निष्कासित किये गए कार्यकर्ताओं में 5 निवर्तमान पार्षद भी हैं जिनके नाम - रान्होला से डॉ पंकज सिंह, नवादा से कृष्णा गहलोत, सागरपुर वेस्ट से प्रवीन राजपूत, पटपडगंज से संध्या वर्मा, न्यू अशोक नगर ने निक्की सिंह हैं. ये सभी नेता पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे.
इनके अलावा दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष मनोज चौधरी को भी पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से निष्कासित कर दिया गया.
जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली MCD में 5 साल से बीजेपी का शासन है, वर्तमान पार्षदों के खिलाफ लोगों में नाराजगी थी जिसकी वजह से दिल्ली बीजेपी ने फैसला किया कि किसी भी वर्तमान पार्षद या उसके रिश्तेदार को टिकट नहीं दिया जाएगा, इस बार फ्रेश लोगों और पार्टी के मेहनती कार्यकर्ताओं को ही पार्षद का टिकट दिया जाएगा.
कुछ बीजेपी कार्यकर्ताओं और पार्षदों को यह फैसला नागवार गुजरा और उन्होंने पार्टी से विद्रोह कर दिया और निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया, कुछ बीजेपी नेता कांग्रेस और AAP में शामिल हो गए तो कुछ पार्टी के अन्दर रहकर पार्टी का भेद खोलने लगे, आज करीब 21 कार्यकर्ताओं को पार्टी से बाहर कर दिया गया.
जानकारी के लिए बता दें कि 23 अप्रैल को MCD के 272 वर्षों पर चुनाव होंगे और 26 अप्रैल को नतीजे आ जाएंगे, MCD चुनाव जीतने के लिए बीजेपी, कांग्रेस और AAP ने पूरी ताकत लगा दी है।
अवलोकन करें :--
तिवारी जी निम्न लेख मात्र एक झांकी है :--
वैसे तो पार्टी का यह कदम उचित है, लेकिन पार्टी उन लोगों को पहचानने में आज तक पूर्णरूप से असफल ही रही है, जो केवल नेताओं की निगाहों में बने रहने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों से गुमराह कर धरातल पर पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसा नहीं है, कि कोई उन्हें जानता नहीं, मण्डल स्तर से लेकर उच्च स्तर तक सब जानते-पहचानते हैं। उपरोक्त लेख केवल एक झांकी है, तिवारी जी ; ट्रेलर और फिल्म अभी बाकी है।
तिवारी जी आपने इनको पार्टी से निकाल दिया, कोई बात नहीं, लेकिन क्या एक बार कारण जानने का प्रयास किया? कार्यकर्ता पार्टी में रहता है, पार्टी के नियम और आदेशों का पालन करता है, लेकिन जब चुनावों में उनके सिर बाहरी उम्मीदवार थोप दिया जाए, उस स्थिति में मण्डल नेता या कार्यकर्ता क्या करेगा? क्या मण्डल में कोई योग्य कार्यकर्ता आपको नहीं मिला या आपने चापलूसी के कारण उनको नज़रअंदाज़ कर दिया गया। फिर पार्टी में अपनी जीविका का अंश खर्च करने उपरान्त नेताओं से निराशा मिले, उस स्थिति में कार्यकर्ता क्या करेगा? यह चिन्तन एवं मंथन का विषय है।
हकीकत में हो क्या है, नरेंद्र मोदी जी के करिश्मे पर नेता भी कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं को अनदेखा करते रहे हैं , कार्यकर्ताओं की केवल उन्ही बातों को सिर-माथे लिया जाता है, जहाँ उनको कुछ लाभ होने की कामना हो। लेकिन कुछ काम ऐसे होते हैं, जहाँ नेता किसी भी कार्यकर्ता से बोलने में संकोच करने के चक्कर में उस काम को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। कहने को बहुत कुछ है, लेकिन सीमाओं में बंधा हूँ।
मतदान तिथि सिर पर है, लेकिन कुछ उम्मीदवारों को, सुनने में आया है, पार्टी से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली है क्यों? क्या उच्च अधिकारी उन उम्मीदवारों को चुनाव हरवाना चाहते हैं? जबकि अन्य पार्टियाँ के दैनिक भत्ता पर लोग घर-घर प्रचार कर रहे हैं और भाजपा के बेज़ारे उम्मीदवार अपने चंद कार्यकर्ताओं के कंधे अपना प्रचार कर रहे हैं। कुछ उम्मीदवारों की तो स्थिति ऐसी है "नंगी क्या नहाय और क्या निचोड़े"; जब पार्टी ने टिकट दिए है, उनके प्रचार के लिए संसांधन जुटाने का काम पार्टी का ही है, बाद में कोई यह न कहे, कार्यकर्ताओं ने जी-जान से काम नहीं किया।

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