इस प्रदेश में 1989 तक कांग्रेस का निष्कंटक राज रहा, जिसे कहीं से कोई खतरा नही रहा। प्रदेश में अंतिम बार 3 मार्च 2002 से 3 मई 2002 तक राष्ट्रपति शासन रहा है।
1989 में प्रदेश के कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी रहे थे। ये ऐसे नेता हैं जो इस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के साथ-साथ उत्तराखण्ड अलग बन जाने पर वहां के भी मुख्यमंत्री रहे हैं। कांग्रेस 1989 से अब तक अर्थात बीते 28 वर्ष से सत्ता में आने के लिए जोर लगा रही है। परंतु वह जितना जोर लगाती है उसके लिए 'लखनऊ सिंहासन' उतना ही दूर होता जाता है। नारायणदत्त तिवारी से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने वाले पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव बने, जिन्होंने पहली बार 5 दिसंबर 1989 को प्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला था। इससे पूर्व चौधरी चरणसिंह के लिए भी कहा जा सकता है कि वे भी गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे पर यह गलत है-चौधरी साहब कांग्रेसी थे और 1970 में विभाजित कांग्रेस (ओ) के नेता के रूप में मुख्यमंत्री बने थे, जिनके पास विधायकों की संख्या पर्याप्त थी, परंतु इंदिरा गांधी को उनका मुख्यमंत्री बनना पसंद नही आया था, इसलिए उन्हें हटाकर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था।
प्रदेश में भाजपा की पहली सरकार 24 जून 1991 को कल्याण सिंह के नेतृत्व में बनी थी, भाजपा के इस मुख्यमंत्री के शासनकाल में बाबरी मस्जिद गिराई गयी तो उसी दिन (6.12.1992) उन्हें त्यागपत्र देना पड़ गया था। उसके पश्चात 7 मार्च 2002 को भाजपा के अंतिम मुख्यमंत्री राजनाथसिंह रहे। अब भाजपा कह रही है कि मुझे वनवास में गये 14 वर्ष हो गये हैं। इसलिए प्रदेश की जनता मुझे वापस बुलाये और सत्ता स्वाद चखने दे, तो कांग्रेस कह रही है कि भाजपा को तो 14 वर्ष ही हुए हैं मुझे तो 28 वर्ष वनवास में हो गये-अब तो प्रदेश की जनता माफ कर दे। इसी प्रकार बसपा का कहना है कि मुझे पांच वर्ष सत्ता से दूर हुए हो लिए-अब मुझे ही अवसर दिया जाए, जबकि अखिलेश कह रहे हैं कि इन सबसे उत्तम तो मैं ही हूं-मैंने गलती ही क्या की है ? जो मुझे वनवास दिया जाए।
अब देखना ये है कि प्रदेश की जनता किसे पसंद करती है? आगामी चुनावों में सब कुछ साफ हो जाएगा।
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