योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नक्शे कदम पर चल रहे हैं इसी कारण से वे मुसलमानों को इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं करने वाले हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री आवास पर रोजा इफ्तार का आयोजन नहीं करेंगे। अभी तक मुख्यमंत्री आवास पर यह आयोजन बडे जोर शोर के साथ होता रहा है। योगी आदित्यनाथ अब इस परंपरा को तोड़ने जा रहे हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं करते हैं।
व्हाइट हाउस में इफ्तार पार्टी होती है
गौरतलब है कि इसके पहले भाजपा के मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश में इफ्तार का आयोजन करते थे। जिसमें कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह शामिल हैं। जो मुसलमानों में अपनी पैठ बनाना चाहते थे। लेकिन अब लीक से हटकर योगी आदित्यनाथ चल रहे हैं। योगी आदित्यानाथ गोरखनाथ मंदिर के महंत हैं और उन्होंने कभी इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं किया।
ऐसे में अब इफ्तार पार्टी का आयोजन देने का अब भी कोई योजना नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इफ्तार पार्टी का आयोजन करते थे लेकिन इस परंपरा को नरेंद्र मोदी ने तोड़ा और इफ्तार पार्टी नहीं दी। योगी आदित्यनाथ भी इसी नक्शे कदम पर चल रहे हैं। गौरतलब है कि देश की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी उत्तर प्रदेश में रहती है।
योगी इफ्तार का आयोजन नहीं करेंगे
यह दूसरी बार है कि 1974 में हेमवती नंदन बहुगुणा के समय से चली आ रही परंपरा को तोड़ा जा रहा है। इसके पहले राम प्रकाश गुप्ता ने यह परंपरा तोड़ा था जब उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं किया। निश्चित तौर पर मुस्लिम संगठनों का इस बात को लेकर नाराजगी है कि जब पूरे विश्व में यहां तक कि व्हाइट हाउस में इफ्तार पार्टी होती है जो भाई चारे का संदेश देता है।
यहां आयोजन न करना गलत संदेश देता है। लेकिन योगी आदित्यनाथ अपने हिंदूत्व की छवि को किसी कारण से दाग नहीं लगने देना चाहते हैं और इसमें एक कदम आगे बढ़ाते हुए इफ्तार का आयोजन नहीं करेंगे जिससे की साफ हो जाए कि उनका दृष्टिकोण आज भी साफ है।
रोज़ा इफ्तार की लालसा करने वाले क्या भाजपा को वोट देते हैं?
ऐसी परिस्थिति में एक प्रश्न मुस्लिम समाज से उत्तर मांगता है, कि वोट देते समय भाजपा को मुस्लिम विरोधी करार देते हैं, लेकिन रोज़ों में उसी भाजपा से रोज़ा इफ्तार की आस लगाते हैं, क्यों? इस दोगली नीति का कब अंत होगा? यह मुस्लिम समाज पर आरोप नहीं कटु सत्य है, जिसका समाधान किसी और को नहीं, केवल मुस्लिम समाज को ही करना है। अभी दिल्ली में संपन्न हुए नगर निगम चुनावों में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों की जमानत तक ज़ब्त हुई। उम्मीदवार हिन्दू था या मुसलमान, उम्मीदवार भाजपा का था। भाजपा उम्मीदवार हिन्दू क्षेत्रों से जीतता हुआ आता है,लेकिन मुस्लिम क्षेत्र शुरू होते ही, अपनी जीत को पक्का करने की बजाए जमानत जब्त की ओर धकेल दिया जाता है, क्यों? चुनावो में हार-जीत चलती है, लेकिन जीत की ओर अग्रसर उम्मीदवार की जमानत ज़ब्त होना, उम्मीदवार के साथ-साथ भाजपा की भी बेइज़्ज़ती है। अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ तक के कार्यकर्ता तक बिना पैसे के मैदान में नहीं आते। इसको छलावा नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए। यूँ कहते फिरते है, कि हम तो इतने वर्षो से भाजपा के साथ हैं, यह साथ होना नहीं होता, इसको कहते हैं, भाजपा के नाम पर सत्ता का सुख भोगो, लेकिन वोट किसी और को।

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