दरअसल, घाटी में जो कुछ भी चल रहा है उन सबके पीछे यहां के अलगाववादी नेताओं का ही हाथ है। उन्हें पाकिस्तान से पूरी शह मिली हुई है। बाकायदा कश्मीर में हिंसा भड़काने के लिए पाकिस्तान कश्मीर में पैसा भेज रहा है। देश की जांच एजेंसियां इन सबकी जांच कर रही हैं। उन्हें बहुत सारे सबूत भी मिले हैं। बस कार्रवाई के लिए माकूल वक्त का इंतजार है। दरअसल, शायद देश के इतिहास में ये पहला मौका होगा जब केंद्र या राज्य की सरकार किसी भी अलगाववादी नेता को पूछ तक नहीं रही है।
मोदी सरकार में कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया गया है। नहीं तो इससे पहले जितनी भी सरकार केंद्र में रही हों या फिर जम्मू-कश्मीर की सत्ता में रही हो, सबसे घाटी के इन अलगाववादी नेताओं को ‘दामाद’ की तरह की डील किया है। लेकिन, इस बार ऐसा कुछ नहीं है। मोदी सरकार ने अलगाववादी नेताओं को कड़ा संदेश दिया है कि किसी भी सूरत में उनके सामने घुटने नहीं टेके जाएंगे।
घाटी में हालात सामान्य करने की कोशिश में लगा केंद्र अलगाववादी नेताओं की इस 'बदसलूकी' को रणनीतिक बढ़त मान रहा है।सरकारी सूत्रों ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल को अलगाववादियों से जानबूझकर मिलने से रोका नहीं गया। बता दें कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि मुलाकात के लिए सरकार की तरफ से न तो हां थी और न ही रोका गया था।
सरकारी सूत्रों का मानना है कि इस घटना ने केवल अलगाववादियों को 'एक्सपोज' किया है और इससे उन पर काबू पाने में मदद भी मिलेगी। पूरे मामले से घाटी की जनता को यही मेसेज जाएगा कि अलगाववादी इस समस्या का हल होते नहीं देखना चाहते।
घाटी के दौरे से लौटे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की अगुआई कर रहे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी से मिलकर पूरे मामले की जानकारी दी है। वहीं, आज यानी बुधवार को राजधानी में सर्वदलीय बैठक होगी।
सरकारी सूत्रों ने संकेत दिए कि फेस्टिवल सीजन के बाद घाटी में हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे क्योंकि 'अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी'। इस मामले पर महबूबा सरकार और केंद्र दोनों एकराय हैं और हिंसा में शामिल लोगों को लेकर नरमी नहीं बरती जाएगी।
शायद यही वजह है कि 4 नवंबर को जो ऑल पार्टी डेलीगेशन कश्मीर के दौरे पर जा रहा था, वो अलगाववादी नेताओं से अपनी ओर से बात ना करे। अगर बात हुई भी तो उन्हें उनकी हद और औकात बताने के लिए होगी। जबकि इससे पहले जब भी घाटी में हिंसा होती थी तो ये अलगाववादी नेता सरकारों से मोलभाव किया करते थे। लेकिन, इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है। इन अलगाववादी नेताओं को दर्द और तकलीफ इसी बात की है।
हैदरपुरा में गिलानी के घर के बाहर उनके समर्थक इकठ्ठे हो गए और जैसे ही सांसदों की कारें और सुरक्षा वाहन गुजरने लगे, उन्होंने ‘भारत जाओ, वापस जाओ’ और ‘हमें आजादी चाहिए’ जैसे नारे लगाए।
हैदरपुरा में अपने नाकाम प्रयास के बाद तीनों नेता सम्मेलन केंद्र शेर-ए-कश्मीर में वापस लौट आए, जहां पहले वे मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ सभी पार्टियों की एक बैठक में शामिल हुए थे।
शरद यादव, येचुरी और राजा पहले श्रीनगर हवाईअड्डे के पास हमामा में एक जेल में तब्दील किए गए पुलिस शिविर में जम्मू एवं कश्मीर मुक्ति मोर्चा (जेकेएलएफ) प्रमुख मोहम्मद यासिन मलिक से मिलने गए थे।
सूत्रों ने आईएएनएस को बताया कि मलिक ने सांसदों से केवल 10 मिनट के लिए मुलाकात की, वह भी यह कहने के लिए कि उनके साथ बातचीत का कोई अर्थ नहीं है।
इससे अलग, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के असदुद्दीन ओवैसी हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के नेता मीरवाईज से मुलाकात के लिए चश्मा शाही गए थे, जहां एक टूरिस्ट रिजॉर्ट को उपकारागर में तब्दील किया गया है।
उपकारागार में अलगाववादी नेता शबीर शाह को भी लाया गया था।
मीरवाईज ने ओवैसी से कहा कि हुर्रियत ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ आए सांसदों से मुलाकात न करने का पहले ही फैसला कर लिया था।
निराश ओवैसी ने उसके बाद लगभग दस मिनट के लिए शबीर शाह से मुलाकात की, लेकिन शाह ने भी साफ कर दिया कि वह सांसदों या सरकार के साथ बात नहीं करना चाहते।
शाह ने कहा, “मैने उन्हें बताया कि कश्मीरियों से बात करने का यह सही तरीका नहीं है। आप मुझे पुलिस स्टेशन से एक उपकारागर में लाए हैं और मुझसे बातचीत की उम्मीद कर रहे हैं।”
शाह ने कहा, “मैंने उन्हें साफ तौर पर बता दिया कि उन्हें पहले (कश्मीर घाटी में) स्थिति का पता लगाना चाहिए और उसके बाद सही तरीके से बातचीत करनी चाहिए।”
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