| भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक जकिया सोमान |
तीन तलाक, बहु विवाह, मुस्लिम महिलाओं का भरण पोषण से मनाही और हलाला जैसी बर्बर परंपराओं पर मा. सर्वोच्च न्यायलय द्वारा सम्बंधित पक्षों की राय लेने पर ही कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं, मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और ढोंगी सैक्युलर नेताओ ने जिस तरह की हाय तौबा की है, वह बेहद शर्मनाक है। इन लोगों द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं महिला विरोधी, मुस्लिम विरोधी, मानवता विरोधी और संविधान विरोधी हैं।
आज जिस तरह छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता, चाहे किसी भी पार्टी से हों, जो विधवा-विलाप कर जनता को पागल बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं, राष्ट्र को बताएं “जब सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल-विवाह, दहेज़ प्रथा आदि पर कानून बना था, तब कहाँ थे?” या फिर दूसरे अर्थों में यह कहा जाये कि जितने भी कानून हैं हिन्दुओं पर लाद दो, मुसलमानों पर कानून पाबन्दी लगते ही “इस्लाम खतरे में” या “इस्लामिक प्रथाओं पर प्रहार” या “हिन्दू कानून मुसलमानों पर बर्दाश्त नहीं”और न जाने किन-किन मसौदें से मुस्लिम समाज को भड़काने का प्रयास किया जा रहा है। कल(अक्टूबर 13 को) किसी चैनल पर चल रही परिचर्चा में एक मुस्लिम ने मुस्लिम पर्सनल बोर्ड सदस्य और दूसरे मुस्लिम ज्ञानिओं को लताड़ते हुए स्पष्ट किया कि इस तरह के कानून पारित होने से “किसी इस्लाम को कोई खतरा नहीं होने वाला।”
https://www.facebook.com/shrivastavadeepakverma/videos/1139828402719157/
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| शाहबानो |
मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने मा. सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही का राजनीतिकरण तो किया ही है, उन्होंने देश को तोड़ने की धमकी देकर देश को ब्लैकमेल करने का दुस्साहस भी किया है। उन्होंने इस्लाम खतरे में है का नारा देकर जिन्ना की तरह मुस्लिम समाज में अलगाव का बीज पैदा करने का प्रयास भी किया है।
विहिप का स्पष्ट मत है कि भारत के ढोंगी सैक्युलर नेताओं द्वारा कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओ का साथ देने से उनके महिला विरोधी और संविधान विरोधी चेहरे का पर्दाफाश हो गया है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि चंद मुस्लिम वोटों के लिए वे अब तक जो राजनीति करते रहे हैं, उसके द्वारा वे मुस्लिम समाज का कोई फायदा नहीं कर रहे थे अपितु उनको पिछड़ा रखकर वे अपना उल्लू सीधा कर रहे थे। एक महिला नेता ने जिस प्रकार महिलाओ को प्रताड़ित करने वाली इन बर्बर परम्पराओं की रक्षा में ताल ठोका है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि वामपंथ किसी प्रगतिशीलता और महिला अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा होने वालों का नाम नहीं है। महिला उत्पीडन ही इनका असली चरित्र है। चंद मुस्लिम वोटों के लिए वे मुल्लाओं के साथ खड़े होकर मुस्लिम समाज को पिछड़ा बनाये रखने के षड़यंत्र में बराबर के भागीदार है। वृंदा करात तो स्वयं महिला होते हुए भी महिला उत्पीडन में सहायक बन रही हैं, इससे अधिक विभीषिका क्या हो सकती है।
समान आचार संहिता पर राय लेने का काम भी ला कमीशन द्वारा मा. सर्वोच्च न्यायालय के अन्तर्गत किया जा रहा है। इसके लिए भारत का संविधान स्पष्ट आदेश देता है और मा. सर्वोच्च न्यायालय कई बार अपने निर्णयों में इसके लिए कह चुका है। राष्ट्रीय महत्त्व के इस विषय का राजनीतिकरण करके ये सभी लोग न केवल मा. सर्वोच्च न्यायालय का अपमान कर रहे हैं अपितु संविधान की अवहेलना भी कर रहे हैं। संविधान निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर के विचार इस सम्बंध में क्या थे, किसी से छिपे नहीं है। समान आचार संहिता का विरोध कर वे डा. भीमराव अम्बेडकर के अपमान करने का अक्षम्य अपराध भी कर रहे हैं ।
वे बार -बार एक गलत प्रचार कर रहे हैं कि केंद्र सरकार हिन्दू एजेंडा थोपना चाहती है, अब मुस्लिम समाज को हिन्दू कानून मानने पड़ेंगे। वे यह तथ्य क्यों छिपाना चाहते हैं कि ये कार्यवाही मा. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हो रही। क्या वे यह कहना चाहते है कि मा. न्यायपालिका केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही है ? क्या इस वर्ग का भारत की न्यायपालिका पर भी विश्वास नहीं है ? जब भी इनके मनोनुकूल काम नहीं होता, ये इसी प्रकार न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा करने का महापाप करते हैं। याकूब मामले में इनके दुष्प्रचार सबके ध्यान में हैं ही। ये मुस्लिम समाज के मन में अविश्वास निर्माण कर उसे किस मार्ग पर ले जा रहे है ? इन सब लोगो को समझ लेना चाहिए कि ५०% मुस्लिम आबादी अब प्रताड़ना के नरक से बाहर आना चाहती है। अब मुस्लिम समाज में भी सुधार की चाह पैदा हो रही है। वे इसे बाधित न करें। यह सुधार मुस्लिम समाज के हित में है। गोवा में पहले से ही समान आचार संहिता है। वहाँ अभी तक कोई कठिनाई नहीं तो शेष भारत में क्या हो सकती है ?
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ दूसरे मुस्लिम संगठनों की ओर से तीन तलाक एवं समान आचार संहिता से जुडी विधि आयोग की प्रश्नावली के बहिष्कार का ऐलान किए जाने के बाद मुस्लिम महिला कार्यकर्ताओं ने बोर्ड और इन संगठनों पर निशाना साधते हुए कहा कि ये लोग मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं हैं और उनका रूख धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक है।
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक जकिया सोमान ने कहा, ‘विधि आयोग ने सिर्फ तीन तलाक की बात नहीं कही है। उसने हिंदू महिलाओं के संपत्ति के अधिकार और ईसाई महिलाओं के तलाक से संबंधित मामलों की भी बात की है। इसलिए आयोग पर सवाल खडे करना अनुचित है।’ जकिया ने आरोप लगाया, ‘पर्सनल लॉ बोर्ड में बैठे लोग मुसलमानों के प्रतिनिधि नहीं हो सकते। यह बोर्ड महज एक एनजीओ है और देश में हजारों एनजीओ हैं। इसलिए इनकी बात को मुस्लिम समुदाय की बात नहीं कहा जा सकता। मुझे लगता है कि इनका रूख धार्मिक नहीं बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक है। महिलाओं की मांग कुरान के मुताबिक है और उन्हें उनका हक मिलना ही चाहिए।’
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और देश के कुछ दूसरे प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने आज समान आचार संहिता पर विधि आयोग की प्रश्नावली का बहिष्कार करने का फैसला किया और सरकार पर उनके समुदाय के खिलाफ ‘युद्ध’ छेडने का आरोप लगाया। यहां प्रेस क्लब में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुस्लिम संगठनों ने दावा किया कि यदि समान आचार संहिता को लागू कर दिया जाता है तो यह सभी लोगों को ‘एक रंग’ में रंग देने जैसा होगा, जो देश के बहुलतावाद और विविधता के लिए खतरनाक होगा।
सामाजिक कार्यकर्ता और स्तंभकार नाइश हसन ने कहा, ‘इन लोगों की सोच कट्टरंपथी है। शाह बानो के समय भी इन लोगों ने सरकार पर दबाव बनाया था और आज भी वैसा ही करने का प्रयास कर रहे हैं। हमारी मांग है कि सरकार इनके दबाव में नहीं आए।’’ नाइश ने कहा, ‘अब महिलाएं झुकने वाली नहीं है। वे हक लेकर रहेंगी। हम सरकार और अदालत के स्तर से पूरी मदद की उम्मीद कर रहे हैं। तीन तलाक की प्रथा का खत्म होना जरूरी है।’
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