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प्रधानमंत्री मोदी ने माना, नोटबंदी बहुत बड़ी भूल थी

नरेंद्र मोदीमोदी और चंद्रशेखर के बीच मीटिंग 25 मिनट के लिए होनी तय थी। लेकिन ये मीटिंग पूरे एक से डेढ़ घंटे के लिए चली चंद्रशेखर राव ने कहा कि औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में स्थिति बुरी तरह से प्रभावित हो रही थी।
चंद्रशेखर ने पीएम से तेलंगाना में इस तरह के एक अनिश्चित स्थिति को देखते हुए कहा कि, राज्य केंद्र को करों और अन्य राजस्व के अपने हिस्से का भुगतान करने में सक्षम नहीं होगा।
चंद्रशेखर द्वारा की गई सूचीबद्ध शिकायतों के बाद प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया नोटबंदी अपने आप में एक बड़ी भूल थी। और उन्हे इसे शुरू करने से पहले बहुत अधिक ध्यान देना चाहिए था। एक सूत्र ने इस मीटिंग के बारे में बताया कि हालांकि प्रधानमंत्री ने कहा कि चीजें जल्दी ही सुधरनी चाहिए।
प्रधानमंत्री ने चंद्रशेखर से नोटबंदी को सार्वजनिक रूप से इस कदम का समर्थन करने को कहा। मोदी ने चंद्रशेखर को आश्वासन दिया कि नितिन गडकरी, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री, और पीयूष गोयल, बिजली मंत्री, संकट से उबरने में मदद करने के लिए राज्य में नई परियोजनाओं की घोषणा करेंगे।
मोदी और चंद्रशेखर राव की बैठक इतनी लंबी चली कि पीएम से मिलने का इंतज़ार कर रहे सेना प्रमुख जनरल दलबीर सुहाग को कहा गया कि कुछ जरूरी परिस्थितियों के कारण प्रधानमंत्री से मिलना संभव नहीं है।
https://www.facebook.com/paras.yadav.3597/videos/1258686007535889/
ये पहला अवसर है जब मोदी ने नोटबंदी पर अपनी गलती स्वीकार की है। वरना प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक रूप से नोटबंदी का पूरी तरह से बचाव किया है। इस कदम के खिलाफ विरोध करने वालों को पीएम ने भष्ट्र कहकर पुकारा है ।
नोटबंदी के बाद ढंग का खाना खाने लायक रकम भी नहीं मिल पा रही : रूसी राजदूतनोटबंदी के बाद नकदी की कमी के चलते हो रही परेशानी को लेकर रूसी दूतावास ने भारत सरकार के सामने कड़ा विरोध जताया है. भारत में रूस के राजदूत एलेक्जेंडर कदाकिन का कहना है कि नोटबंदी के बाद से उनके दूतावास को इतने रुपए भी नहीं दिए जा रहे कि स्टाफ ढंग का खाना खा सके. ख़बरों के मुताबिक नोटबंदी के फैसले के बाद स्टेट बैंक (एसबीआई) ने रूसी दूतावास को जानकारी दी थी कि आरबीआई के कहने पर दूतावास के लिए नकद निकासी की सीमा को कुछ समय के लिए 50 हजार रुपए प्रति हफ्ते तक सीमित कर दिया गया है.

रूसी दूतावास के एक अधिकारी ने मीडिया को बताया कि दूतावास में 200 कर्मचारी हैं जो अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते हैं. इस अधिकारी के अनुसार बैंक इस समय दूतावास को जो रकम दे रहा है उससे एक कर्मचारी के हाथ में एक हफ्ते में मात्र 250 रुपए ही आ पा रहे हैं. दूतावास के कर्मचारियों को हो रही परेशानी को देखते हुए एलेक्जेंडर कदाकिन ने भारतीय विदेश मंत्रालय को एक पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है. खबरों के मुताबिक उन्होंने इस पत्र में लिखा है कि 50 हजार की रकम बहुत कम है, इसमें उन्हें अधिकारियों की पगार से लेकर दूतावास में होने वाले रोज के खर्च भी निपटाने हैं. उनके मुताबिक इतने कम पैसों में तो कोई अधिकारी एक ढंग का डिनर तक नहीं कर सकता.
रूसी दूतावास के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वे भारत सरकार के जवाब की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उम्मीद है कि जल्द ही इसका हल तलाशा जाएगा. ख़बरों के मुताबिक रूस के अलावा कजाकिस्तान, यूक्रेन, इथोपिया और सूडान के दूतावासों ने भी धन निकासी पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर विदेश मंत्रालय को पत्र लिखे हैं. कुछ राजनयिकों का यह तक कहना है कि अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में तैनात स्टाफ पर भी नकद निकासी से जुड़े ऐसे प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं.
इजरायल से एक शीर्ष अर्थशास्त्री, जो प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकारों में है, उन्होंने मोदी से कहा था कि निर्णय काफी गलत था। कई भारत और विदेश के विशेषज्ञों ने निर्णय की निंदा की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी घोषणा पर अभूतपूर्व कवरेज सिर्फ भारतीय मीडिया तक ही सीमित नहीं थी। 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने के इस कदम का दुनिया भर की मीडिया कवरेज में बोलबाला रहा है।
ऐसा आभास होता है कि मात्र 87 लोगों द्धारा ही बैंकों की इतनी दुर्दशा हुई है और सरकार उन पर किसी भी तरह की कार्यवाही करने से बच रही है। और कालेधन के नाम पर आम जनता को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जनता पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगाए जा रहे हैं, जो जनहित में कदापि नहीं। इन 87 लोगों पर इस नोटबंदी का क्या प्रभाव पड़ा। शायद कुछ भी नहीं। इन्ही बातों का संज्ञान लेते, सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई से उन लोगों के बारे में जानकारी मांगी थी जिन पर 500 करोड़ रुपए अधिक का बैंक लोन बकाया है। जानकारी में यह बात निकलकर आई है कि केवल 87 लोगों पर पब्लिक सेक्टर बैंक का 85 हजार करोड़ रुपया बकाया है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई से इन लोगों के नाम सार्वजनिक करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरबीआई को बैंको के लिए नहीं, बल्कि देश की भलाई के लिए काम करना चाहिए और इन सबसे बड़े बकायदारों के नाम समाने लाने चाहिए।
https://www.facebook.com/100009007565872/videos/1698691927107710/
भारत के चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर ने आरबीआई द्वारा सौंपी गई बकायदारों की एक लिस्ट पढ़ने के बाद यह खुलासा किया कि ऐसे 87 लोग हैं जिनपर बैंकों के 500 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया है, इस तरह इन लोगों पर कुल 85 हजार करोड़ रुपए बकाया है। पीठ ने कहा कि हमने 500 करोड़ रुपए से अधिक के कर्जदारों की सूची मांगी थी तो यह आंकड़ा सामने आया है। अगर हमने इससे नीचे के कर्जदारों की सूची मांगी होती तो यह आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपए से अधिक होता।
हीं आरबीआई ने डिफॉल्टर के नाम सार्वजनिक करने का विरोध किया। आरबीआई की ओर से पेश वकील ने कहा कि कानून के तहत गोपनीयता का प्रावधान है, जो नाम सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं देता। इस दलील पर पीठ ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि कैसी गोपनीयता। किसी ने बैंक से कर्ज लिया लेकिन उसे नहीं चुकाया। ऐसे लोगों के नामों को सार्वजनिक करने से आरबीआई को क्या फर्क पड़ेगा। इससे तो उन लोगों की साख खराब होगी, जिन्होंने कर्ज नहीं चुकाया।
अपने घरों में केवल गरीब और वेतनभोगी ही अपने आपातकाल के लिए रूपए रखते हैं,क्या किसी व्यवसायी को घर में रूपए रखते देखा या सुना है। और न ही किसी व्यवसायी को बैंक की लाइनों में खड़े देखा गया। क्या आम जनता पर ही लानत भेजनी थी? 
टीवी चैनलों ने बड़े पैमाने पर इस खबर को कवर किया लंदन के समाचार पत्र, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन ने अपने संपादकीय में नोटबंदी के लिए कटु लेख लिखे थे।
लंदन के दा गार्जियन अखबार ने इस कदम को तानाशाही का एक असफल प्रयोग बताया, ब्लूमबर्ग ने इसे मोदी की एक भारी गलती करार दिया।
यहाँ इन विदेशी मीडिया की टिप्पणियों के संपादकीय का एक स्नैपशॉट है।
लंदन दा गार्जियन
अमीर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, काला धन का अधिकतर भाग शेयर, सोना और रियल एस्टेट के रुप में परिवर्तित कर दिया है। लेकिन गरीब, जो देश की 1.3 अरब लोगों की आबादी में हैं सबसे अधिक प्रभावित होंगे। जिनके आम तौर पर बैंक खाते नहीं है और अक्सर नकद में भुगतान करते हैं। इस नीति के एक हफ्ते के अंदर ही कम से कम एक दर्जन से अधिक लोगों की जान जाने का दावा किया गया है। सरकार का कहना है कि यह समस्या को सुलझाने के लिए सप्ताह का समय लगेगा।
श्री मोदी की योजना तानाशाही की असफल प्रयोगों के समान है जिसके परिणाम स्वरुप मुद्रास्फीति, मुद्रा पतन और बड़े विरोध प्रदर्शन सामने आए है। श्री मोदी जी ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए ये अभियान चलाया है। लेकिन  बेहतर होता यदि सरकार ने अपने पुरानी कर प्रणाली को नवीनतम बनाया होता।
न्यूयॉर्क टाइम्स
नकदी भारत में राजा है। यहा 78 प्रतिशत लेनदेन में नकद का प्रयोग होता है। कई लोगों के पास बैंक खाते या क्रेडिट कार्ड नही है और यहां तक कि जो लोग डेबिट या क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते हैं। उन्हे अक्सर नकद का उपयोग करना पड़ता है। क्योंकि कई व्यवसायों के भुगतान के लिए नकदी ही चलती है।
नोट बदलने की इस योजना ने अर्थव्यवस्था को उथल-पुथल में डाल दिया है।  बैंकों में पुराने नोटो को बदलने के लिए मजबूर लोग लम्बी कतारों में खड़े हैं। एक व्यक्ति ने टाइम्स को बताया कि एक बैंक ने उसे नोट बदलने के लिए मना कर दिया क्योकी उसके पास सरकार द्वारा जारी पहचान कार्ड नहीं था जो पुराने नोट जमा करने के लिए आवश्यक है । उसे उम्मीद थी कि नोट बदलवाने के इंतजार में लगे उसके परिवार को कोई चैरिटी खाना खिलाएगी।
ब्लूमबर्ग- मोदी की बड़ी गलती
शुरु में ये पीएम मोदी का मास्टर स्ट्रोक लगा था लेकिन बाद में ये एक बड़ी गलती जैसा लगने लगा।
मोदी के हाल के भाषण नोटबंदी के विषय पर एकदम बेतुके रहे। एक ओर वो नोटबैन की तकलीफ़ पर हँसते हुए दिखे और दूसरी और भारत पर अपने “बलिदान” के लिए रोते दिखे और चेतावनी दी कि कुछ लोग अपनी लूट की रक्षा के लिए उनकी हत्या कर सकते है।
एक सप्ताह में क्या बदल गया है? खैर, एक के लिए, यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार इसकी योजना बनाने में जल्दबाज़ी में सवार थी। अब जब कि भारत की मुद्रा का 86 प्रतिशत वैध नहीं है, केंद्रीय बैंक ने नोट मुद्रित करने के लिए काफी संघर्ष किया है।
वाशिंगटन पोस्ट
एक शोध रिपोर्ट में बैंकिंग की दिग्गज कंपनी एचएसबीसी ने भविष्यवाणी की है कि उपभोक्ता वस्तुओं के आयात गिर जाएेंगे लेकिन सोने की मांग से भरपाई हो सकती है। क्योंकि अस्थिर भारतीय अपने धन को स्टोर करने के तरीके देखते हैं।
नोटबंदी का प्रभाव दो साल के लिए रह सकता है। मंदी के दौर में देश चला रहे हैं और भारतीयों को प्रेरित कर रहे है यूरो या अमरीकी डॉलर के रूप में मुद्राओं में धन रखें।

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To write on general topics and specially on films;THE BLOGS ARE DEDICATED TO MY PARENTS:SHRI M.B.L.NIGAM(January 7,1917-March 17,2005) and SMT.SHANNO DEVI NIGAM(November 23,1922-January24,1983)

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