
स्वदेशी जागरण मंच करोल बाग द्धारा राष्ट्रीय स्वदेशी सुरक्षा अभियान विषय पर जनवरी 24 को बलकेशवर मंदिर, अजमेरी गेट पर यशवंत सिंह चौहान, झण्डेवाला विभाग,संयोजक व प्रचार प्रमुख, दिल्ली की अध्यक्षता एवं सुनील बंसल,जिला संयोजक करौल बाग के संचालन में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।
गोष्ठी संचालन का श्री गणेश करते यशवंत ने कहा कि चीन से हमारा विरोध उसकी भारत विरोधी गतिविधियों के कारण किया जा रहा है। चीन शुरू से ही साम्राज्यवाद देश रहा है। दूसरे देशों की ज़मीन हड़पना, चीन की नीति रही है। 1962 युद्ध में 38000 वर्ग कि. मी. ज़मीन पर कब्ज़ा करना, 1963 में पाकिस्तान को कब्जाए कश्मीर की ज़मीन का भारत विरोधी गतिविधियों के लिए प्रयोग करना, आतंकवादी गतिविधियों में पाकिस्तान का समर्थन करना, नेपाल से 174 भारतीयों को लेकर आ रहे हवाई जहाज, को आतंकवादी हाइजैक कर चंडीगढ़ से लाहौर ले गए, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण लाहौर में उतरने की इजाजत नहीं मिलने के कारण अफ़ग़ानिस्तान ले गए। इस काम को करने का सरगना मौलाना मसूद अजहर आतंकवादी ने भारत को जेलों में बंद आतंकवादियों को छोड़ने की शर्त रखी, जिसे भारत ने यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता के मद्देनज़र छोड़ दिया। लेकिन आज जब भारत यूएनओ में मसूद को भारत के सुपुर्द करने का प्रस्ताव रखता है, चीन उसका विरोध करता है। उन्होंने आगे बताया कि स्वदेशी जागरण मंच इन्ही कारणों से 1991 से कर रहा है।
जब दीपावली पर भारतवासियों ने चीन से आयी आतिशबाज़ी को नज़रअंदाज़ कर शिवाकाशी की निर्मित आतिशबाज़ी का प्रयोग करने पर चीन की अर्थव्यवस्था को 6 वर्ष पीछे कर दिया। अमेरिका की फोर्ब्स मैगज़ीन ने भारत के इस कदम की “गांधी जी के आंदोलन” से तुलना करते लिखा “भारत के केवल एक ही कदम से चीन की वित्तीय 30 प्रतिशत गिर गयी है।” ऐसा नहीं हमारी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है, आयात शुल्क में बदलाव करने से चंडीगढ़ कर कम्बल व्यापार में ही वृद्धि नहीं हो रही, भारत में स्टील व्यवसाय, शिवाकाशी में अतीशबाज़ी, सूरत में साड़ी, हमारे हथकरखा उद्योग भी गतिमान होने लगे हैं। दीन दयाल उपाध्यय की एक उक्ति “लोकतंत्र में जिस प्रकार जनता को वोट देने का अधिकार है, उसी भांति भारत की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो जनता की भागीदारी होनी चाहिए” का उल्लेख करते, यशवंत चौहान ने गोष्ठी के शांत एवं सुखद वातावरण में चलने की कामना की।
गोष्ठी में मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविधालय के डॉ हिमांशु रॉय ने बहुत ही सुन्दर और विस्तृत तरीके से चीन द्धारा प्रभावित होती भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डालने का प्रयास किया। चीन द्धारा भारत के खिलाफ काम करने के कारणों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि चीन हमारे साथ ऐसा क्यों कर रहा है, इसे जानने के लिए हमें पीछे इतिहास में जाना पड़ेगा। माओ जो चीन के सचिव थे, उन्होंने अपने इतिहास के बारे में 2/3 बातें कहीं, ज्यादा नहीं, केवल 4/5 पृष्ठ में है ; और उनसे हमें सीखना चाहिए। चीन की पुरानी परम्परा है, जैसे हम 82/83 प्रतिशत हिन्दू हैं ,उसी भाँति वहाँ भी राष्ट्रवादी हैं, वह लगभग 88/90 प्रतिशत है। जब हम चीन का नक्शा देखें तो चीन का 50 प्रतिशत बाहरी क्षेत्र जो भारत से सटा हुआ है, जैसे बर्मा, रूस, मंगोलिया यहाँ चीनी नहीं दूसरी जाति एवं धर्म के मानने वाले है। उसी तरह जिसे हम तिब्बत कहते हैं, लेकिन तिब्बत भारत और रूस से भी सटा हुआ है। यह 50 प्रतिशत क्षेत्र है, जहाँ आय के संसाधनों की भरमार है। लेकिन चीन उन संसाधनों का उपयोग करने में लेशमात्र भी संकोच किये बिना अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृठ करता रहा। और मूल चीनी थे वह वैली में रहते थे, जैसे-जैसे उनकी संख्या में वृद्धि होती गयी, यह लोग दूसरे क्षेत्रों में फैलते गए। लेकिन अपने संसाधनों का भरपूर उपयोग करते रहे। जिस कारण चीन में रोजगार के साधन भी उपलब्ध होते रहे।
अपने लगभग 40 मिनट के उद्गारों में डॉ रॉय ने बताया कि हम यानि भारतीय रोजगार के लिए कभी श्रीलंका चले गए तो कभी कहीं। जिस कारण जो लाभ भारत को अपने युवाओं की कार्यकुशलता का मिलना चाहिए था, वह दूसरे देशों को मिलता रहा, जबकि चीन ने अपने नागरिकों की कार्यकुशलता, चाहे किसी भी क्षेत्र में हो, उसका भरपूर लाभ उठाया। यही कारण है कि आज चीन व्यावसायिक दृष्टि से विश्व बाजार में छाया हुआ है। देखिये 1सितम्बर 1949 में चीन अपने अस्तित्व में आया और हम 15 अगस्त 1947 को, फिर भी चीन हमारे से आगे निकल गया, क्योंकि चीन में जो फैलने की जो प्रवत्ति है, वह चीन को आत्मनिर्भर बना रही है और बनाया भी है।1964 आते-आते चीन हमसे बहुत आगे निकल गया। जबकि वहाँ सूखा भी पड़ा, सत्ता की लड़ाई में दो/तीन बार जबरदस्त उतार-चढ़ाव आने के बावजूद हमसे आगे निकल गया। चीन न्युक्लेअर 1964 में और हम 1972 में परिक्षण करते हैं । जबकि शिक्षा और तकनीक में हम चीन से बहुत आगे थे और हैं भी। लेकिन चीन ने अपने नागरिकों की कार्यक्षमता का भरपूर लाभ लिया। अभी हम सड़क, बिजली और पानी के लिये सोंच ही रहे हैं लेकिन चीन लन्दन तक ट्रैन लेकर पहुँच गया। हम इसके लिए चीन को दोष नहीं दे सकते। इसके ज़िम्मेदार हैं, जवाहर लाल नेहरू। नेहरू की असफल विदेश नीतियाँ। चीन हमारे तिब्बत को हड़प रहा था और नेहरू यूएनओ में सुरक्षा समिति में चीन को प्रोत्साहित कर रहे थे। किसी भी क्षेत्र को लें ,चीन हमसे बहुत आगे है, अपने व्यवसाय को व्यापक स्तर पर ले जाकर और दूसरे देशों से सस्ता माल विश्व में दे रहा है। क्यों नहीं, हम भारतीय चीन से सस्ता और उत्तम माल विश्व पटल पर रख अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृठ करें। हमारे पास भी किसी तरह के संसाधन की कमी नहीं। फिर क्यों हम हर उत्पात के लिए चीन पर निर्भर रहे। अपनी अर्थव्यवस्था को क्यों कमजोर करें।
आज भारत किसी भी स्तर पर किसी भी अन्य देश से पीछे नहीं, चाहे चीन ही क्यों न हो। चीनी उत्पात के भारत में आने से हमारे ही कुटिल एवं लघु उद्योग समाप्त हो रहे हैं। हम संकल्प करें कि हम चीन तो क्या किसी भी अन्य देश की तरफ देखने की बजाए अपने ही देश के उत्पादनों का प्रयोग कर अपने उद्द्योगों को विश्व पटल पर चर्चित करें, डॉ रॉय ने कहा।
छत्रसाल ज़िले की महिला प्रमुख, सुश्री जयश्री ने अति संक्षिप्त ने उपस्थित लोगों को स्वदेशी वस्तुओं की महानता एवं गुणवत्ता के विषय में जानकारियां से अवगत करवाया। भारत में उत्पादित साबुन, तेल, चाय, मंजन, टूथपेस्ट, खिलौने चीन से कहीं अधिक गुणकारी है।
गोष्ठी में उपस्थित देवेंद्र यादव ने बताया कि चीन वास्तव में हमारे कुटीर उद्द्योग जैसे पतंग और उसमे प्रयोग होने वाली डोर तक को क्षति पहुंचा कर लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा है। उसमे कुछ दोष केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों का भी है, जो इनके उत्पादन को प्रोत्साहित नहीं करती।
कमल कपूर ने प्रश्न मुद्रा में पूछा कि ऐसी कौन ही मजबूरी है कि आज हमें एक सुई और आलपिन भी चीन निर्मित प्रयोग करना पड़ रहा है।
सुनील बंसल ने कहा नेहरू जी कहते थे “हिन्दी चीनी भाई-भाई” और चीन ने क्या दिया 1962 में युद्ध।” डॉ रॉय के अनुसार वास्तव में चीन और पाकिस्तान दोनों ने हर कदम पर भारत के साथ विश्वासघात ही करते रहे हैं। फिर किस आधार पर वहां के उत्पादन को प्रोत्साहन देकर अपने ही व्यापार को क्षति पहुंचाकर बेरोजगारी को बढ़ावा दें।
मनीष गोला जो पेशे से एक छोटे कारोबारी है, ने बताया की चीन उत्पादन के कारण उनके एवं उन जैसे छोटे उद्योग करने वालों को रोटी खानी मुश्किल हो रही है। जबकि चीन के किसी भी उत्पाद की कोई गारंटी नहीं।
पवन शर्मा ने गोष्ठी में उपस्थित सज्जनों से बहुत ही विन्रम शब्दों में चीन द्धारा निर्मित किसी भी उत्पात का बहिष्कार करने का आव्हान किया। जब हम चीन का कोई सामान ही नहीं खरीदेंगे कोई व्यापारी मंगवाएगा क्यों? हर बात के लिए सरकार पर ही दोष मडना भी उचित नहीं।
संजय सैनी ने डॉ रॉय की कही बातों पर गंभीरता दर्शाते बोले, जो गलती नेहरू ने की आज सरकार क्या उनको दोहराएगी या राष्ट्रहित में स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहन देने छोटे दुकानदारों, उद्योग धंधो को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी? कल तक सोने की चिड़िया के नाम से जाने वाला भारत इतना असहाय क्यों?
ठण्ड में अधिक रात्रि होते देख, विवश होकर अध्यक्ष को गोष्ठी को विराम देने का आग्रह करते अपने उद्बोधन में कहा कि जापान हिरोशिमा कांड का शिकार होने के बावजूद एक विकसित देश बन गया, किसी देश से सहायता नहीं ली। जापान में अमेरिका से समझोते के कारण बाजार में सतंरे आये लेकिन वहा के समाज,जनता ने तय किया की वो उन्हें नहीं खरीदेगें जिससे उन्होनें उन सतंरो को सुमन्द्र में फैकने पडें। क्योकि उनका माना था कि उनके देश की पूंजी विदेश चली जायेगी।
आज चीन विश्व बाजार में छाया , फिर हम क्यों पीछे रहे? भारत भी अपना मोबाइल विश्व पटल पर लाएगा, हम चीनी उत्पात का बहिष्कार कर अपने ही उपक्रम और उत्पात प्रयोग करें। विदेश हमारे ही कच्चे माल को खरीद नया रूप देकर मनमानी कीमत वसूलते है और हम विदेशी नाम देख अपने ही माल को हीन भावना से देखते है। एफडीआई से किसी भी सरकार का भला नहीं होने वाला।
हमारे युवा यहाँ प्रशिक्षित होने उपरान्त यहीं अपनी प्रतिभा के जौहर दिखाकर भारत को विश्व गुरु बनाने में अपना योगदान प्रदान करें। क्योंकि जिस उद्धेश्य को लेकर स्वदेशी जागरण मंच कृतसंकल्प है वह केवल तभी संभव होगा जब हर नागरिक चीनी उत्पादनों का बहिष्कार कर भारतीय उत्पादनों का प्रोत्साहन दें। जिस तरह जापान की जनता ने अमेरिका से आये संतरों के साथ किया। आतिशबाज़ी हो या अन्य उत्पाद भारतीय ही प्रयोग करने के लिए अपने परिचितों को भी बाध्य करें। केवल तभी भारत, जैसा गोष्ठी में अभी एक बंधू ने सोने की चिड़िया वाली बात कही, वह केवल तभी फलीफूत होगी जब हम चीनी माल का बहिष्कार करेंगे। विषय की गम्भीरता को परखते आगामी नवम्बर माह में दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में एक प्रचंड आयोजन करने की योजना है। जब जनता कृतसंकल्प कर लेगी भारत भी स्वाभिमानी बन जायेगा। गोष्ठी को इतने शांत वातावरण में चलने के लिए स्वदेशी जागरण मंच, करोल बाग़ झण्डेवाला की ओर से साधुवाद स्वीकार करें।
गोष्ठी को इतने सौहार्द वातावरण में चलते देख इतना आभास होने लगा कि एक सख्त प्रशासक के सत्ता में होने से जनता में कितना रोष है, जो अपने देश के स्वाभिमान के लिए कितना विचलित है।





Comments