जिस प्रकार दयाशंकर की मायावती पर टिप्पणी के बाद जो भूचाल आया उससे अब बीजेपी को निजात मिलती नजर आ रही है.
एक चेनल पर स्वाती सिंह की सभ्य , तीखी और सधी हुयी दलीले सुनकर लगा कि मायावती को माकूल जबाब देने वाली एक महिला का जन्म हो चूका है. एक पढ़ी लिखी सांस्कारिक महिला का तेवर और अंदाज़ देखा, जिसका परिणाम हुआ कि दिल्ली में मायावती को स्वाती सिंह पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ी.
पत्रकारों को मायावती ने बोलने नही दिया, बार बार गला सूख रहा था उनका. सच मानिये बीजेपी ने दयाशंकर सिंह को खोकर एक मजबूत नेत्री पा ली है बशर्ते स्वाती राजनीति में आएं. बीजेपी को चाहिए कि मायावती के खिलाफ स्वाती सिंह को विधानसभा चुनाव में उतारे , तो शायद मैडम का बुखार उतर जायेगा.
लेकिन जिस तरह बैकफुट पर खड़ी बीजेपी को स्वाती के रूप में संजीवनी मिल गई है. निश्चित ही इस घटना से प्रदेश की राजनीती में एक नये दौर का जन्म होगा. राजनीती का धुर्वीकरण होगा.
अभी कुछ वर्ष पूर्व अक्षय कुमार और करीना कपूर अभिनीत फिल्म आई थी “ऐतराज़” जिसमें बॉस(प्रियंका चोपड़ा) द्वारा अक्षय कुमार पर बलात्कार का आरोप लगाया जाता है, किसी कारणवश वकील की एक्सीडेन्ट में मौत हो जाती है, जिस कारण केस अक्षय के विरुद्ध जाना निश्चित था। परन्तु वकील की जगह पत्नी(करीना) के खड़े होते ही पासे पलट जाते हैं और अक्षय केस जब जीत जाता है, तब वादी का वकील(परेश रावाल) कहता है कि “तुम केस इसलिए जीत गए क्योंकि केस तुम्हारी पत्नी ने लड़ा”. लगता है ठीक वैसा ही दयाशंकर सिंह बनाम मायावती में चरितार्थ होने जा रहा है। जो लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के हाथ से लगभग निकल चुकी थी। मायावती के गुर्गों द्धारा दयाशंकर सिंह की माँ, पत्नी और बेटी के लिये बोले गए अभद्र शब्द और पत्नी स्वाति द्धारा मोर्चा सम्भालने से उत्तर प्रदेश में ज़बरदस्त राजनीतिक बदलाव ला दिया है। भाजपा के विरुद्ध जाती हवा को पुनः भाजपा की ओर मोड़ दिया और अब पूरी सम्भावना है, दयाशंकर सिंह के पक्ष और मायावती के विरुद्ध हो चुकी है।
24 घण्टों में बदली दयाशंकर की किस्मत, अचानक बदली परिस्थितियों में दया की पत्नी स्वाति को मिल सकता है M. L. A. टिकट, बीजेपी आलाकमान इस पहलू पर कर रहा विचार। माया के खिलाफ स्वाति को मिले जनसमर्थन से बसपा भी भौंचक्की। अचानक से पूरे यूपी में बढ़ी पत्नी स्वाति की लोकप्रियता। माया को मुंहतोड़ जवाब से बदले हालात, बसपा बैकफुट पर।
बसपा प्रमुख मायावती के लिए कहे अपशब्द का विरोध करने की प्रक्रिया में बसपा ख़ुद विरोध का सामना कर रही है। पिछले सप्ताह भाजपा के नेता दयाशंकर सिंह ने बसपा प्रमुख मायावती के लिए कहा कि वे ‘एक वेश्या से भी बदतर चरित्र’ की हो गई हैं. इस बयान पर जहां पहले बसपा भाजपा को घेरती नज़र आ रही थी अब मामला उलट गया है।
गुरुवार को लखनऊ में बसपा ने दयाशंकर की गिरफ्तारी की मांग करते हुए एक प्रदर्शन किया। इसमें नेताओं ने ‘ दयाशंकर सिंह की बहन को पेश करो’, ‘दयाशंकर सिंह की बेटी को पेश करो’ जैसे नारे लगाए।
इन नारों के लिए अब बसपा की आलोचना हो रही है. सोशल मीडिया पर #swati singh (स्वाति सिंह), #IStandWithSwatiSingh (मैं स्वाति के साथ हूं) और #Mayawati ट्रेंड कर रहे हैं. ट्विटर पर कई स्वाति को परेशान करने वाले बयान को ग़लत बता रहे हैं तो कई कह रहे हैं कि उसके लिए मायावती को माफ़ी मांगनी चाहिए।
प्रीति चोपड़ा लिखती हैं, अब मायावती अपना बचाव कर रही हैं… कहा है मैंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से इस तरह की भाषा का उपयोग न करने के लिए कहा है. भाजपा के समर्थन के बिना ऐसा करने के लिए सही किया स्वाति सिंह।
विमल मिश्रा लिखते हैं, “क्या स्वाति सिंह महिला नहीं? क्या केवल ताकतवर महिलाओं का ही मान बचाया जाना चाहिए?”
शिल्पी पाठक लिखती हैं, “शर्म की बात है कि देवीजी या बहनजी वोट बैंक की राजनीति के लिए 12 साल की बच्ची को डरा रही हैं.”
अशोक पंडित लिखते हैं, “जो लोग दयाशंकर सिंह की पत्नी के लिए अभद्र बातें कह रहे हैं, वो वही ग़लती कर रहे हैं जो दयाशंकर ने की. उन्हें भी सज़ा मिलनी चाहिए.”
दयाशंकर की पत्नी स्वाति सिंह ने कहा महिला के सम्मान के मुद्दे पर सियासत हो रही है लेकिन क्या मैं और मेरी बेटियां महिलाएं नहीं हैं। मेरे पति ने जो कुछ कहा है उस पर कानून अपने हिसाब से कार्रवाई करे, लेकिन इन लोगों को ये ताकत और अधिकार कौन दे रहा है कि मुझे और मेरी बेटियों को सरेआम पेश करने लगे? स्वाति सिंह का ये भी कहना है कि उनकी बच्चियां बेहद सहमी हुई हैं और घर से बाहर निकलने में भी डर रही हैं। महिलाओं के सम्मान पर उठे एक मुद्दे में ये तीन महिलाएं भी हैं जो अब डर और खौफ के साए में जी रही हैं।
इधर, केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा एक महिला होने के नाते में मायावती की भावनाओं को समझ सकती हूं, लेकिन मायावती इस तरह की राजनीति कर रही हैं जैसे उनकी लॉटरी खुल गई हो। पहले गुजरात में दलितों की पिटाई का मुद्दा और फिर मायावती पर बयान का मुद्दा दोनों ने ही ये आभास करा दिया कि देश में दलितों की हालत कितनी खराब हैदलितों की हालत तो खराब है ही, लेकिन उसके जिम्मेदार कौन लोग हैं? जाहिर तौर पर वही ‘देवी’ और देवता जो उनके रहनुमां बनते हैं। मायावती को दलितों की जितनी चिंता खुद पर की गई अभद्र टिप्पणी के बाद हो रही है, उतनी शायद पिछले पांच सालों में कभी नहीं हुई होगी।
दयाशंकर की पत्नी स्वाति सिंह ने कहा महिला के सम्मान के मुद्दे पर सियासत हो रही है लेकिन क्या मैं और मेरी बेटियां महिलाएं नहीं हैं। मेरे पति ने जो कुछ कहा है उस पर कानून अपने हिसाब से कार्रवाई करे, लेकिन इन लोगों को ये ताकत और अधिकार कौन दे रहा है कि मुझे और मेरी बेटियों को सरेआम पेश करने लगे? स्वाति सिंह का ये भी कहना है कि उनकी बच्चियां बेहद सहमी हुई हैं और घर से बाहर निकलने में भी डर रही हैं। महिलाओं के सम्मान पर उठे एक मुद्दे में ये तीन महिलाएं भी हैं जो अब डर और खौफ के साए में जी रही हैं।
बीएसपी की कुछ महिला कार्यकर्ताएं दयाशंकर सिंह की जीभ काटने की भी मांग करती दिखाई दी और बयानों की मर्यादा को हर जगह ताक पर रख दिया गया। बीजेपी पहले ही दयाशंकर सिंह को पार्टी से निकाल चुकी है और कानून के लिहाज से जो भी कार्रवाई होनी चाहिए उसके समर्थन में है।
यूपी चुनाव में मुकाबला बीएसपी और बीजेपी के बीच ही दिखाई पड़ता है। ऐसे में एक बयान ने मायावती को बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया है। जबान का फिसलना हमेशा भारी पड़ता है। क्योंकि बंदूक से निकली गोली और मुंह से निकली बोली वापिस नहीं होती।
यकीनन दयाशंकर सिंह का बयान घटिया था और उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। महिलाओं के खिलाफ होने वाली अभद्र टिप्पणियों पर लगाम लगाने के लिए एक मिसाल भी कायम की जानी चाहिए, लेकिन इस मांग के साथ ही साथ ये क्यों भूला जा रहा है कि दयाशंकर की जिस बीवी और बेटी पर सरेआम अभद्र टिप्पणी हो रही है वो एक महिला ही है?
क्या पार्टी अध्यक्ष और कार्यकर्ताओं की ‘देवी’ महिला और बयान देने वाले के घर की महिलाओं में फर्क है? क्या बयान देने वाले के घर की महिलाएं और बच्चियां भी सजा की हकदार हैं। इस बात का जवाब ममता और जया को भी देना चाहिए जो मायावती पर हुई अभद्र टिप्पणी को महिलाओं का अपमान बता रही थीं।
दरअसल, इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाओं के अपमान के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन क्या इस वक्त चल रही राजनीति का महिला सम्मान से कोई लेना-देना है। जो घटिया बयान दयाशंकर जैसे लोगों के मुंह से निकला वो अब बीएसपी के कार्यकर्ता सड़कों पर उसकी पत्नी और बेटियों के खिलाफ बोल रहे हैं और दलितों की ‘देवी’ कह रही हैं आपके देवी देवताओं का अपमान होगा तो क्या आपको गुस्सा नहीं आएगा?
दलितों का उद्धार तब तक नहीं हो सकता जब दलितों के कथित मसीहा खुद सामंतवादी बनने की होड़ में रहेंगे। यूपी चुनाव के मद्देनजर पहले गुजरात में वायरल हुए दलितों के वीडियो पर सियासत हुई और आनंदी बेन, राहुल और केजरीवाल समेत तमाम नेताओं का रैला उनके पास पहुंच गया। मायावती पर हुई टिप्पणी को भी दलितों के सम्मान से जोड़ दिया गया। राजनीति के लिहाज से तो ये मुद्दा ठीक है लेकिन दलित हितों के लिहाज से ये बहुत खतरनाक है।
इसी तरह के घटिया मुद्दों की वजह से दलितों के बारे में चिंतन हाशिए पर चला गया है। दलितों को सम्मान दिलाने के बजाए उनके अपमान को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने से ज्यादा फायदा इन नेताओं को मिलता है। मायावती लंबे समय से राजनीति कर रही हैं और उप्र की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं सत्ता मिलते ही वो दलित से सामंती हो जाती हैं और दलितों की हालत जस की तस बनी रहती है।

Comments