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| कहाँ जाए, किससे फरियाद करे, यह बदनसीब माता-पिता जिनके तीनों युवा लड़कों को मार दिया गया? |
सरकार किस हद तक निरंकुश हो सकती है नितीश कुमार उसका नमूना है , आम आदमी कितना असहाय है चंदा बाबू इसके ज्वलंत उदाहरण हैं...सफेदपोश कितने निर्भीक, मदमस्त और क्रूर हो सकता है शहाबुद्दीन इसकी मिसाल है ... इसलिए आलोचना भी नहीं, किसके लिए लिखे और क्यों ? समाज को नेता वैसा ही मिलता है जैसा समाज खुद होता है और जैसी समाज की सोच होती है। ...
ये तो जोरदार तमाचा है उनके मुँह पर जो बाते करते है सामाजिक न्याय की और बिहार में कानून के राज की, कानून अँधा होता है, यह साबित तो पहले ही हो चुका था, कानून सत्ता के आगे नतमस्तक है यह साबित हो गया !
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| सत्ता का आनन्द लेता खूंखार अपराधी ! क्या ऐसा नेता समाज का या देश का भला कर सकते हैं? |
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| जस्टिस ठाकुर साहब ये दुःखी वृद्ध किसके आगे रोएं ? इनके बेटों का कातिल बाहर कौन से कानून से आया? |
मुझे हमेशा हैरानी होती है कि हमारी न्याय व्यवस्था में कहीं कोई ज़िम्मेदारी तय ही नहीं है। जिस मामले में जिन सबूतों की बुनियाद पर निचली अदालत में कोई व्यक्ति गुनहगार साबित हो जाता है, उसी मामले में उन्ही सबूतों के रहते ऊपरी अदालत में वह व्यक्ति साफ बरी हो जाता है (शहाबुद्दीन के मामले में फिलहाल सिर्फ़ जमानत हुई है, जिसके फलस्वरूप, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1300 गाड़ियों का काफिला निकला है)। इसी तरह कई मामलों में निचली अदालत में जो लोग जिन सबूतों के आधार पर बरी हो जाते हैं, ऊपरी अदालत में उन्हीं सबूतों के आधार पर उन्हें सज़ा सुना दी जाती है।
इसका एक सीधा मतलब तो मुझे यह समझ आता है कि जिन मामलों में निचली और ऊपरी अदालतों के फ़ैसले बिल्कुल विपरीत होते हैं, उन मामलों में किसी एक जगह तो गड़बड़ी होती ही है- चाहे तो निचली अदालत में या फिर ऊपरी अदालत में। लेकिन हमारी न्यायिक प्रक्रिया में इस गड़बड़ी की जांच-पड़ताल करने और ज़िम्मेदारी तय करने की संभवतः कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है।
कानून बिकता है, खरीदार चाहिए
कोई जज या जजों का समूह बिल्कुल ग़लत फैसले सुनाकर भी न्यायमूर्ति कहलाता रह सकता है। उस पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता। उसकी कोई जांच नहीं की जाती। किन परिस्थितियों में, किन दबावों में, किन भयों अथवा लालचों के अधीन वह ग़लत फ़ैसले सुनाता है, इस पर विचार करने वाली या इसकी निगरानी करने वाली कोई व्यवस्था इस देश में अब तक विकसित नहीं हो पाई है।
कोई जज या जजों का समूह बिल्कुल ग़लत फैसले सुनाकर भी न्यायमूर्ति कहलाता रह सकता है। उस पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता। उसकी कोई जांच नहीं की जाती। किन परिस्थितियों में, किन दबावों में, किन भयों अथवा लालचों के अधीन वह ग़लत फ़ैसले सुनाता है, इस पर विचार करने वाली या इसकी निगरानी करने वाली कोई व्यवस्था इस देश में अब तक विकसित नहीं हो पाई है।
इसीलिए, कभी-कभी मेरे जैसा आशावादी और सकारात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति भी अपनी न्याय-व्यवस्था के प्रति हताशा और अविश्वास के भाव से भर जाता है। कोई शहाबुद्दीन जेल में है कि बाहर है- जितनी चिंता मुझे इस बात से नहीं होती, उससे अधिक चिंता इस बात से होती है कि देश के ग़रीबों-गुरबों, कमज़ोरों और वंचितों का भरोसा इस देश की न्यायपालिका पर टिका रहता है कि नहीं।
बूढ़े चंद्रकेश्वर बाबू उर्फ़ चंदा बाबू को इंसाफ़ कैसे दिलाओगे?

मैं हैरान होता हूं कि कोई भी अदालत सबूत होने या न होने की आड़ में बिल्कुल एकतरफा फैसले कैसे सुना सकती है? आज शहाबुद्दीन को जमानत दी है, कल बरी भी कर देना, मेरी बला से। लेकिन उस बूढ़े चंद्रकेश्वर बाबू उर्फ़ चंदा बाबू को इंसाफ़ कैसे दिलाओगे, जिसके तीन बेटों की हत्या हो चुकी है? उस बूढ़े बाप के उन तीन जवान बेटों का कोई तो कातिल होगा? उसको कब सज़ा दोगे? जब वह बाप भी लड़ते-लड़ते मर जाएगा या मार दिया जाएगा- तब? या उसके बाद भी नहीं दोगे?
ऐसे सवाल अक्सर हत्याकांडों और नरसंहारों के फैसलों के बाद उठते रहते हैं, लेकिन हमारी सरकारों, जांच एजेंसियों, अदालतों और जजों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। इसी बिहार में बथानी टोला, शंकर बिगहा, लक्ष्मणपुर बाथे इत्यादि भीषण नरसंहारों के मामलों में भी सबूतों के अभाव में सभी आरोपी बरी कर दिए गए थे, पर हमारे न्यायालयों और न्यायाधीशों ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि अगर बरी किए गए लोगों ने हत्याएं नहीं कीं, तो गुनहगार कौन थे और कब एवं कौन उन्हें पकड़ेगा और सज़ा सुनाएगा। इन हत्याकांडों की ढीली जांच और इंसाफ़ का गला घोंटने के लिए भी किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं की गई।
इस देश का एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते देश की अदालतों से मेरी यह अपेक्षा है कि जब कभी उसके सामने ऐसे मामले आते हों, जिनमें एक पक्ष काफी ताकतवर और दूसरा पक्ष तुलनात्मक रूप से बेहद कमज़ोर हो, तो वह अधिक सक्रियता, संवेदनशीलता और दिलचस्पी दिखाते हुए सरकारों और जांच एजेंसियों को निष्पक्ष, प्रभावी और त्वरित जांच करने के लिए बाध्य करे।
लेकिन दुख होता है, जब देखते हैं कि अदालतें कुछ मामलों में तो ऐसा करती हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में उसका रवैया बेपरवाही का ही रहता है। हमारी अदालतें फिल्मों जैसी नहीं होनी चाहिए, जिनमें इंसाफ़ की देवी की आंखों पर काली पट्टी बंधी रहती है। हमारी अदालतों में बुद्धि, विवेक, संवेदनशीलता, दया और ममता का समावेश होना चाहिए। हमारी अदालतें अधिक मानवीय होनी चाहिए।
चीफ जस्टिस साहब, आंसू बहाने से काम नहीं चलेगा, न सियासी लोगों के भाषणों की राजनीतिक व्याख्या करने से काम चलेगा। न्याय-व्यवस्था के कोढ़ को खत्म करने के लिए क्या इलाज है आपके पास? कभी इसका ख़ाका भी रखिए देश की जनता के सामने। कभी उन आंखों में भी देखिए उतरकर, जिनके आंसू सूख चुके हैं। फिलहाल चंद्र बाबू की आंखें आपको ढूंढ रही हैं। क्या आप इंतज़ार करेंगे कि वे आप तक पहुंचें या आप स्वयं भी उन तक पहुंच सकते हैं?
मोदी अकेला क्या करे?
न्यायपालिका खुद अपने से संज्ञान नही ले सकती । ये भी बिडम्बना ही है गलत को जानते हुए भी यदि न्याय व्यवस्था आँखे बन्द कर ले तो देश को गुलामी की ओर धकेलने से कोई नही रोक सकता । मोदी भी अकेला क्या करे उसे भी जनता की आवाज़ की जरूरत है जब आवाज़ उठेगी तब तो वह कार्यवाही करेगा । मोदी को भी तो जबाव देने के लिए कुछ हो , अपने मन से कुछ भी मोदी जी करेगे तो विपक्ष उन्हें भी जीने नही देगा ।
बाबूजी के दर्द को महसूस करना बहुत ही मुश्किल है पर जंगल राज में आदत डालनी होगी ये इन्हें समझ में नहीं आएगा।
प्रशांत भूषण ने कसी कमर
न्यायपालिका खुद अपने से संज्ञान नही ले सकती । ये भी बिडम्बना ही है गलत को जानते हुए भी यदि न्याय व्यवस्था आँखे बन्द कर ले तो देश को गुलामी की ओर धकेलने से कोई नही रोक सकता । मोदी भी अकेला क्या करे उसे भी जनता की आवाज़ की जरूरत है जब आवाज़ उठेगी तब तो वह कार्यवाही करेगा । मोदी को भी तो जबाव देने के लिए कुछ हो , अपने मन से कुछ भी मोदी जी करेगे तो विपक्ष उन्हें भी जीने नही देगा ।
बाबूजी के दर्द को महसूस करना बहुत ही मुश्किल है पर जंगल राज में आदत डालनी होगी ये इन्हें समझ में नहीं आएगा।
प्रशांत भूषण ने कसी कमर
हत्या के गंभीर मामले में 12 साल बाद जेल से निकले मोहम्मद शहाबुद्दीन की जमानत को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रहे हैं। प्रशांत भूषण ने कहा है कि किसी शख्स ने उन्हें फोन करके मदद मांगी है, जिसके चलते वो ऐसा करेंगे।
प्रशांत भूषण का कहना है कि इतने गंभीर अपराध के मामले में शहाबुद्दीन को जमानत नहीं दी जानी चाहिए थी। और इसलिए वो हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। उन्होंने कहा कि वो शीर्ष अदालत से शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने की मांग करेंगे। प्रशांत भूषण ने कहा कि मुझे फैसले को देखकर लगता है कि सरकार की तरफ से शायद कोई मदद की गई है। लेकिन मुझे नहीं पता कि ये कैसी मदद है।
लालू के राष्ट्रीय जनता दल(आरजेडी) के पूर्व सांसद रहे मोहम्मद शहाहुद्दीन पर हत्या का आरोप है। इस मामले के चलते उन्हें 12 साल बाद जमानत दी गई है। वो भागलपुर जेल से रिहा हुए हैं। बता दें कि आरजेडी और जदयू की गठबंधन सरकार बनने के बाद से ही बिहार में 'गुंडा राज' का आरोप तमाम विपक्षी पार्टियां लगाती आ रही हैं। शहाबुद्दीन की रिहाई पर भी भाजपा ने सरकार पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि मामले में ट्राइल न होने की वजह से ये रिहाई आसान हो गई।
राजद के पूर्व सांसद और बाहुबली नेता शहाबुद्दीन सितम्बर 10 को भागलपुर जेल से रिहा होने के बाद कहा, “नीतीश कुमार परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री हैं, हमारे नेता लालू प्रसाद थे, हैं और रहेंगे।” इसके बाद शहाबुद्दीन ने कहा था, “नीतीश कुमार परिस्थिति के अनुसार अपना रुख बदल लेते हैं। वह मेरे नेता नहीं हैं। लालू हमेशा मेरे नेता रहेंगे।”
शहाबुद्दीन पर हत्या, रंगदारी और अपहरण के 35 आपराधिक मामले चल रहे हैं। सात मामलों में उन्हें दोषी करार दिया जा चुका है।
“मुझे अपनी इमेज नहीं सुधारनी है, जनता को मेरी यही इमेज पसंद है।" -- शाहबुद्दीन
इस बयान का जनता दल (युनाइटेड) के श्याम रजक, नीरज कुमार और संजय सिंह जैसे कुछ नेताओं ने प्रतिकार किया था। इन्होंने कहा था कि जदयू, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के सत्तारूढ़ महागठबंधन ने वर्ष 2015 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के नाम पर चुनाव जीता था।
शहाबुद्दीन सितम्बर 10 को 11 साल तक विभिन्न मामलों में जेल में रहने के बाद पटना उच्च न्यायालय द्वारा राजीव रोशन की हत्या मामले में जमानत मिलने के बाद रिहा हुए हैं। जेल से बाहर निकलने के बाद उनके सैकड़ों समर्थकों ने जश्न मनाकर उनका स्वागत किया।
शहाबुद्दीन ने दावा किया कि उन पर आपराधिक मामले मढ़े गए हैं और पटना उच्च न्यायालय से चार दिनों पहले एक हत्या के एक मामले के गवाह की हत्या के मामले में मिली जमानत का राजनीति से कोई लेनादेना नहीं है।
शहाबुद्दीन पर हत्या, रंगदारी और अपहरण के 35 आपराधिक मामले चल रहे हैं। सात मामलों में उन्हें दोषी करार दिया जा चुका है।
वर्ष 2005 में गिरफ्तारी से पहले वह राजद के सांसद थे। वर्ष 1996 से 2009 तक वह चार बार सीवान से राजद के सांसद रह चुके हैं।
शहाबुद्दीन का सीवान में करीब दो दशकों तक आतंक रहा है।
शहाबुद्दीन को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की हत्या के लिए भी जाना जाता है। इनमें जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर की वर्ष 1997 में हुई हत्या भी शामिल है।
वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव तक सीवान की सड़कों पर दूसरे राजनीतिक दलों के प्रचार वाहन को चलने की इजाजत नहीं थी। प्रतिद्वंद्वी दलों के कार्यकर्ता उत्तर बिहार के चुनाव क्षेत्रों में पोस्टर लगाने से डरते थे।
| शाहबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब राजद के टिकट से नामांकन के लिए जाते हुए |
वर्ष 2005 में राष्ट्रपति शासन के दौरान क्रमश: सीवान के जिलाधिकारी और एसपी रहे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सी.के. अनिल और भारतीय पुलिस सेवा के रतन संजय ने शहाबुद्दीन पर कार्रवाई की थी और उन्हें जिला से बाहर भागना पड़ा था।
शहाबुद्दीन को पहली बार वर्ष 2007 में भाकपा (माले) के छोटे लाल गुप्ता के अपहरण के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। तब से आधे दर्जन और मामलों में सजा हो चुकी है।
शहाबुद्दीन ने जेल से निकलने के बाद यह भी कहा है, “मुझे अपनी इमेज नहीं सुधारनी है, जनता को मेरी यही इमेज पसंद है।”





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