- ये है लखनऊ की पत्रकार
केन्द्रीय सरकार प्रदेश का मुद्दा होने के कारण हस्तक्षेप नहीं करती और प्रदेश सरकार अपने वोटों की चिन्ता में इस अतिगम्भीर मुद्दे पर आँखें बन्द किये बैठी है। अभी दो वर्ष पूर्व, जब एक हिंदी पाक्षिक का संपादन कर रहा था, अनेकों पत्र क्षेत्रीय संवाददाता के लिये आते, वह भी 90 प्रतिशत उत्तर प्रदेश के अध्यापकों के , जो अंग्रेजी तो क्या हिन्दी भी ढंग से नहीं लिख पाते थे। एक कन्नौज से थे, क्या लिख रहे हैं पता ही नहीं चलता लिखना क्या चाहते हैं ? कई बार ऐसे लेखों से परेशान होकर संपादक को ही लिखने के खिसका देता।
बच्चों को मिड-डे भोजन देना ही पर्याप्त नहीं है, शिक्षक की योग्यता सर्वोपरि होनी चाहिए। मिड-डे हमें भी मिलता था, परन्तु उस समय इसका शोर नहीं था, आज इस आड़ में व्यापार हो रहा है।
इसके लिए सरकार ही दोषी है, कि आखिर किस योग्यता के आधार पर शिक्षक नियुक्त किया गया ? इतना निश्चित है जिस दिन जिस किसी भी सरकार ने नगर निगम/पालिका एवम सरकारी स्कूलों के अध्यापकों की परीक्षा ली, हज़ारों की संख्या में अध्यापकों का निलंबन होगा। नितऱोज़ सड़कों पर प्रदर्शन और भूख हड़तालें होंगी। कुछ लोग बच्चों के भविष्य को किसी दीनदुनिया के योग्य नहीं रख रहे, वही सरकार को कोसते नज़र आएंगे।निम्न विडियो स्पष्ट संकेत दे रहा है कि इस तरह की नियुक्तियां अध्यापक की योग्यता पर नहीं वरन भ्रष्टाचार के माध्यम से हुई हैं। तथा किस शिक्षा मंत्री एवं अधिकारियों के काल में इनकी नियुक्ति हुई है, सबके खातों की जाँच हो।


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