| क्या है इस सर्टिफिकेट का औचित्य? |
सूत्रों के अनुसार, रोशामल गाँव यह भी नहीं जनता की देश का प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी है या सोनिया गाँधी। कहते हैं कि संघ आदिवासी क्षेत्रों में बहुत सक्रिय है। बहुत काम किया है और कर रही है। जिस गाँव के लोग आजतक 500 और 1000 का नोट देखने से वंचित रहा, उस गांव के लोगों ने पास क्रेडिट या डेबिट कार्ड होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
| आखिर कब लगेगा इस नाटक पर विराम? |
गांव में सड़क, बिजली, घर और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। गांववालों को नोटबंदी के बारे में भी नहीं पता। उन्हें उसकी वजह से परेशानी इसलिए नहीं उठानी पड़ रही क्योंकि वहां के लोगों पर 500 और 1000 रुपए के नोट हैं ही नहीं। हालांकि, वे लोग फिलहाल मंडी में अपने मक्का और ज्वार को बेचने के लिए नहीं जा रहे। पूछने पर वहां के लोगों ने बताया कि मंडी में इस वक्त जो चीज 13 से 15 रुपए किलो जाती थी वह इस वक्त 10 रुपए प्रति किलो जा रही है। इसलिए उन्होंने अपना सारा सामान फिलहाल रोक रखा है।
खबर के मुताबिक, गांव में सड़कें या फिर बस भी नहीं है। उन लोगों को मंडी जाने के लिए दो पहिए या फिर जीप पर निर्भर रहना होता है। जो कि काफी वक्त में एक बार गांव आती हैं। वहां आसपास कोई पेट्रोल पंप भी नहीं है। दुकानों पर बोतलों में भरकर मिट्टी का तेल बेचते दुकानदार जरूर देखे जा सकते हैं।
वहां रहने वाले लोगों को जब नोटबंदी के बारे में बताया गया कि बैंक से फिलहाल दो हजार रुपए ही निकल रहे हैं तो उन्होंने कहा कि वह रकम काफी है। उनमें से एक ने कहा, ‘तुम लोगों को इससे ज्यादा पैसे की जरूरत ही क्या है? हमारा तो महीने का काम 1500 में चल जाता है।’
नेता कब तक "गरीबी हटाओ" पर देश को भ्रमित करते रहेंगे?
जो दर्शाता है कि भारत में निर्धनता की जड़ें कितनी गहरी हैं। "गरीबी हटाओ" सुनते-सुनते वृद्ध हो गए, पता नहीं नेता गरीबी के नाम पर देश को भ्रमित कर, मालपुए खाते रहेंगे? जबकि तथाकथित गरीब मौज कर रहे हैं। आखिर कब तक नेता वास्तविक गरीब और माध्यम आय वालों की समस्यों का संज्ञान लेंगे? जबकि तथाकथित गरीब वास्तव में नेताओं के पदचिन्हों पर चल मौज कर रहे हैं और उनकी आड़ में वेतनभोगी भिन्न-भिन्न प्रकार के टैक्सों में दम तोड़ रहा है। लेकिन रोशामल गांव और वेतनभोगियों की वास्तविक समस्याओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। आखिर कब तक गरीबों का उपहास किया जायेगा?
जब देश आज़ाद हुआ था, कुल कितने प्रदेश थे, और आज कितने हैं? प्रदेशों का विभाजन जनहित में नहीं अपितु नेताओं ने अपने पेट पालने के लिए किया है, जिसे प्रमाणित करता है महाराष्ट्र का रोशामल गाँव। इतना ही कुछ समय पूर्व, अपने हैदराबाद प्रवास के दौरान इसी ब्लॉग पर शीर्षक "क्या तेलेंगाना में कोई सरकार है?" के अंतर्गत वहाँ के बाजार भाव एवं सडकों पर गहरे-गहरे गड़डों पर प्रकाश डाला था, जिसे नेताओं को ट्वीट करने उपरान्त ही वहाँ की सडकों पर हुए गहरे गड्डों पर सरकार ने कार्य किया। इसमें हमारा मीडिया भी दोषी है, जिसे केवल दिल्ली ही दिखती है, अन्य प्रदेश नहीं। दिल्ली में वस्तुओं के दामों में इतनी वृद्धि हो गयी, थाली से यह वस्तु गायब हो गयी, लेकिन हैदराबाद(तेलेंगाना) में कितने ऊँचे दामों पर रोज़मर्रा की वस्तुएं बिक रही हैं, किसी को चिंता नहीं।
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