आज जिसे देखो भाजपा, संघ और विश्व हिन्दू परिषद् पर हिन्दू हितों की बात करने पर विधवा-विलाप करता है, लेकिन मुस्लिम लीग और हैदराबाद की मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन के बारे में बोलने का किसी भी माई के लाल में हिम्मत नहीं। क्योंकि इन पार्टियों के विरुद्ध बोलते ही इन सब छद्दम धर्म-निरपेक्ष भी साम्प्रदायिक बन जाएंगे। जिस पार्टी के कर्णधारी अपनी ईसाई बहु द्धारा इस्लाम न स्वीकार करने तक बहु न मानने के अलावा अपने बेटे को भी अलग कर दे, साम्प्रदायिकता का स्पष्ट प्रमाण नहीं है तो क्या है?
हैदराबाद की राजनीति में बरसों से चमक रही मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन की पहचान एक मुस्लिम राजनीतिक दल के तौर पर होती है यही वजह है। कि इस पार्टी की नीयत औऱ इसके मकसद को लेकर कई तरह की आशंकाओं के स्वर भी सुनाई पड़ते रहे हैं।
एमआईएम के जन्म और उसमें आए बदलाव की कहानी की गहराई में जाने पर अनेकों विवादित बातें उभर कर आती हैं, जो हकीकत में चिन्ता का विषय होने के साथ-साथ समस्त राजनीतिक दलों--प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय-- को इस पार्टी के साथ हाथ मिलाना कहीं देश को 1947 के दौर में न ले जाए। लेकिन उससे पहले जानिए कौन हैं एमआईएम के सबसे विवादित नेता अकबरुद्दीन ओवैसी।
अकबरुद्दीन ओवैसी का जन्म 14 जून 1970 को हैदराबाद में हुआ। ओवैसी ने एमबीबीएस की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। अकबरुद्दीन 'ओवैसी अस्पताल' के प्रबंध निदेशक भी हैं। इस अस्पताल की स्थापना उनके पिता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने मुस्लिमों के लिए की थी। 1995 में अकबरुद्दीन एक ईसाई महिला सबीना के प्यार में पड़ गए थे। बाद में उन्होंने सबीना से शादी भी की। दूसरे धर्म में शादी करने से इनके पिता इनसे नाखुश थे। अकबरउद्दीन के पिता सलाउद्दीन ने इनसे बोलना बंद कर दिया था। शादी के तीन साल बाद 1998 में उनके पिता ने उनको घर बुलाया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अकबरउद्दीन की पत्नी का धर्म बदलवाकर मुसलमान बनाया गया, फिर पिता ने उनसे बोलना शुरू किया। अकबरउद्दीन के तीन बच्चे हैं।
हैदराबाद की राजनीति में बरसों से चमक रही मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन की पहचान एक मुस्लिम राजनीतिक दल के तौर पर होती है यही वजह है। कि इस पार्टी की नीयत औऱ इसके मकसद को लेकर कई तरह की आशंकाओं के स्वर भी सुनाई पड़ते रहे हैं।
एमआईएम के जन्म और उसमें आए बदलाव की कहानी की गहराई में जाने पर अनेकों विवादित बातें उभर कर आती हैं, जो हकीकत में चिन्ता का विषय होने के साथ-साथ समस्त राजनीतिक दलों--प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय-- को इस पार्टी के साथ हाथ मिलाना कहीं देश को 1947 के दौर में न ले जाए। लेकिन उससे पहले जानिए कौन हैं एमआईएम के सबसे विवादित नेता अकबरुद्दीन ओवैसी।
अकबरुद्दीन ने एक ईसाई महिला से की है शादी
जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जो परिवार अपने घर में किसी गैर-मुस्लिम को नहीं अपना सकता, वह पार्टी प्रदेश या फिर देश के अन्य धर्मों के हित की सोंच भी नहीं सकता। किस मुँह से अपने आपको धर्म-निरपेक्ष पार्टी कहलाने का अधिकार रखती है। नेताओं को 1947 और उसके बाद के इतिहास का अध्ययन करना देशहित में होगा। अन्यथा इस पार्टी की भांति अन्य पार्टियाँ भी जनता को मूर्ख बनाकर आज अपनी रोटियाँ सेंक देश को पुनः गुलामी की ओर अग्रसर कर रही हैं।
अकबरुद्दीन ओवैसी पहली बार 1999 में हैदराबाद से विधायक चुने गए। जनवरी 2014 में अकबरुद्दीन ने आंध्रप्रदेश विधानसभा में तेलंगाना पर चर्चा के दौरान यह कहकर कि 'हैदराबाद के निजाम का शासन अच्छा था', सनसनी फैला दी थी। इसके बाद विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। इधर विधानसभा में हंगामा चल रहा था, इसकी खबर जैसे ही हैदराबाद शहर में फैली तनाव हो गया। कई दिन तक सुरक्षाबलों को शहर में तैनात रखा गया। इन पर देश के खिलाफ युद्ध की साजिश रचने तक का मामला चल रहा है। देशद्रोह और आपराधिक साजिश के आरोप में 8 जनवरी 2013 को इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। अभी बिहार के किशनगंज में एक चुनावी रैली के दौरान अकबरुद्दीन ने मोदी को 'जालिम' और 'शैतान' बताया है। मोदी को 2002 के गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने पीएम के खिलाफ कई आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया।
मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन यानी एमआईएम की स्थापना आज से करीब 94 साल पहले हैदराबाद शहर में की गई थी। शुरुआत में ये एक गैर राजनीतिक संगठन हुआ करता था और इस संगठन का मकसद मुसलमानों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना था, लेकिन बदलते दौर और हालात के साथ-साथ एमआईएम का चेहरा और उसका मकसद भी बदलता चला गया और आज वो पूरी तरह एक राजनीतिक पार्टी बन चुकी है।
ये उस दौर की बात है जब देश को आजाद होने में 20 साल बाकी थे। दक्षिण भारत की रियासत हैदराबाद पर निजाम उस्मान अली खान की हुकूमत थी। निजामशाही के उस दौर में नवाब महमूद नवाज खान किलेदार ने 1927 में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन नाम के सांस्कृतिक संगठन की नींव रखी थी। 1938 में इस संगठन का पहला अध्यक्ष बहादुर यार जंग को बनाया गया था। एमआईएम के फाउंडर सदस्यों में हैदराबाद के एक राजनेता सैयद कासिम रजवी भी शामिल थे, जो रजाकार नाम के हथियारबंद लड़ाकू संगठन के मुखिया भी थे और इसीलिए मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन संगठन को खड़ा करने में रजाकारों की भी अहम भूमिका मानी जाती रही है। रजाकार और मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन संगठन निजाम हैदराबाद के पैरोकार और उनके कट्टर समर्थकों में शुमार किए जाते थे और यही वजह है कि जब 1947 में देश आजाद हुआ तो हैदराबाद रियासत के भारत में विलय का कासिम रजवी और उसके पैरामिल्ट्री संगठन यानी रजाकारों ने जमकर विरोध भी किया था।
नवंबर 1947 में भारत के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल और कासिम रजवी की दिल्ली में पहली और आखिरी मुलाकात हुर्इ थी। कासिम रजवी निजाम हैदराबाद का खासम-खास था और 1947 आते आते निजाम और उसकी सरकार पूरी तरह से रजवी की गिरफ्त में आ चुकी थी। 10 सिंतबर 1948 को सरदार पटेल ने हैदराबाद के नवाब को एक खत लिखा। उन्होंने हैदराबाद को हिंदुस्तान में शामिल होने का आखिरी मौका दिया था, लेकिन हैदराबाद के निजाम ने जब सरदार पटेल की अपील ठुकरा दी तो इसके जवाब में भारतीय सेना ने 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद रियासत पर चारों तरफ से धावा बोल दिया और आखिरकार निजाम हैदराबाद को झुकना पड़ा।
हैदराबाद रियासत के भारत में विलय के बाद मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन संगठन भी कुछ सालों तक निष्क्रिय पड़ा रहा, लेकिन साल 1958 में एक बार फिर एमआईएम एक नई सोच के साथ राजनीतिक के मैदान में कूद पड़ा। सन 1958 में मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन को हैदराबाद के ही मशहूर वकील मौलवी अब्दुल वहीद ओवैसी ने दोबारा सक्रिय किया था। साल 1959 में एमआईएम ने चुनावी राजनीति में अपना पहला कदम रखा और हैदराबाद म्यूनसपालिटी के उपचुनाव में वो दो सीटें जीतने में कामयाब भी रही थी। ये वो पहली जीत थी जिसके बाद एमआईएम और ओवैसी खानदान की राजनीति का सिलसिला हैदराबाद में फिर कभी थमा नहीं।
अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी उसके अध्यक्ष बने। बढ़ती हुई लोकप्रियता के साथ साथ सलाहुद्दीन ओवैसी 'सलार-ए-मिल्लत'(मुसलमानों के नेता) के नाम से मशहूर हुए। वर्ष 1984 में वो पहली बार हैदराबाद से लोक सभा के लिए चुने गए साथ ही विधान सभा में भी उस के सदस्यों की संख्या बढती गई। हालांकि कई बार इस पार्टी पर एक सांप्रदायिक दल होने के आरोप लगे, लेकिन आंध्र प्रदेश की बड़ी राजनैतिक पार्टिया कांग्रेस और तेलुगुदेशम दोनों ने अलग-अलग समय पर उससे गठबंधन बनाए रखा।
दिलचस्प बात यह है की हैदराबाद नगरपालिका में यह गठबंधन अभी भी जारी है और कांग्रेस के समर्थन से ही मजलिस को मेयर का पद मिला है। 2009 के चुनाव में एइएमइएम ने विधान सभा की सात सीटें जीतीं जो की उसे अपने इतिहास में मिलने वाली सब से ज्यादा सीटें थीं। कांग्रेस के साथ उस की लगभग 12 वर्ष से चली आ रही दोस्ती में उस समय अचानक दरार पड़ गई, जब चारमीनार के निकट एक मंदिर के निर्माण के विषय ने एक विस्फोटक मोड़ ले लिया।
मजलिस ने कांग्रेस सरकार पर मुस्लिम-विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया और उस से अपना समर्थन वापस ले लिया। अकबरुद्दीन ओवैसी के तथाकथित भाषण को लेकर जो हंगामा खड़ा हुआ है और जिस तरह उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज गया है उसे कांग्रेस और मजलिस के टकराव के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। अधिकतर हैदराबाद तक सीमित मजलिस अब अपना प्रभाव आंध्र प्रदेश के दूसरे जिलों और पडोसी राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक तक फैलाने की कोशिश कर रही है।मजलिस केवल मुस्लिम भावनाओं के ही दम पर देश में अपना प्रभुत्व फ़ैलाने का प्रयास कर रही है और मुसलमान इस पशोपेश में कि "क्या भारत में मुसलमान का अस्तित्व वास्तव में अधर में है?"
हाल ही में उस ने महाराष्ट्र के नांदेड़ नगर पालिका में 11 सीटें जीत कर हलचल मचा दी है। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस इस संभावना से परेशान है कि आगामी चुनाव में एइएमइएम जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकती है। अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ्तारी के बाद तो मजलिस और कांग्रेस के बीच किसी समझौते की सम्भावना नहीं रह गई। यानि दक्षिण में जीवित रहने के कांग्रेस के अरमानों पर भी पानी फिरता नज़र आ रहा है।
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