया को दलाल क्यों कहा जाता है?
http://nigamrajendra28.blogspot.in/2017/06/blog-post_57.html
गिरगिट की तरह रंग बदलती मीडिया
मीडिया जिसे लोकतन्त्र का शक्तिशाली चौथा स्तम्भ कहा जाता था, आज उसी मीडिया को दलाल के नाम से सम्बोधित किया जाए, अत्यन्त ही खेद का विषय है। जब दीपावली के शुभ दिन को शंकराचार्य को गिरफ्तार किया गया था, शायद ही कोई मीडिया ऐसा होगा, जिसने इस षड्यंत्र को उजागर किया हो। और जब वही शंकराचार्य कोर्ट द्वारा अपराध मुक्त हुए इस समाचार को उस प्रमुखता से प्रसारित नहीं किया, जिस प्रमुखता से इनकी गिरफ़्तारी और लांझनों को प्रसारित किया गया था। क्या इसको बिकाऊ नाम न दिया जाए तो क्या नाम दिया जाए?
पिछली सरकार के कार्यकाल में जिस तरह हिन्दू साधु, संत और साध्वियों को लांझित किया जा रहा था, उसमे इसी मीडिया ने क्षण भर की भी देरी नहीं कर रही थी। जिसको देखो अपनी TRP से अधिक सरकार की निगाहों में वफादार बनने में प्रयत्नशील थे। सेवानिर्वित होने उपरान्त, एक हिन्दी पाक्षिक का संपादन करते बापू आसाराम की गिरफ़्तारी को षड्यंत्र लिखने वाला केवल मै अकेला पत्रकार था। अपने पुराने कार्यालय से लौटते कमला मार्केट थाने पर मीडिया के जमावड़े को देख, अपने पत्रकार मित्रों से जानकारी लेने पर जब पूछा "बलात्कार हुआ जोधपुर में, FIR दिल्ली में , और अभी पीड़िता के माँ-बाप ने आना है, मुझे कोई षड्यंत्र दिख रहा है।" मेरे पत्रकार मित्रों ने मजाक बनाते कहा "असली पत्रकार तो तुम ही हो, हम तो मक्खनबाजी से पत्रकार बन गए हैं, जाओ भाई जाओ।"
मीडिया का काम है जनता को वास्तविकता से अवगत करवाना न की नेताओं की जी-हज़ूरी से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर जनता को गुमराह या भ्रमित करना। बाबरी कांड को मीडिया ने कितना उछाला, लेकिन उसी मीडिया द्वारा रामसेतू को तोडे जाने के प्रयासों पर चुप्पी साधने को क्या नाम दिया जाए? और इस कड़ी में बड़े मीडिया ग्रुप के अतिरिक्त इतने पत्र-पत्रिकाएं हैं, जिनका नाम भी नहीं सुना होगा जनता ने, लेकिन सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं, क्यों और कैसे? हालाँकि कुछ पर तो सरकारी लगाम लग चुकी है, लेकिन अभी भी बहुत हैं।
यदि सेवानिर्वित एवं वर्तमान पत्रकारों के बैंक खातों की जाँच की जाने पर वेतन से अधिक उनकी चल-अचल संपत्ति मिलेगी। जबकि ईमानदारी की रोटी खाने वाले पत्रकार अपनी संतानों पर आश्रित मिलेंगे।

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