ऐसे ही लोगों की लिस्ट में तारिक़ फ़तेह, तस्लीमा नसरीन और सलमान रुश्दी जैसे लोग है जिन को न्यूज़ चैनलो अपने डीबेट में मुसलमान की तरह पेश करते है और उनसे मुसलमानो से जुड़े मसलो पे बहस की जा रही है और ऐसे मुददों को उठाया जाता है जिससे इस्लाम और मुसलमान को यहाँ के बहुसंख्यक के सामने नंगा किया जा सके और देश के मुसलमानो के खिलाफ नफ़रत का माहौल बनाया जा सके।जिस दिन यदि किसी भी हिन्दू या हिन्दू स्वयंसेवी संस्था ने इनमें से किसी के विरुद्ध कोई कार्यवाही की, उसी दिन देखिये किस तरह ये ही विरोधी इन तीनों के पक्ष में एकजुट होकर विधवा-विलाप करते नज़र आएंगे। सड़कों पर खूब नंगा नाच होगा कि "नारा ओ तकबीर अल्लाह ओ अकबर ; इस्लाम खतरे में" आदि नारों से आसमान सिर पर उठा लेंगे। तब इन तीनो इस्लाम विरोधी मुसलमानों को बड़ा विद्धवान का प्रमाण देने सब इक्कठे हो जाएंगे।
सलमान रुश्दी
जिसकी अय्याशीओ को दुनिया जानती है अपनी बेटी की उम्र की लड़की से चौथी बार शादी रचाई उसके बाद भी श्रीमान जी के कई लडकियों से रिश्ते है ,रश्दी ने अपनी लोकप्रियता इस्लाम के खिलाफ बोल के ही पायी है लेकिन पश्चिमी मीडिया अब इनको ज्यादा मौका नही दे रही है मगर अब इनका उपयोग भारत की मीडिया कर रही है
बांग्लादेश से निकाल दिया गया और जो मर्दो को अपनी किताबो में कुत्ता और अपनी ज़िन्दिगी में सिर्फ सेक्स करने की चीज़ मानती है, जिसकी लिखी गई किताबें अपनी अश्लीलता की वजह से जानी जाती है और इन्ही वजहों से उसको इस्लाम से खारिज किया जा चूका है, वैसे तो तस्लीमा नसरीन अपने को प्रगतिशीत कहती है लेकिन भारत में बहुसंख्यक समाज के भगवा ब्रिगेड पर बोलने पर उनकी आवाज़ बंद हो जाती .
नसरीन को भी शायद पता है भारत की मीडिया में अगर अपनी आवाज़ बेचना है तो बहुसंख्यक पर चुप रहना होगा और मुस्लिम पे निशाना साधना होगा .
तारिक़ फ़तेह
यह कादियानी (अहमदिया) है मुस्लिमो में एक राय है और आलमी इस्लामिक संस्था ने भी ये घोषित कर दिया है कि कादियानी इस्लाम से अलग है लेकिन फ़तेह को भारतीय मीडिया मुस्लिम बना के पेश करती है और उनकी राय को इस्लाम की राय बताती है
आजकल ट्रिपल तलाक पर ट्रिपल तलाक़ पर बैन लगाने की बात करने वाली महिलाओ की राय मीडिया द्वारा प्रकाशित की जाती है आप को बता दू मुस्लिम 99 फीसद महिलाए ट्रिपल तलाक पर ही शर्रियत के सभी कानूनो पर सरकार की दखलंदाज़ी से खिलाफ है लेकिन मुस्लिम महिलाओ की असल राय को मीडिया ना दिखा कर तस्वीर बदलने की कोशिश कर रहा है।
इस्लाम के विरुद्ध प्रकाशित होगा कहीं, लेकिन तोड़फोड़ होगी,प्रदर्शन होंगे भारत में, क्यों? फिर एक ज्वलन्त प्रश्न यह है कि विश्व में जितने भी धर्म हैं, देवी-देवता हैं, सब पर हुआ शोध सार्वजनिक भी हुआ, लेकिन इस्लाम संस्थापक मोहम्मद पर सार्वजनिक नहीं हुआ, क्यों?

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