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राजौरी गार्डन उप-चुनाव में किसकी हार

-विनोद बंसल
                                    Vinodbansal0!@gmail.com @vinod_bansal
गत सप्ताह यूं तो अनेक राज्यों में हुए विधान सभा के उप चुनावों के परिणाम आए किन्तुराजधानी दिल्ली के राजौरी गार्डन विधान सभा क्षेत्र के उपचुनाव का परिणाम अपने आप में अप्रत्याशित तथा मतदाता की दूरगामी सोच को दर्शाता है। यह परिणाम एक दृष्टि से न तो भाजपा की जीत है और ही कांग्रेस या आम आदमी पार्टी की हार। 
एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता की प्रेस वार्ता मेंउसके ऊपर सरे-आम जूता फैंककरपत्रकार से राजनेता बनेपूर्व विधायक जरनैल सिंह द्वारा राजौरी गार्डन की जनता का तिरस्कार किया जाना भी इस हार का कारण नहीं माना जा सकता है। हालांकिजनता को धोखा व इस सीट को तिलांजलि देकर वे पंजाब में चुनाव लड़ने चले गए थे। राजौरी गार्डन क्षेत्र वैसे पंजाबी बाहुल्य क्षेत्र है और पंजाब चुनाव की सभी विद्याओं का प्रयोग इस चुनाव के दौरान भी इस खास समुदाय के लोगों को रिझाने हेतु किया गया। किन्तु चतुर सुजान जागरूक मतदाताओं के आगे किसी की एक न चली।

भ्रष्टाचार में आकंठ ढूबी राजसत्ता से त्रस्त जनता ने इस अभिशाप से मुक्ति हेतु दो वर्ष पूर्व जिस अपूर्व बहुमत से अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी में विश्वास व्यक्त कियाउसकी प्रति पूर्ति शायद नहीं हो सकी। वल्कि जनता को लगा कि जो भ्रष्टाचार उन्मूलन का वादा कर सत्ता में आए, आज उसी दल के 67 में से 35 विधायक किसी न किसी गैर कानूनी/अनैतिक/भृष्टाचारी या महिला उत्पीड़न की गति विधियों में लिप्त पाए गए। जेएनयू/हैदरावाद/दिल्ली विश्व विद्यालय जैसे अनेक शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों की पढ़ाई का अमूल्य समयदेश द्रोहियों के भारत विरोधी नारे तथा 'भारत की बर्वादी तक जंग रहेगी- जंग रहेगीजैसे कुकृत्यों में बर्वाद हो गया। मात्र क्षुद्र राजनैतिक लाभ के लिएकिसानों को आत्म हत्या के लिए उकसाकर उसका लाइव प्रसारण दिल्ली सरकार के लगभग पूरे मन्त्रिमण्डल की देखरेख में हुआ। पूर्ण शराब-बन्दी का नारा देकर बहुमत प्राप्त करने वालों ने आते ही न सिर्फ धड़ाधड़ दारू के ठेके खोले वल्कि दिल्ली के युवाओं  को नाइट लाइफ के नाम पर ड्रग्स के नशे में धकेलने का काम हुआ। यानीशराब मुक्त दिल्ली की जगह शराबी दिल्ली बनाने का सिलसिला चला। बात बात पर जनमत संग्रह करने व संविधान की मर्यादा की दुहाई देने वालों ने, न सिर्फ जनतांत्रिक संस्थानों व संवैधानिक पदों (प्रधान मंत्रीउप-राज्यपाल इत्यादि)  बल्कि भारतीय न्यायालयों व स्वयं संविधान के साथ चुनाव आयोग तक की गरिमा को तार तार करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
महिलाओं की सुरक्षा हेतु गार्ड व सीसीटीवी कैमरे इत्यादि के साथ विविध बन्दोबस्त करने के स्थान पर इनके विधायक व मंत्री स्वयं महिला उत्पीड़न की हदें पार करते देखे गए। मुस्लिम तुष्टीकरण में हमारा विश्वास नहीं हैयह कहने वालेगत दो वर्षों में हमेशा हर मुस्लिम त्योहार पर गोल टोपी लगा कर सबसे पहले फोटो खिंचवाकर अखवारों में छपे दिखे। उप-राष्ट्रपति व उप-राज्यपाल (जो दोंनों ही मुस्लिम) चाहे न लगाएँ किन्तु मुख्य-मंत्री के सर पर जालीदार टोपी का ही प्रदर्शनं होता रहा. दिल्ली में हिन्दुओं पर अनेक जिहादी हमले हुए किन्तु उन सभी कि नजरंदाज करते हुए राज्य के कर्णधार जिहादियों  के दर पर मत्था टेकते या दिल्ली से बाहर अपनी राजनैतिक रोटियां सकते ही नजर आए। दिल्ली के लोगों के प्रति अपनी जिम्मेवारियों को त्याग गोआपंजाबबिहारगुजरात और न जाने कितने राज्यों में अपनी टांग अड़ाते रहे। कश्मीरी अलगाववादियों के महिमामंडन के साथ हिन्दू मानविन्दुओं पर कुठाराघात में भी इन्होंने सदैव अग्रणी भूमिका निभाई। वास्तव में मीडिया की इस कृति को सोशल मीडिया के दबाव के कारण जब मुख्य मीडिया द्वारा नँगा किया जाने लगा तो दिल्ली के कर दाताओं की खून पसीने की कमाई के करोड़ों रुपयों को इन्होंने विज्ञापन व एडवटोरियल के माध्यम से मिथ्या प्रचार में स्वाहा कर दिया।
जिस दिल्ली की जनता ने 2014 में 46%वोटों से जिताया आज उसका उम्मीदवार जीतने व हारने की बात तो दूर पार्टी के कुकर्मों के कारण जमानत तक नहीं बचा सका। यह चुनाव परिणाम आगे क्या गुल खिलाएगा या दिल्ली के मतदाताओं को कितना प्रभावित करेगा यह तो चुनाव परिणामों के बाद ही पता चलेगा किन्तु इतना साफ है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढती और न ही स्वयं को सुधारे बिना दूसरों पर उंगली उठाने या अनर्थक व अनर्गल आरोपों से किसी का कोई भला होने वाला है।
दिल्ली की जागरूक जनता ने किसी को जिताया या नहीं यह तो नहीं पता किन्तु, हाँ, हराया अवश्य है। जनता ने हराया है विचार को जो अलागावावाद को हवा देने, जनता को धोखा देने, संवैधानिक पदों का दुरुपयोग करने, अराजक तत्वों का साथ देने, गरीवों का मजाक उड़ा उन्हें आत्महत्या तक को उकसाने के साथ भ्रष्टाचार, नशाखोरी, महिला उत्पीडन जैसी मूलभूत समस्याओं को कम करने के स्थान पर उन्हें बढ़ावा देने लगा था। लिहाजाऐसे लोगों को अब जनता से माफी मांग कर उसकी सेवा में जुट जाना चाहिए।


लेखक एक विचारक व समाज सेवी होने के अतिरिक्त विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

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