आम आदमी पार्टी को पहले 28 और फिर 67 सीटें मिलने पर अपने एक लेख में लिखा भी था कि "जिस तेजी से यह पार्टी उभर कर आयी है, उतनी ही तेजी से इसका पतन निश्चित है। दूसरे यह कि 67 सीटें जरूर हैं, लेकिन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी।" लगता है, उस समय लिखा आज चरितार्थ होने को ललायित है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने जब राजनीति में कदम रखा था तब जनता को पूरा विश्वास था कि अब उनको राजनीति में एक ऐसा प्रतिनिधि मिलने वाला है जिसके लिए आम जन की समस्या और उसका उचित सुझाव ही उद्देश्य होगा| शायद यही कारण भी था कि अरविन्द केजरीवाल के इन दोगले वादों के झांसे में फंसी दिल्ली की जनता ने सालों से दिल्ली पर अपनी हुकूमत कर रही शीला दीक्षित से दिल्ली की कुर्सी छीन कर केजरीवाल को दे दी|जिस शीला के विरुद्ध दिल्ली चुनावों में 370 आरोप जनता को दिखाकर जेल भेजने की बात किया करते थे, सत्ता हाथ आते ही बोले जिसके पास शीला के विरुद्ध कोई सबूत हैं, मुझे दें, कार्यवाही करूँगा। अब कोई उनसे पूछे कि "क्या चुनावों में कश्मीर की धारा 370 लिए जनता को पागल बना रहे थे।"
लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि जिस अरविन्द केजरीवाल को जनता ने इतने विश्वास के साथ दिल्ली का दारोमदार सौंपा था वो सिर्फ और सिर्फ घोटालों में ही लिप्त रहे हैं| सत्ता में आने के बाद केजरीवाल और उनकी सरकार का ऐसा शायद ही कोई दिन बीता हो जब उनका कोई घोटाला सामने न आया हो| ऐसे में इन्ही खुलासों में शुंगलू समिति ने केजरीवाल के प्रशासनिक फैसलों में संविधान और प्रक्रिया संबंधी नियमों के उल्लंघन की ऐसी पोल खोली है जिसे जानकर देश की जनता को बड़ा झटका लग सकता है|
दरअसल इस बड़ी बात का खुलासा शुंगलू समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में उजागर किया है जिसके अनुसार सितंबर 2016 में तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा केजरीवाल सरकार के फैसलों की समीक्षा के लिए बनी शुंगलू समिति ने सरकार के कुल 440 फैसलों से जुड़ी फाइलों को खंगाला है और इनमें से 36 मामलों में फैसले लंबित होने के कारण इनकी फाइलें सरकार को लौटा भी दी गई थीं|
इस सनसनीखेज रिपोर्ट के मुताबिक दूसरी बार सत्ता में आई केजरीवाल की आप पार्टी ने कानून और संविधान में निर्धारित दिल्ली सरकार की कई और शक्तियों का जमकर दुरुपयोग किया है| इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के 25 फरवरी 2015 के उस बयान की भी मदद ली गयी है जिसमे उन्होंने कहा था कि, “कानून व्यवस्था पुलिस और जमीन से जुड़े मामलों की फाइलें ही उपराज्यपाल की अनुमति के लिये वाया मुख्यमंत्री कार्यालय भेजी जायेंगी|”
यही नहीं इस रिपोर्ट में अधिकारियों के तबादले, उनकी मनमानी जगह पर तैनाती और अपने ख़ास और चुनिन्दा लोगों की तमाम पदों पर नियुक्ति करने जैसे अधिकारों के दुरुपयोग का भी जिक्र किया गया है| इसमें स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन की बेटी को एक सरकारी अभियान की मिशन अफसर बनाने, सरकारी संपत्ति के आवंटन सहित अन्य मामले शामिल हैं।
रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है कि तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग ने दिल्ली सरकार के क्षेत्राधिकार के बारे में मुख्यमंत्री केजरीवाल को नसीहत भी दी थी, हालाँकि इस नसीहत के विपरीत 29 अप्रैल को मुख्यमंत्री के सचिव की ओर से सभी विभागों को निर्देश जारी कर कहा गया कि जमीन, कानून व्यवस्था और पुलिस से जुड़े मामलों को छोड़कर विधानसभा के विधायी क्षेत्राधिकार में आने वाले सभी मामलों पर सरकार बेबाकी से फैसले कर सकेगी जबकि जमीन, कानून व्यवस्था और पुलिस से जुड़े मामलों में उपराज्यपाल की पूर्वानुमति से पहले संबद्ध फाइल को मुख्यमंत्री के मार्फत ही उपराज्यपाल के पास भेजा जाए। यहाँ तक कि रिपोर्ट में आला अधिकारियों के तबादलों में भी उपराज्यपाल की अनदेखी की लिस्ट दी गयी है।
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