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क्या भाजपा अपने वैचारिक गुरू गोलवलकर की शिक्षाओं से आज उतनी ही दूर है जितनी कि कांग्रेस?

Image result for गुरु गोलवलकरयह बात किसी से छुपी नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक राजनीतिक शाखा है. इस पार्टी के अधिकतर बड़े नेता, फिर चाहे वह अटल बिहारी वाजपयी हों या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सक्रिय राजनीति में आने से पहले आरएसएस के प्रचारक रहे हैं. यह कहना ग़लत न होगा कि भाजपा के शरीर में संघ की ही रूह बसती है.
Image result for गुरु गोलवलकरRelated imageहम सभी ये जानते हैं कि माधव सदाशिव या ‘गुरूजी’ गोलवलकर आरएसएस के वैचारिक एवं बौद्धिक गुरु हैं. उनके विचार आज भी संघ का मार्गदर्शन करते हैं. उनकी पुस्तक ‘अ बंच ऑफ़ थॉट्स’ संघ के लिये आज भी प्रेरणास्रोत मानी जाती है. अगर हम गुरूजी के राजनीतिक विचारों और उनकी अपने समय के राजनीतिज्ञों की आलोचनाओं पर ध्यान दें तो पायेंगे कि आज की भाजपा उनसे शायद ही प्रभावित है.
मिसाल के तौर पर उनकी पुस्तक के खंड तीन में मौजूद अध्याय 24वें अध्याय - ‘फाइट टू विन’ - पर नजर डालते हैं जो उन्होंने भारत-चीन युद्ध के दौरान लिखा था.
Image result for गुरु गोलवलकर‘जब हम अपने महान नेताओं को ये सब बताने लगते हैं तो वे कहते हैं कि देश की इस मुश्किल घड़ी में सरकार की आलोचना न कीजिये’ गुरू गोलवलकर सरकार की आलोचना को देशहित मैं सबसे ज़रूरी बताते हुए लिखते हैं, ‘क्या वे ये चाहते हैं कि हम उनके हर निर्णय को शत-प्रतिशत सही मान लें? क्या ऐसी चापलूसी से देश का कोई भला हो सकता है? यदि उनकी सारी पालिसी और निर्णय ठीक होंगे तो खुद ही कोई आलोचना नहीं करेगा. दूसरी ओर अगर उनमें कोई ख़ामी है तो देशभक्त नागरिक होने के नाते यह हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उनको ग़लती का अहसास कराकर उन्हें सही करें.’
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अब इसकी तुलना आज की भाजपा सरकार से कीजिये जहां हम आये दिन सुनते हैं कि फलां मंत्री, सांसद या विधायक ने सरकार की आलोचना करने वालों को देशद्रोही कह दिया. अभी हाल ही में नोटबंदी के बाद भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने, जिनमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस भी शामिल हैं, सरकार के इस फ़ैसले का विरोध करने वालों को देशद्रोही करार दे दिया. भाजपा के बंगाल अध्यक्ष ने तो यह तक कह दिया कि दिल्ली में नोटबंदी का विरोध करने पर वे ममता बनर्जी को पुलिस से पिटवा भी सकते थे.
भाजपा नेताओं के ये बयान उस संस्कार से मेल खाते नहीं दिखते जो गुरूजी उन्हें सिखाना चाहते थे. बल्कि वे तो यहां तक लिखते हैं कि, ‘यह तथ्य कि हमारे नेता आलोचना के इतना ख़िलाफ़ हैं यह समझने में मदद करता है कि उनको आलोचना की ज़रूरत है.’
Image result for गुरु गोलवलकरगुरूजी की मानें तो ईमानदार लोगों की आवाज़ दबाना स्टालिन और हिटलर की तानाशाही जैसा ही है. और वे यह भी याद दिलाते हैं कि इनकी तानाशाही अधिक समय तक न टिक सकी थी. आज उनको कोई अच्छे नाम से याद नहीं करता.
दूसरा फ़र्क जो गुरूजी की शिक्षा से आज की भाजपा में देखने को मिल रहा है वह यह है कि गुरूजी व्यक्तित्व पंथ या ‘पेर्सनेलिटी कल्ट’ के बिलकुल खिलाफ थे. आज यह बात जगज़ाहिर है कि किस प्रकार भाजपा के छोटे-बड़े सभी नेता प्रधानमंत्री मोदी के लिये ‘भक्ति’ की हद तक जा पहुंचे हैं. उनकी मानें तो नरेंद्र मोदी न तो कुछ ग़लत कर सकते हैं और न ही उन्होंने कभी ऐसा किया है.
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गुरूजी उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के बारे में लिखते हैं, ‘हम प्रधानमंत्री की इज्ज़त करते हैं और मानते हैं कि वे एक महान वैश्विक नेता हैं. परन्तु हम उनकी चापलूसी नहीं कर सकते न ही उनके हर कदम को हमेशा सही मान सकते हैं.’ उनके अनुसार, ‘व्यक्तित्व पंथ न केवल हमारे समाज और संस्कृति से बाहर का है, यह राष्ट्र-हितों को नुकसान भी पहुंचाता है.’
इसे समझाने के लिये वे दो उदाहरण देते हैं. उनके अनुसार पानीपत के तीसरे युद्ध में जब सदाशिवराव भाऊ हाथी से उतरकर घोड़े पर बैठे तो दिखाई न देने के कारण उनकी सेना को लगा कि उनकी मौत हो गयी. इस से सेना का मनोबल टूट गया और वह तितर-बितर हो गयी. ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि यहां एक व्यक्ति ही प्रेरणास्रोत था न कि कोई विचारधारा.
दूसरी ओर मराठों का कोई भी प्रतिनिधि राजा शिवाजी की मौत के 20 बरस बाद तक भी उनके बीच मौजूद नहीं था. संभाजी की हत्या हो चुकी थी. शाहू मुगलों की कैद में थे. और राजाराम भी जिंजी में नज़रबंद ही थे. तब भी बीस साल तक मराठे औरंगज़ेब की मौत तक उसकी सेना से लड़ते रहे. क्योंकि उनका प्रतिनिधित्व कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार कर रहा था.
गुरूजी विचार को किसी भी व्यक्ति से ऊपर रख कर देखते थे और उनके अनुसार व्यक्ति विशेष का अनुयायी होने से विचारों की लड़ाई को भारी धक्का पहुंचता है. लेकिन आज की भाजपा इस पाठ को भूल हर तरह से यह मनवाने में लगी हुई है कि नरेंद्र मोदी द्वारा लिया हुआ हर फ़ैसला न केवल सही होता है बल्कि केवल वही देश का उद्धार कर सकते हैं.
और एक चीज़ जोकि ख़ासतौर पर नोटबंदी के संदर्भ में याद रखने वाली है वह यह कि जहां एक ओर सरकार आम जनता को धैर्य का पाठ पढ़ा रही है और कम खर्च करने को कह रही है उसके अपने कई नेता ही ऐसा नहीं कर रहे हैं.
गुरूजी इस संबंध में लिखते हैं कि’ ‘बेशक ये आमतौर पर जनता को किफ़ायत करने को कहते हैं. लेकिन जिस तरह से वे ख़ुद फ़िजूलखर्ची कर रहे हैं उससे लगता है कि देश के सामने कोई ख़ास समस्या है ही नहीं.’
हम सब देख रहे हैं कि किस प्रकार मंत्री नितिन गडकरी व अन्य दिग्गज नेता खुलेआम शादी इत्यादि पर पैसा बहा रहे हैं जबकि जनता से कहा जा रहा है कि वह संयम बरते.
यदि गुरू गोलवलकर के साहित्य को क़रीब से पढ़ा जाये तो ऐसे कई मौके आयेंगे जिससे यह प्रतीत होगा कि भाजपा वैचारिक रूप से उनकी शिक्षा से बहुत दूर निकल आयी है.
क्या भाजपा माननीय गुरूजी एवं डॉ केशव हेडगवार के आदर्शों का परचम फैराने में सक्ष्म है? क्या उनके सपने साकार होंगें?

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