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नोटबंदी से चरमराती अर्थव्यवस्था

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Image result for corruption in indian courtsदेश में शुरू हुई नोटबंदी से सिर्फ आम आदमी ही नही बल्कि उधोग धंधे भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं । नोटबंदी के चलते मध्यम और छोटे व्यवसायियों को प्रतिदिन बड़ा घाटा झेलना पड़ रहा है । नोट बंदी के चलते कामगारों को नगद मजदूरी और ट्रांसपोर्ट का खर्च उठाने में असमर्थ व्यवसायी अब उत्पादन घटा रहे हैं ।श्रमिक को दैनिक अपनी मजदूरी चाहिए,मालिक कहाँ से दे? इस लेख के माध्यम से प्रधानमन्त्री मोदी की नियत पर शंका नहीं बल्कि इस नीति को किर्याविन्त करने वालों पर है। जो जनता से अधिक अपना स्वार्थ देख रहे हैं।
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छोटे और मध्यम उधोग चला रहे लोगों का कहना है कि यदि उत्पादन में कटौती न की जाए तो माल को कहाँ और कैसे खपाया जाएगा । नोटबंदी के चलते मजदूरी का नगद भुगतान करना सम्भव नही हैं । वहीँ दूर दराज के क्षेत्रो में माल भेजने के लिए ड्राइवरों को खर्चा देना और वापस आते समय गाड़ियों में तेल भरवाना जैसी कुछ समस्याएं हैं जिनका नोटबंदी के चलते निराकरण होना मुश्किल है ।
गुजरात में कपडे के काम के लिए मशहूर सूरत में 80 फीसद टेक्सटाइल मिलें बंद हो चुकी हैं, वहीं कपड़ा बाजार के व्यापारियों को आगामी शादी-विवाह को लेकर मिले ऑर्डर भी रद्द हो गए हैं। पहले से मंदी की मार झेल रहे सूरत के कपड़ा कारोबारियो को दिवाली बाद शादी के सीजन में कारोबार अच्छा चलने की उम्मीद थी, लेकिन नोटबंदी ने उनकी इस उम्मीद पर पानी फेर दिया है।
नोट बंदी के चलते प्रतिदिन लाखों मीटर कपड़ा का उत्पादन करने वाले कपड़ा मिलों के हालात भी काफी खराब हैं। सूरत के पांडेसरा इलाके में 12 माह 24 घंटे चलने वाली एक कपड़ा मिल में एक भी कर्मचारी काम करते नजर नहीं आते क्योंकि नोटबंदी के बाद से ये मिल पूर्णतः बंद पड़ी है। मिल में डाइंग और प्रिंटिंग होने आए कच्चे कपड़े के ढेर लगे हुए हैं। ऐसा नजारा सिर्फ एक कपड़ा मिल का नहीं बल्कि दक्षिण गुजरात में चलने वाले तकरीबन 450 कपड़ा मिल है।
Related imageसूरत के औद्योगिक क्षेत्र पांडेसरा के ये तमाम कपड़ा मिलों की चिमनियों के धुओं का न निकलना नोटबंदी का असर है। नोटबंदी के बाद सूरत के कपड़ा कारोबार का बुरा हाल है।
वहीँ नोट बंदी के चलते आभूषणों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर मेरठ के सर्राफा बाजार के कारोबार में 99 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है। वाराणसी में साड़ियों का कारोबार 90 फीसदी तक घट गया है। नोटबंदी के बाद से बाजारों में ग्राहक गायब हो गए हैं। मेरठ में नील की गली, सर्राफा और सदर बाजार में कारोबार लगभग ठप सा हो गया है। यहां दो हफ्तों से सोने का भाव नहीं खुला है।
गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकोर्ड वाले कहाँ हं.....क्या ये एक नया विश्व कीर्तिमान नहीँ ह क्या 125 करोड़ देश वासी लगातार एक महीने से बेंक और atm के बाहर लाइन मॆं लग कर अपने पैसे की शांति पूर्ण ढंग से भीख मांग रहे हं , जितना मिल जाये ले रहे हं कोई खाली हाथ भी लौट रहा ह और जनप्रतिनिधि तथा अफसरशाही मज़े से अपने शौक शुगल का भरपूर आनंद ले रहे हं ।
मोदीजी के प्रधानमन्त्री बनने पर एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते लिखा था "लाल बहादुर शास्त्री के बाद देश को मिला सख्त प्रशासक", जिसे मोदीजी ने अपने प्रथम लोकसभा सम्बोधन में सत्यापित भी कर दिया था "देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए लोकसभा की सफाई करनी होगी", अपनी इस वाक्य में अपनी नीति को सार्वजानिक कर दिया था। लेकिन उस सफाई अभियान में नेताओं से कहीं अधिक जनता का ही मरण हो रहा है। 
शादियों का मौसम होते हुए भी वाराणसी के प्रसिद्ध बनारसी साड़ियों का उत्पादन 90 फीसदी तक गिरा है। पिछले महीने 12 करोड़ से ऊपर का कारोबार हुआ था लेकिन लखनवी चिकन के कपड़ों का कारोबार इस महीने एक करोड़ का आंकड़ा भी नहीं छू पाया है। मुरादाबाद का पीतल उद्योग में मात्र 16 फीसदी उत्पादन हो पा रहा है तो नोएडा की गारमेंट इंडस्ट्री में 25 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है। बिहार के भागलपुर का सिल्क कारोबार 15 दिनों में 15 करोड़ का झटका खा चुका है।
व्यापारियों का कहना है कि नोटबंदी के बाद उन्हें सबसे बड़ी दिक्कत दैनिक मजदूरों को वेतन देने में आ रही है। अब मजदूरों के खाते खुलवाए जा रहे हैं। आपूर्ति करने वाले वेंडरों को नकदी देने मे दिक्कत आ रही है इन कंपनियों में कार्यरत नियमित और दैनिक श्रमिकों के समाने नकदी की समस्या।
इसमें दो राय नहीं कि जनता को नोटबंदी से परेशानी नहीं, परेशानी बहुत है। बैंक 2000 के नोट दे रहा है, अब 100/200 रूपए के लिए 2000 का नोट नहीं ले रहा। जिस से आम जनता को जरुरत से ज्यादा दिक्कतें हो रही हैं। अबतक का अनुभव यही बता रहा है कि अधकचरी तैयारी से सरकार द्धारा उठाया गया कदम है। सरकार को 500/ 2000 का नोट वितरित करने की क्या जल्दी थी? क्या 2000 का नोट बाद में वितरित नहीं किया जा सकता था?
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जनता को किसी भी तरह से कोई परेशानी न हो, सरकार को रिज़र्व बैंक को 100 और 50 के नोट वितरित करने के निर्देश देने थे और स्थिति सामान्य होने उपरान्त ही 500 एवं 2000 का नोट वितरित किया जाना था।
नोटबंदी के बाद देशभर में नगदी की भारी किल्लत है। लोग अपने कामकाज को छोड़कर कैश के लिए घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं। कई घंटों तक लाइन में खड़े रहने के बावजूद लोगों को मायूस होकर घर लौटना पड़ रहा है। कैश क्राइसिस का असर देशभर में छोटे से बड़े रोजगार और उद्योग धंधों पर पड़ रहा है। नोटबंदी के बाद से देश में विकास दर में गिरावट की आशंका जताई जा रही है।
रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों और एटीएम से नोटों की निकासी की लिमिट तय करने वाले निर्णय का संज्ञान लेते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने आरबीआई को फटकार लगाई है.
अदालत ने आरबीआई से पूछा है कि आखिर किस अधिकार के तहत उसने यह रोक लगाई है. कोर्ट ने कहा कि अथॉरिटीज के पास नोटों को बैन किए जाने की ताकत होती है, लेकिन निकासी की सीमा तय करने का अधिकार कहां है? हाईकोर्ट ने आरबीआई से  इन सवालों के जवाब देने को कहा है.
वहीँ चीफ जस्टिस आरएस रेड्डी और जस्टिस वीएम पंचोली ने रिजर्व बैंक से यह भी पूछा कि आखिर कैसे डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक्स पर पाबंदियां लगा दीं.

भावनगर जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन नानुभाई वाघानी की ओर से अदालत में पेश वकील ने सवाल उठाया था कि न तो आरबीआई एक्ट और न ही बैंकिंग नियामक कानूनों में कहीं भी निकासी की सीमा तय करने की बात की गई है. इस पर हाईकोर्ट ने रिजर्व बैंक से इस सवाल का जवाब देने को कहा.
इन सबके बीच आज(दिसम्बर 7) RBI ने भी माना कि नोटबंदी के बाद देश की विकास में गिरावट दर्ज की जाएगी। RBI के मुताबिक साल 2016-17 में देश की अनुमानित विकास दर में गिरावट दर्ज की जाएगी। RBI ने इस वित्तीय वर्ष में देश की अनुमानित विकास दर 7.6 फीसदी के घटकर 7.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। यानी RBI के मुताबिक नोटबंदी की वजह से देश की विकास दर में 0.5 फीसदी की कमी आएगी।
इस विकास दर में कमी का असर न सिर्फ बड़े, मझोलो और छोटे उद्योग धंधों पर पड़ेगा बल्कि इससे बेरोजगारी भी बढ़ने की आशंका जाताई जा रही है।
https://www.facebook.com/paras.yadav.3597/videos/1258686007535889/
Related imageफिर जब बैंक सारे 2000 रूपए के नोट देगा, कोई दूध वाला 20 रूपए की दूध की थैली पर 2000 का नोट नहीं लेगा। कोई सब्ज़ीवाला 50 रूपए की सब्ज़ी खरीदने पर 2000 का नोट नहीं लेगा। इस तरह की अनेको परेशानियां आम आदमी को झेलनी पड़ रही और वह केवल भ्रष्टाचार से मुक्ति की आस में सब कुछ बर्दाश्त कर रही है। क्या उसकी आस पूरी होगी?
संसद के दोनों सदनों में सांसद शोर मचा सकते हैं, लेकिन इनमे से कितने नोट बदलने या जमा करवाने बैंक की लाइन खड़े हुए ? क्या इन सांसदों को रिज़र्व बैंक या वित्त मंत्रालय द्धारा उनके निवास अथवा संसद में ही सुविधा प्रदान की गयी थी? क्या किसी साँसद के पास कोई नोट नहीं था? इतना ही नहीं, किसी भी धन्नासेठ को लाइन में खड़े नहीं देखा, जो आम जनता के विरुद्ध किसी षड्यंत्र की ओर संकेत दे रही है .
यदि कंप्यूटर्स पर आधारकार्ड रेकॉर्ड किये जाते, कमीशन कमाने के चक्कर में घरों में काम करने वाले/वालियां जो काले धन को सफ़ेद करने में व्यस्त थे, वास्तविकों को लेशमात्र भी कठिनाई नहीं होती . वास्तव में सरकार ने काले धन को सफ़ेद करने का सुनियोजित रास्ता था .
बहुत शोर हो रहा था, फलां-फलां पार्टी के पास ब्लैकमनी का अम्बार है, अभी तक तो कोई ऐसा नाम नहीं आया . इतना ही नहीं, कमीशन कमाने के चक्कर में बैंक मेनेजर जैसी छोटी मछलियां पकड़ने में बड़ी मछलियाँ पतली गली से निकल गयी, और मुर्ख जनता बैंक कर्मियों को सरकार विरोधी समझने लगी .यानि जिस भ्रष्टाचार और काली बाज़ारी को बंद करने नोटबंदी का खेल खेला गया वह तो बदस्तूर जारी है .        .
मुवक्किलों को कठिनाई
Image result for corruption in indian courtsसरकार को  बैंक से धन निकासी पर अंकुश लगाने से पूर्व उन मुवक्किलों की ओर भी देखना था कि जो धन वह बैंक से निकालेगा उससे वह अपना घर चलाएगा या वकील और अदालत में होती मांग को पूरा करेगा? वर्तमान सरकार ही नहीं बल्कि हर सरकार में वकीलों का कोई आभाव नहीं। लेकिन अदालतों में हो रहे खर्चों पर सभी ने अपनी आँखें मूंदी हुई हैं। अदालतों में भ्रष्टाचार बहुत पुराना है, कोई नया नहीं। जिसे सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक सभी जानते हैं।  
हमारे वित्त एवं कानून केन्द्रीय मन्त्री दोनों ही पेशे से वकील हैं, इन दोनों को इस बात का भी अच्छी तरह बोध होगा कि किसी भी तारीख पर मुवक्किल को कितना धन खर्च करना पड़ता है, जो किसी गिनती में नहीं आता।हर तारीख पर कोई न कोई नया खर्चा वकील बता ही देते है, केवल कुछ अपवाद को छोड़। यदि मुवक्किल ने उन खर्चों को करने में किसी भी तरह की लापरवाही की, जीता हुआ मुक़दमा हाथ से निकल जाता है। बुजुर्गों की एक अति पुरानी कहावत है “कोर्ट में खड़ा होने के लिए सोने के हाथ और पैरों में लोहे का जूता नहीं, तो उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली” चरितार्थ होने पर समय नही लगता।   फिर अभी दो दिन पूर्व तीस हज़ारी कोर्ट जाना था, किसी मुवक्किल का एक वकील के पास फोन आता है, और वकील दिल्ली हाई कोर्ट में केस दर्ज करने के लिए 14,000 रूपए की मांग करता है, और हाँ 5000 अलग से ले आना। 12,500 कोर्ट फीस जमा होगी। फिर कागज टाइप होने है और उनको attest भी करवाना है। यानि कुल मिला कर 20,000 रूपए का पटका। बैंक से कितने रूपए निकालने की इजाजत है ,नंगी क्या नाहे  क्या निचोड़े।      
सर्वप्रथम चुनाव प्रणाली में सुधार हो
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Image result for corruption in indian courtsलोगों का मानना है कि “अधिक लोगों को आयकर के दायरे में लाने के लिए उठाया गया कदम है। देश से भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी को दूर करने में बहुत समय लगेगा। इन दोनों की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। सरकार अगर वास्तव में भ्रष्टाचार को दूर करना है तो सर्वप्रथम चुनाव प्रणाली को सुधारना होगा। मतदान वाले दिन न सड़क पर कोई टेबल लगे और न ही अन्दर किसी पोलिंग एजेंट के बैठने की व्यवस्था हो। पोलिंग एजेंट को मात्र दो बार, मतदान शुरू और अंत होने से 15 मिनट पूर्व ही मतदान केंद्र में जाने की अनुमति हो। जब किसी प्रमाण के किसी को मत डालने का अधिकार नहीं, उस स्थिति में पोलिंग एजेंट की मतदान केंद्र पर क्या जरुरत? इतना ही नहीं, जब  तक पोलिंग एजेंट की इजाजत नहीं होती, मतदान अधिकारी दूसरे मतदाता की पर्ची नहीं पकड़ता, जो मतदान पर प्रभाव डालता है।”
जब विवाह आदि समारोह में अंकुश लगाने की चर्चा हो रही है, चुनावों  खर्चे पर क्यों नहीं? मतदान वाले दिन हर पोलिंग स्टेशन पर  सड़क पर लगने वाली मेज-कुर्सी और पोलिंग एजेंट से लेकर मंडल के लगभग 400  कार्यकर्ताओं की चाय-पानी, सुबह-शाम का नाश्ता और दिन का खाना आदि पर होने वाले खर्चे चुनावों में काले धन पर अंकुश लगा सकते हैं।  इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार-प्रदर्शन आदि के प्रदर्शन उपरांत पोलिंग पर जो मदिरा और धन का प्रवाह होता है, जिसका चुनाव खर्चे में कहीं कोई जिक्र तक नहीं होता। जब चुनाव आयोग द्धारा पर्ची वितरण किया जाता है, फिर मेज-कुर्सी डाल सड़क को घेरने से क्या लाभ? और आज कोई कार्यकर्ता बिना पैसा लिए किसी का कोई काम करने को तैयार नहीं। पोलिंग एजेंटों की मीटिंग पर जो खर्चा होता है, वह किस मद में जाता है।क्या ये खर्चे भी ऑनलाइन किये जाएंगे? जो व्यापारी इन कार्यक्रमों में निवेश करेगा, कहाँ से वसूलेगा? यदि मतदान भी ऑनलाइन कर दिया जाए बहुत खर्चों में कमी आएगी, जो अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालेगी। जब अर्थव्यवस्था को विदेशी नीति के आधार पर चलाने का प्रयास किया जा रहा है, फिर चुनाव को क्यों नहीं?  
पुराने मकानों की मरम्मत
कोई मिस्त्री या बेलदार काम करने उपरांत उसी दिन भुगतान मांगता है, उसको इस बात से कोई सरोकार नहीं कि तुम्हारे घर चूल्हा जलेगा या नहीं। पुराने मकान प्रतिवर्ष पैसा मांगता है। कुछ भी करवाओ पुलिस चली आती है रिश्वत मांगने, जिसे न देने पर गृहस्वामी को इतने झंझटों से गुजरना पड़ता है, उससे भी निपटने के लिए रिश्वत की जरुरत पड़ती है। और रिश्वत का भुगतान रुपयों में होता है, किसी paytm से नहीं।
रिश्वत का गर्म बाज़ार
रिश्वतखोरी का बाजार गर्म
आज दिल्ली में रिश्वतखोरी का कहाँ तक बखान किया जाए, जिसका वर्णन करने में शायद शब्दों का ही अकाल पड़ने की पूरी सम्भावना है। किसी भी मैट्रो स्टेशन पर देखिए रिक्शाओं का जमावड़ा, पुरानी दिल्ली के किसी भी चौक देखिए रिक्शों का जमावड़ा, अब तो नई दिल्ली स्टेशन के अंदर जाने वाली रिक्शा से 20 रूपए वसूले जाते है। सडकों पर अधिक्रमण, जब सरकार कोई आदेश देगी, फिर ये ही  रिश्वतखोर सरकार के विरुद्ध माहौल बनवाने में गुप्त भूमिका निभाते हैं। पुलिस बाइक और जिप्पसी दी गयी थी, शायद अपराधियों पर नज़र रखने के लिए। लेकिन उसका जिस तरह दुरूपयोग हो रहा, पुलिस अच्छी तरह जानती है, किसी के व्याख्या करने की जरुरत भी नहीं। इन वाहनों के माध्यमों से जो उगाई की जा रही है, वह किसी मोबाइल, आधार कार्ड,इ-बैंकिंग या paytm से नहीं होती, नकद नारायण से होती है, अगर किसी भी कैशलेस पॉलिसी को अपनाया, उस स्थिति में अपना अंजाम भी सोंच लेना चाहिए। यह पुलिस रिश्वतखोरी केवल दिल्ली ही नहीं शायद ही कोई प्रदेश अछूता हो।
सरकार चाहे जितनी नोटबंदी करले, लेकिन वास्तविकता का बोध धरातल पर रह कर ही की जा सकता है। जबरदस्ती प्रधानमंत्री के कार्यक्रमो की पार्टी अधिकारियों के साथ मिलकर जनता में प्रचार करने से बात नहीं बनती, सरकार तक जनता को हो रही कठिनाइयों  अवगत करवाने का साहस नहीं करते। और इसी कारण सरकार जनता की कठिनाइयों का अनुभव किये बिना मुंगेरीलाल के हसीन सपनों में खोई रहती है। लाल बहादुर शास्त्री के बाद देश को नरेंद्र मोदी के रूप में ऐसा प्रधानमंत्री मिला है,जो जनता की कठिनाइयों को समझ रहा है। लेकिन भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के इस बाजार से शायद किसी ने प्रधानमंत्री को अवगत करवाने का शायद साहस नहीं किया।   
बैंक कर्मियों पर काम का दबाव    
8 नवंबर के बाद से देश मेँ इस तरह से कैश की कमी हो रही है और बैंकोँ और एटीएम के आगे कतारेँ बढती गई, उससे जाहिर तौर पर बैंक कर्मचारियोँ के उपर काफी दबाव बना. बैंक कर्मियोँ को इस समस्या से निपटने के लिए काफी मशक्कत करनी पड रही है. उन्हेँ बहुत कम छुट्टी मिल पा रही है. ऐसे मेँ, अब बैंक कर्मचारी यूनियन भी दबाव मेँ आ गया है और यह कहने को मजबूर हो गया है कि अगर हालात जल्द न सुधरे तो वे हडताल पर भी जाने का विचार कर सकते है. बैंक कर्मियों पर जरुरत से ज्यादा काम का दबाव है, कि अपना दर्द किसे बताएँ ? कौन है उनकी सुनने वाला? रस्सी को उतना ही खींचना चाहिए की वह टूटने न पाए। आखिर आधारकार्ड को कंप्यूटर पर फीड करके भुगतान किया होता, किसी भी बैंक में लाइन दूसरे/तीसरे दिन ही समाप्त हो गयी होती। कोई भी कमीशन कमाने के चक्कर में खड़ा होकर किसी भी नेता को बोलने का मौका नहीं मिलता। माना यह समस्या बहुत पुरानी है, किसी को लेशमात्र भी शंका नहीं। किसी सरकारी निर्णय में किस तरह अवरोध उत्पन्न किये जा रहे हैं, इसका काम सरकार का था।
दरअसल, रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने दावा किया था कि रिज़र्व बैंक इस बात का ध्यान रख रहा है कि नोट प्रिटिंग प्रेस अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करें ताकि नए नोटों की मांग पूरी की जा सके. उर्जित पटेल ने पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में ये बातेँ कही थी. उनका दावा था कि बैंक और एटीएम के बाहर क़तार कम होती जा रही है.  
लेकिन ऑल इंडिया बैंक एप्लाइज एसोसिएशन (एआईबीईए) के महासचिव सीएच वेंकटचलम इन दावों पर सवाल उठा रहे हैं. उनका दावा है कि रिज़र्व बैंक से नोटों की सप्लाई बहुत कम है और डिमांड बहुत ज्यादा है. सिर्फ बीस से 25 फ़ीसदी मांग की पूर्ति हो पा रही है. रिज़र्व बैंक और सरकार का यह दावा ग़लत है कि उनके पास कैश की कमी नहीं है.
कैश की कमी के कारण ग्राहकों और कर्मचारियों को काफ़ी दिक्क़त हो रही है. कई जगह बैंक ग्राहकों और कर्मचारियों के बीच झगड़े की ख़बर भी आ रही है. वेंकटचलम का कहना है कि नोटों की सप्लाई की पारदर्शिता भी सवालों के घेरे में है. स्थिति नहीं सुधरी तो बैंक यूनियन दस दिनों के बाद हड़ताल पर जाने का विचार कर सकती है.
वो कहते हैं कि चूंकि ज्यादातर एटीएम अभी तक चालू भी नहीं हो पाए हैं इसलिए लोगों को बहुत तकलीफ़ हो रही है. बैंक का काम लोगों को कैश देना है जो वो नहीं दे पा रहे हैं. यह बहुत शर्म की बात है. उन्होंने कहा है कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया, सरकार और आईबीए को लिखे उनके ख़तों पर दूसरी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. 


      

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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