सारे मामले का आंकलन किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि शायद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को पहले से भनक थी कि वे चुनाव चिन्ह पर दावे के लिए जो प्रक्रिया अपना रहे हैं वह बेहद कमज़ोर है और चुनाव चिन्ह और पार्टी का नाम उनके पुत्र अखिलेश यादव को मिल जाएगा । चुनाव आयोग के समक्ष जो चीजें रखी गयीं उन पर सिर्फ तीन लोगों मुलायम, शिवपाल और अमर सिंह के बीच ही चर्चा हुई जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, विधायको, एमएलसी, जिला पंचायत अध्यक्षो, पंचायत सदस्यो की एक बैठक बुलाकर उसमे चुनाव आयोग के समक्ष पेश किये जाने वाले दावे पर आम राय बनाने के बाद सभी के हस्ताक्षर कराये जाने चाहिए थे । एक हलफनामा मुलायम की ओर से दिया गया लेकिन न तो शिवपाल यादव ने, न ही अमर सिंह ने मुलायम के लिए हलफनामा पेश किया। साइकिल निशान के लिए अखिलेश ने 4 हजार 716 हलफनामा पेश किए जिससे साफ था कि पार्टी पर अखिलेश की जबर्दस्त पकड़ बनी हुई है।
भले ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खेमे में विधायको और एमएलसी की तादाद अधिक थी लेकिन यदि मुलायम बुलाते तो शायद कोई ही ऐसा होता जो उनकी बैठक में न आता । वहीँ सपा मुखिया इस पूरे मामले को अखिलेश और शिवपाल की लड़ाई के तौर पर पेश करते रहे । यही कारण था कि अखिलेश के खेमे में सिधायको की तादाद बढ़ती चली गयी ।
एक हलफनामा मुलायम की ओर से दिया गया लेकिन न तो शिवपाल यादव ने, न ही अमर सिंह ने मुलायम के लिए हलफनामा पेश किया। साइकिल निशान के लिए अखिलेश ने 4 हजार 716 हलफनामा पेश किए जिससे साफ था कि पार्टी पर अखिलेश की जबर्दस्त पकड़ बनी हुई है।
सपा मुखिया मुलायम सिंह के पास आज़म खान, बैनी प्रसाद वर्मा और राजेंद्र चौधरी जैसे सपा नेता भी थे जो कहीं न कहीं अखिलेश यादव के करीबी और मुलायम सिंह के वफादार माने जाते हैं । यदि मुलायम चाहते तो कहीं न कहीं बीच का रास्ता भी निकाल सकते थे लेकिन उन्होंने पूरी लड़ाई को सपा के विभाजन से हटाकर अखिलेश और शिवपाल पर केंद्रित कर दी ।
सपा सुप्रीमो मुलायंम सिंह यह कह कर पल्ला झड़ते रहे कि अखिलेश अपनी ज़िद्द पर अड़े हैं । शायद उन्होंने यह नही सोचा कि अखिलेश को राजनीति के आये अभी कितने दिन हुए हैं ? इसलिए यदि मुलायम सिंह यादव कहते तो अखिलेश उसको टाल ही नहीं सकते थे । पूरे फसाद का यही वह पहलु है जहाँ से सारा प्रकरण एक नूरा कुश्ती जैसा प्रतीत होता है ।
पार्टी और चुनाव चिन्ह बेटे को विरासत जैसी :
यदि पूरे प्रकरण में दूसरा एंगिल टटोला जाए तो एक बात बड़ी साफ़ दिखाई देती है । सम्भवतः सपा मुखिया को यह चिंता रही होगी कि उनकी गैर मौजूदगी में सपा का क्या होगा ? क्या उनके भाई उनके बेटे को सपा की अगुवाई करने देंगे ? और यह प्रश्न हर पिता सोचता है तो यदि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने भी सोचा हो तो कोई हर्ज नहीं ।
फिलहाल चुनाव आयोग का फैसला आने के बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की यह चिंता खत्म हो गयी, अब पार्टी और चुनाव चिन्ह दोनो उनके बेटे के पास हैं । वहीँ अब मुश्किल में उनके भाई शिवपाल फंसे हैं । उनके पास न तो समाजवादी पार्टी का नाम है और न ही चुनाव चिन्ह है । ऐसे हालातो में वे भले ही मुलायम सिंह को चुनाव में प्रोजेक्ट क्यों न करें लेकिन उन्हें खासी दिक्कत होगी। चुनाव चिन्ह और पार्टी का नाम अखिलेश खेमे के पास जाने से शिवपाल के राजनैतिक भविष्य पर भी बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया है ।
चुनाव मैदान में समाजवादी आमने सामने होंगे :
जैसी की चर्चा चल रही है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव अब नए चुनाव चिन्ह के लिए सुनील सिंह वाले लोकदल से गठबंधन करके लोकदल के चुनाव निशान पर भी चुनाव लड़ सकते हैं । मुलायम सिंह यादव का लोकदल से पुराना कनेक्शन रहा है । वे 1980 के दशक में लोकदल से जुड़े थे, तब वह इसी पार्टी से चुनाव लड़ते थे.। मुलायम सिंह यादव 1980 में यूपी में लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। वे 1982-1985 के दौरान वह लोकदल(बी) के प्रदेश अध्यक्ष चुने गए। इतना ही नहीं मुलायम के नेतृत्व में ही लोकदल ने चुनावों में 85 सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी और वह विपक्ष के नेता बने थे।
चुनाव चिन्ह जो भी हो लेकिन बड़ी समस्या यही होगी कि चुनाव मैदान में अखिलेश और मुलायम की पार्टी को भाजपा बसपा के अलावा एक दूसरे के प्रत्याशियों से भी निपटना पड़ेगा । पूरे प्रदेश में समाजवादी पार्टी दो खेमो में बाँट जायेगी । ज़ाहिर है सपा कार्यकर्त्ता भी बटेंगे । कई जनपद ऐसे हैं जहाँ ज़िलाध्यक्ष मुलायम खेमे के साथ है तो नगर अध्यक्ष अखिलेश के साथ है । चूँकि चुनावो में समय बहुत कम बचा है इसलिए प्रत्याशियों के लिए नई टीमें बनाना भी लोहे के चने चबाने से कम नही होगा ।
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