| इस काम को क्या नाम दिया जाए? देशद्रोह या देशभक्ति? |
अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने कहा कि कश्मीर आजादी के करीब है। सितम्बर ९ को गिलानी ने कहा कि आजादी की लड़ाई का वर्तमान चरण आजादी के लक्ष्य के काफी करीब ले गया है। अब आजादी नजरों के सामने हैं। उन्होंने मीडियाकर्मियों को लिखे खत में यह बात कही। गिलानी ने यह खत प्रेस कांफ्रेंस की अनुमति न मिलने के बाद जारी किया है। उन्होंने सुबह 11 बजे हैदरपुरा स्थित घर पर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी लेकिन प्रशासन ने उनके घर की ओर जाने वाले रास्तों पर पाबंदी लगा दी। गिलानी ने लिखा कि ‘कमांडर बुरहान के शहीद’ होने के बाद से प्रत्येक गांव और कस्बे से यह संदेश आया है कि भारत और कश्मीर के बीच केवल किरायेदार और कब्जेदार का रिश्ता है। उसने अब्दुल्ला, मुफ्ती, लोन और ऐसे अनगिनत नामों के रूप में परदे बनाए।
उन्होंने लिखा, ”हम हमेशा से कह रहे हैं कि ये सहयोगी भारत की कठपुतली मात्र हैं और आज यह साफ है कि उनका एकमात्र काम भारत के कब्जे को मजबूत करना और हमारे लोगों की हत्याओं व उन्हें अंधे करने पर सफाई देना भर है। उन्होंने मारने के लिए आजादी समर्थक नेताओं, कार्यकर्ताओं, कारोबारियों, सरकारी कर्मचारियों और पत्रकारों की सूची बनाई है।” गिलानी ने लिखा, ”हम पर कब्जा करने वाले के पास दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना है। उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी पैरामिलिट्री फॉर्स है जिनमें से ज्यादातर कश्मीर में तैनात है। यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हमारे पास लोगों की प्रतिरोधक क्षमता है। हमारे पास कोई साधन नहीं। कोर्इ सेना नहीं। हमारे पास मीडिया नहीं। लेकिन हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारा सच, एकता और आजाद कराने का निश्चय है।”
उन्होंने पाकिस्तान केा दोस्त बताते हुए कहा कि उन्होंने एक बार फिर से साबित किया कि वे हमारे साथी हैं। गिलानी ने लिखा, ”पाकिस्तान और उसके लोग हमारे दर्द को समझते हैं। पाकिस्तान और उसके लोगों ने हमारे संघर्ष को नैतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक सहयोग दिया है।” गौरतलब है कि कश्मीर में लगभग दो महीने से तनाव चल रहा है। यहां अब तक 75 लोगों की मौत हो चुकी है।
अलगाववादियों के बच्चो की कश्मीर में पाबन्दी
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| सख्त होती केन्द्र सरकार |
लेकिन गिलानी यह बताना शायद भूल गए कि इनके गुलाम पत्थरबाजों ने कितने भारतीय सैनिकों को क्षति पहुंचाई है। सूत्रों के अनुसार, आज जिस तरह कश्मीर में वातावरण बन रहा है, घाटी में इन्ही पत्थरबाजों में एक बात घर करने लगी है कि "जेहाद और जन्नत के नाम पर जिस तरह हमें उकसाया जा रहा है, ये लोग अपने बच्चों को जम्मू-कश्मीर से बाहर रखे हुए हैं?घर वीरान हो रहे हमारे, मलाई इनके बच्चे खाएँ, इनके कितने बच्चों ने पुलिस या सैनिकों के डंडे या गोली खायी है? कितने बच्चों ने कर्फ्यू में हो रही तकलीफों को झेला है?" आदि अनेकों प्रश्न एवं सोंच इन्ही पत्थरबाजों में घर करने के कारण, डर है वह दिन भी बहुत दूर नहीं होगा कि घाटी में इन्ही के बच्चों पर माहौल सामान्य होने पर घाटी में ये ही पत्थरबाजों के दुःखी परिवार वाले पाबन्दी ने लगा दें।
| चेहरा ढक कर इन पत्थरबाजों को किसका समर्थन है? |
सूत्रों ने आगे बताया कि इन घाटीवासियों में शक है कि इन नेताओं को सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के रास्ते दूसरे मुस्लिम देशों से खूब धन आ रहा है। और अब यह भी खुलासा हो गया कि केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें भी खूब मालपुए खिला रही थीं,जिस पर यह सब आराम की ज़िन्दगी जी रहे हैं और घाटी के निर्धन कुछ रुपयों के लालच में आ कर इनकी तिजोरियाँ भर रहे हैं। अब जिन पत्थरबाजों की आँखों की रौशनी चली गयी है, किसी भी पीड़ित का दर्द पूछने कोई नहीं आया। बल्कि वही सरकारें इलाज कर रही हैं, जिनके विरुद्ध जेहाद के नाम पर पत्थरबाज़ी करते यह दुःख नसीब हुआ।
| कोई पत्थरबाज़ी के विरोध में क्यों नहीं बोलता? क्यों सुरक्षा कर्मियों पर हमले किये जाते हैं? |
यदि सूत्रों की जानकारी पर विश्वास किया जाये, वास्तव में घाटी में एक बार त्राहि-त्राहि तो मचने के असर दिख रहे हैं, परन्तु वह त्राहि इन अलगाववादी नेताओं के लिए एक अभिशाप के रूप में आएगी। जिसदिन भारतीय सरकारों ने इन अलगाववादियों को दी जाने वाली मदद को बंद कर दिया, इनके घरों में मातम छाना शुरू हो जायेगा। ऐश की ज़िंदगी जीने वाले ज़मीन पर आ जाएंगे।
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| ये देश विरोधी हरकतें किसके इशारे पर हो रही हैं? |



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